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सीमा-विवाद सुलझे, तो पूर्वोत्तर शांत हो

प्रभाकर मणि तिवारी, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Manish Mishra
Tue, 27 Jul 2021 11:24 PM
सीमा-विवाद सुलझे, तो पूर्वोत्तर शांत हो

पूर्वोत्तर राज्य असम और पड़ोसी प्रदेश मिजोरम के बीच सीमा-विवाद के कारण भड़की हिंसा में भले पहली बार छह पुलिस वालों की मौत हो गई, मगर इलाके में सीमा विवाद का इतिहास बहुत पुराना है। असम से काटकर इस इलाके में नए राज्यों के गठन के समय ही सीमा विवाद के बीज बो दिए गए थे। इसी वजह से असम के साथ मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड जैसे राज्यों की सीमा पर अक्सर हिंसक झड़पें होती रही हैं। इसका खामियाजा सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को भुगतना पड़ता है। मिजोरम के साथ ताजा विवाद में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री आमने-सामने आ गए हैं। यह स्थिति तब है, जब हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्वोत्तर के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की थी और उसमें सीमा विवाद का मुद्दा भी उठा था।
वैसे तो असम के साथ कई राज्यों का सीमा विवाद बहुत पहले से होता रहा है, पर हाल में इस वजह से हिंसा की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इसके कारणों को समझने के लिए अतीत में झांकना होगा। दरअसल, जब असम से काटकर मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों का गठन किया गया था, तब इलाके में आबादी बहुत कम थी और सीमावर्ती इलाके घने जंगलों से घिरे थे। पर बढ़ती आबादी के दबाव के कारण जब जगह कम पड़ने लगी, तब जमीन का मुद्दा उठने लगा। मगर शुरुआती दौर में ही इसे सुलझाने के बजाय केंद्र व राज्य सरकारें इस ओर से आंखें मूंदे रहीं। मिजोरम पुलिस के हाथों असम पुलिस के जवानों की मौत इसी उदासीनता का नतीजा है। असम-मिजोरम सीमा विवाद को सुलझाने के लिए वर्ष 1995 से कई दौर की वार्ता हो चुकी है, पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका है। प्रशासनिक सहूलियत के लिए असम से काटकर नए राज्यों के गठन का सिलसिला वर्ष 1962 के बाद शुरू हुआ था। मगर तब सीमाओं का सही तरीके से निर्धारण नहीं किया गया था। नगालैंड के साथ असम की करीब 512 किलोमीटर लंबी सीमा है। इन दोनों राज्यों के बीच  1965 से ही सीमा विवाद को लेकर हिंसक झड़पें होती रही हैं। इसी तरह, असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच सीमा पर सबसे पहले वर्ष 1992 में हिंसक झड़प हुई थी। उसी समय से दोनों राज्य एक-दूसरे पर अवैध अतिक्रमण और हिंसा भड़काने के आरोप लगाते रहते हैं। इसी तरह, असम और मेघालय सीमा पर भी अक्सर हिंसक झड़पों की खबरें आती रहती हैं।
पहले जिस इलाके को असम के लुसाई हिल्स जिले के नाम से जाना जाता था, उसे ही 1972 में पहले केंद्रशासित क्षेत्र और फिर 1987 में पूर्ण राज्य मिजोरम का दर्जा दिया गया था। दक्षिण असम के साथ मिजोरम की करीब 165 किलोमीटर लंबी सीमा सटी है। मिजोरम का दावा है कि उसके लगभग 509 वर्ग मील इलाके पर असम का अवैध कब्जा है। वर्ष 1993 में असम और मणिपुर सरकार ने लुसाई हिल्स और मणिपुर राज्य के बीच के इलाकों की सीमा का निर्धारण कर दिया था, लेकिन मिजोरम