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6 जुलाई, 2020|11:32|IST

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चीन तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

भारत और चीन का सीमा-विवाद एक बार फिर सतह पर आ गया है। पूर्वी लद्दाख में कई जगहों पर तनातनी इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (चीन की सेना) के सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा पार करके भारतीय सीमा में घुस आए हैं। गैलवान नदी घाटी में विशेष तनाव दिख रहा है। आखिर चीन की सेना इस तरह घुसपैठ क्यों कर रही है? ऐसा करने के पीछे उसका मकसद क्या है? इसके बारे में फिलहाल बीजिंग की तरफ से आधिकारिक बयान का इंतजार है, लेकिन चीन के इस दुस्साहस की कई वजहें हो सकती हैं।
सबसे बड़ा कारण तो कोरोना वायरस के जन्म का खुलासा करने को लेकर चीन पर बढ़ता वैश्विक दबाव है। दरअसल, भारत ने पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन में कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष का पद संभाला है। जिस विश्व स्वास्थ्य महासभा में भारत को यह जिम्मेदारी सौंपी गई, उसने यह भी फैसला लिया कि कोरोना वायरस के जन्म की हकीकत एक स्वतंत्र जांच कमेटी पता लगाएगी। चीन इस पर सहमत तो हो गया है, लेकिन जिस तरह से विश्व स्वास्थ्य संगठन में ऐसी किसी स्वतंत्र जांच से जुड़े नियम नरम किए गए हैं, उससे तो यही लगता है कि बीजिंग खुले दिल से विश्व स्वास्थ्य महासभा के फैसले के साथ नहीं है। अब चूंकि यह तय है कि कोरोना वायरस का सच खोजा जाएगा और यह पता करने की कोशिश होगी कि चीन से शुरू होने के बावजूद इस वायरस का प्रकोप यूरोप और अमेरिका में ज्यादा क्यों दिखा, इसको लेकर बीजिंग तनाव में है। संभव है, इसी खुन्नस में वह सीमा-विवाद को हवा देकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा हो।
मौजूदा तनातनी की एक वजह चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘बेल्ट रोड इनीशिएटिव’ का भारत द्वारा विरोध भी हो सकती है। हालांकि, तमाम वैश्विक ताकतें भी चीन की इस मंशा के खिलाफ हैं। इस परियोजना के तहत चीन कई देशों में बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर देश इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। चीन बेशक निर्माण-कार्यों में इन देशों की आर्थिक मदद करता है, लेकिन कर्ज न चुका पाने की स्थिति में चीनी कंपनियां वहां प्रशासनिक नियंत्रण हासिल कर लेती हैं। रणनीतिक तौर पर श्रीलंका का महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिस पर फिलहाल 99 वर्षों के लिए बीजिंग का नियंत्रण हो गया है। 
तीसरा कारण चीन का यह आंकना हो सकता है कि भारत किस हद तक उसका प्रतिरोध करने में सक्षम है। चीन जहां-तहां अपना बल दिखाता रहा है। दक्षिण चीन सागर में तो वह कृत्रिम द्वीप तक बना चुका है और किसी बाहरी ताकत की सागर में आवाजाही बाधित करता रहा है। पिछले वर्ष ‘फ्रिडम ऑफ नेविगेशन’ के तहत जब अमेरिका ने यहां अपने जहाज भेजे थे, तब चीन ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। ऐसा करने के लिए बीजिंग अपने पड़ोसी देशों की चिंताओं पर भी ध्यान नहीं देता। दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के खिलाफ तो फिलीपींस संयुक्त राष्ट्र न्यायाधिकरण भी गया था, जहां उसे जीत मिली थी और दक्षिण चीन सागर में चीन के एकाधिकार को खारिज कर दिया गया था। मगर बीजिंग ने दबाव बनाकर फिलीपींस को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह द्विपक्षीय तरीके से विवाद का निपटारा करेगा। 
चूंकि भारत की नजदीकी इधर अमेरिका से बढ़ गई है, ऐसे में इंडो पैसिफिक यानी हिंद और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले भौगोलिक हिस्से में नई दिल्ली को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। क्वाड (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान का सामरिक समूह) में प्रगति हुई है और इसमें अब विदेश मंत्री स्तर पर बातचीत होने लगी है। इसीलिए भारत के बढ़ते रुतबे को चोट पहुंचाने की कोशिशों में चीन जुटा हुआ है। अपनी इसी मंशा के तहत वह अनेक एशियाई देशों पर दबाव बनाकर भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है। पिछली नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (राज्य सत्ता के सर्वोच्च अंग की बैठक) में बीजिंग ने 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी ताकत बनने का लक्ष्य तय किया है। इसीलिए मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग का कद कई मामलों में चीन में साम्यवादी विचारधारा के संस्थापक माओत्से तुंग से बड़ा कर दिया गया है। चूंकि एशिया में चीन की राह सिर्फ भारत रोक सकता है, इसलिए जुबानी तौर पर साथ-साथ चलने की बात करने के बावजूद बीजिंग नई दिल्ली पर दबाव बनाने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहता।
अभी लद्दाख में जिन निर्माण-कार्यों के ऊपर मौजूदा विवाद का ठीकरा फोड़ा जा रहा है, उस पर तो भारत ने करीब दशक भर पहले अपना काम शुरू कर दिया था। हिमालय की विशाल पर्वत शृंखलाओं की वजह से लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों तक पहुंच बनाने के लिए भारत ने बहुत पहले से यहां बुनियादी ढांचे और सड़कें आदि बनाने शुरू कर दिए थे। यह इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि सीमा पर तैनात हमारे सैनिकों को वक्त पर रसद आदि मिल सके। चीन ने इसे पहले तवज्जो नहीं दी थी, लेकिन अब वह भारत के विरोध की सीमा को जांचना चाहता है। इसलिए इसे डोका ला विवाद की अगली कड़़ी भी कहा जा सकता है। 
सवाल यह भी है कि आखिर चीन के साथ हमारा सीमा-विवाद क्यों बना हुआ है? उल्लेखनीय है कि दोनों देश करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। मैकमोहन रेखा अनौपचारिक तौर पर भारत और चीन को बांटती है, लेकिन तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के बीच चीन इसे नहीं मानता। भारत जहां इन इलाकों पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है, वहीं अक्साई चिन को भी नई दिल्ली अपना हिस्सा मानती है। अच्छी बात है कि सन 1962 के अलावा कभी भी दोनों देश इसके लिए जंग के मैदान में आमने-सामने नहीं आए हैं। चूंकि सीमांकन का काम अंतिम रूप से अब तक नहीं हुआ है, इसलिए दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे के इलाकों में आते-जाते रहे हैं। मगर बीच-बीच में यह तनाव इसलिए गहरा जाता है, क्योंकि चीन किसी न किसी योजना के तहत सीमा-विवाद को हवा देता है। तो क्या इस बार उसकी मंशा लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों को अपने कब्जे में लेने की है? उम्मीद है, पहले की तरह इस बार भी उसकी मंशा जल्द स्पष्ट हो जाएगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:hindustan Opinion column 28 may 2020