की दलील है कि यह सीमांकन वर्ष 1875 की अधिसूचना पर आधारित होना चाहिए। नेताओं का कहना है कि वर्ष 1933 में मिजो समुदाय से सलाह नहीं ली गई थी, इसलिए इस अधिसूचना के तहत निर्धारित सीमा वैध नहीं है। उधर, असम सरकार 1933 की अधिसूचना के आधार पर ही सीमाएं तय करने के पक्ष में है। असम के साथ मेघालय का सीमा विवाद वर्ष 1972 में इस राज्य के गठन जितना ही पुराना है। मेघालय कम से कम 12 इलाकों पर अपना दावा ठोकता रहा है। ये इलाके फिलहाल असम के कब्जे में हैं। दोनों राज्यों ने एक नीति अपना रखी है, जिसके तहत कोई भी राज्य दूसरे सूबे को बताए बिना विवादित इलाकों में विकास योजनाएं शुरू नहीं कर सकता। यह विवाद उस समय शुरू हुआ, जब मेघालय ने असम पुनर्गठन अधिनियम, 1971 को चुनौती दी। उक्त अधिनियम के तहत असम को जो इलाके दिए गए थे, उसे मेघालय ने खासी और जयंतिया पहाड़ियों का हिस्सा होने का दावा किया था।
अब मिजोरम और असम के बीच बीते सप्ताह हुई हिंसा के बाद राज्य में इस विवाद को शीघ्र सुलझाने की मांग उठ रही है। मेघालय के तमाम राजनीतिक दलों ने केंद्र से कहा है कि वह 2022 से पहले इस विवाद को सुलझाने की पहल करे। वर्ष 2022 में मेघालय के गठन को 50 वर्ष पूरे हो जाएंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि असम से काटकर अलग-अलग राज्यों के गठन के समय सीमाओं का ठीक से निर्धारण नहीं किया गया और वही विवाद की जड़ है। अब तक सत्ता में रहने वाले राजनीतिक दलों ने भी इस गंभीर समस्या की ओर से चुप्पी साधे रखी है। इनर लाइन परमिट (आईएलपी) प्रणाली भी सीमा विवाद की एक प्रमुख वजह है। इलाके के चार राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर में यह परमिट प्रणाली लागू है। इसके बिना बाहर का कोई व्यक्ति इन राज्यों में प्रवेश नहीं कर सकता। लेकिन उन राज्यों के लोग बिना किसी रोक के असम में आवाजाही कर सकते हैं। इस एकतरफा नीति के खिलाफ समय-समय पर आवाज उठती रही है। दरअसल, पूर्वोत्तर में नए राज्यों के गठन के बाद उन तमाम सूबों में उग्रवाद की समस्या ने जिस गंभीरता से सिर उठाया, उससे बाकी तमाम मुद्दे हाशिये पर चले गए। केंद्र की उपेक्षा और इन राज्यों में सत्ता संभालने वाली राजनीतिक पार्टियां सीमा विवाद जैसे गंभीर मुद्दों को सुलझाने के बजाय अपने हितों को साधने में ही जुटी रहीं। सरकारों के ऐसे रवैये का नतीजा, खासकर सीमावर्ती इलाकों में रहने वालों को भुगतना पड़ता है। विवादित इलाके में सरकार न तो कोई विकास योजना लागू करती है और न ही वहां रहने वालों को सरकारी योजनाओं का खास लाभ मिल पाता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए असम और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों से संयम बरतने की अपील जरूर की है, लेकिन जानकारों का कहना है कि असम के साथ विभिन्न राज्यों का सीमा विवाद पूर्वोत्तर के हित में नहीं है। केंद्र सरकार को इस समस्या के स्थायी और स्वीकार्य समाधान की दिशा में ठोस पहल करते हुए सीमा निर्धारण के लिए किसी आयोग का गठन करना चाहिए, ताकि दशकों पुराने इस विवाद को शीघ्र निपटाया जा सके। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि केंद्र सरकार पहल कब करेगी?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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