DA Image
27 जुलाई, 2020|10:22|IST

अगली स्टोरी

शॉर्टकट की संस्कृति और हमारी पुलिस




इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में उत्तर प्रदेश के एक मुख्यमंत्री ने घोषित किया कि उनके शासन में साल भर के भीतर अपराध 50 प्रतिशत कम हो गए हैं। दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर आए उत्तर प्रदेश के एक आईएएस अधिकारी ने लखनऊ सचिवालय में बैठे गृह सचिव को फोन खड़खड़ाया कि इस रफ्तार से तो प्रदेश अगले साल तक अपराध विहीन हो चुका होगा। दूसरी तरफ से एक उपहास भरी हंसी सुनाई दी और साथ में यह सूचना मिली कि उनकी जानकारी एक महीना पुरानी है और अब तक तो अपराध 60 प्रतिशत कम हो चुके हैं। अपराधों में कमी की यह जादुई छड़ी सिर्फ उन्हीं मुख्यमंत्री के पास नहीं थी। अपराध कम करने के अतिरिक्त उत्साह में उन्होंने इस छड़ी का कुछ हास्यास्पद इस्तेमाल कर अपनी भद पिटवा ली, पर सच तो यह है कि उनके पहले और बाद के तमाम मुख्यमंत्रियों को जादू की यह छड़ी बहुत पसंद रही है। 
नक्शा जरायम तीन साला मुकाबिलेवार नामक यह छड़ी हर थाने और जिले से उच्चाधिकारियों को भेजा जाने वाला कागज का एक टुकड़ा है, जिस पर पिछले तीन वर्ष के अपराधों का तुलनात्मक विवरण दर्ज होता है। मैंने सालों-साल बड़ी दिलचस्पी से इस दस्तावेज का अध्ययन किया है। इधर उर्दू खत्म करने के चक्कर में सुना है कि इसका नाम बदल दिया गया है। बकौल शेक्सपीयर नाम में क्या रखा है, इसलिए काम इस कागज का पुराना ही है। थाना और जिला, पुलिस की बुनियादी इकाइयां हैं और इनके प्रभारियों की कार्य-क्षमता का मूल्यांकन इसी के आधार पर होता है। मसलन, किसी थाने में अगर पिछले साल दस लूट की घटनाएं दर्ज थीं और यदि इस वर्ष बारह हो गईं, तो नतीजा निकलेगा कि लूट के अपराध बीस फीसदी बढ़ गए। थानों को मिलाकर जिले के आंकडे़ बनते हैं, लिहाजा कहा जा सकता है कि जिले में लूट के बीस फीसदी मामले बढ़े हैं। इन आंकड़ों की समीक्षा रेंज, जोन, पुलिस मुख्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय तक होती है और इन्हीं के आधार पर विभिन्न स्तरों के अधिकारियों का मूल्यांकन होता है।
यह जानना रोचक होगा कि जादू की इस छड़ी से अपराध कम कैसे किया जाता है? जब आबादी बढ़ रही हो, बेतरतीब शहरीकरण हो रहा हो, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता बढ़ रही हो, एक संस्था के रूप में परिवार अनुशासित कर सकने की क्षमता खो रहा हो, गरज यह कि अपराध बढ़ाने के सारे कारण मौजूद हों और पूरी दुनिया में अपराध बढ़ रहे हों, तब ऐसा क्यों होता है कि हमारे देश में अपराध कम होते रहते हैं? उत्तर जादू की छड़ी के पास है। जैसे ही अपराध के तुलनात्मक आंकडे़ ऊपर तक पहुंचते हैं, अच्छे-बुरे संदेश आने लगते हैं। यह स्पष्ट कर दिया जाता है कि राज्य अपराध कम करने के लिए कटिबद्ध है। मगर राज्य के पास न तो इतना धैर्य व संसाधन हैं, और न ही उसकी दिलचस्पी इसमें है कि वह पुलिस व न्याय प्रणाली में ऐसे सुधार करे, जिनसे अपराध नियंत्रित हो सकें, इसलिए वह शॉर्टकट तलाशता है। और यह शॉर्टकट है एफआईआर दर्ज न करना। पिछले साल किसी भी श्रेणी में जितने मुकदमे लिखे गए, इस साल उनसे कम लिखना।
मेरा अनुमान है कि उत्तर भारत में दो-तिहाई से अधिक मुकदमे आसानी से दर्ज नहीं होते। पैसा, रसूख या पैरवी के बल पर कुछ दर्ज भी हो जाएं, तब भी आधे से अधिक दर्ज हुए बिना रह जाते हैं। इसके लिए आप सिर्फ थाना-इंचार्ज को दोषी नहीं ठहरा सकते। मैंने ऊपर एक सूची दी है, जिन तक तीन साल के अपराधों के विवरण जाते हैं और इन सबको पता होता है कि वे झूठ का पुलिंदा देख रहे हैं और सब खुश होते रहते हैं कि उनके ‘अथक प्रयासों’ से अपराध नियंत्रण में हैं। सरकार लंबे-लंबे विज्ञापनों के जरिए दावे कर सकती है कि उसके शासन में सब कुछ ठीक है। उत्तर प्रदेश में 1960 के दशक में जब एनएस सक्सेना पुलिस के मुखिया थे, पुलिस थानों में ईमानदारी से मुकदमे दर्ज होने शुरू हुए, तो अपराध कई गुना बढ़ गए, पर तब उन्हें मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह का समर्थन हासिल था। जैसे-जैसे मुख्यमंत्री के विरोधियों ने अपराधों की बाढ़ का हल्ला मचाया, वैसे-वैसे यह समर्थन कमजोर पड़ता गया और फिर सब कुछ यथावत होता गया।
मुकदमे दर्ज न करने से वास्तविक अपराध कम नहीं होता और जब जनता त्राहिमाम करने लगती है, तो  सरकारें पुलिस को त्वरित न्याय करने के आदेश दे देती हैं। फिर पुलिस अपराधियों को पकड़कर अदालत में पेश करने की जगह ‘मुठभेड़’ में मार डालती है या नए चलन के अनुसार, कम से कम उनके पैर में तो गोली मार ही देती है। अपराध से लड़ने के लिए गठित एक संस्था को खुद अपराधी बनाने का इससे बदतर और क्या तरीका हो सकता है?
अपराधियों को मारकर अपराध काबू में आ सकता, तो वह सब न घटता, जो पिछले एक महीने में हमें देखने को मिला। नृशंस हत्यारों विकास दुबे और उसके साथियों को निपटाने में जिन दिनों कानपुर पुलिस लगी थी, उन्हीं दिनों उसी शहर में एक अपहरण हुआ और परंपरा के मुताबिक थाने में उसका मुकदमा नहीं लिखा गया। अपहृत के घर वाले तब तक दर-दर भटकते रहे, जब तक कि उन्हें उसकी हत्या की सूचना नहीं मिल गई। इन्हीं दिनों गाजियाबाद के एक पत्रकार की हत्या समेत दर्जनों ऐसी वारदातें हुईं, जो टल सकती थीं, अगर शुरू में ही एफआईआर दर्ज हो गई होती।
पुलिस से फर्जी एनकाउंटर कराने का परिणाम कितना कारुणिक हो सकता है, इसका अंदाज हम हाल में भरतपुर के पूर्व विधायक राजा मानसिंह की हत्या के अपराध में सुनाए गए दंड से लगा सकते हैं। यह माना नहीं जा सकता कि इतने प्रभावशाली व्यक्ति का ‘एनकाउंटर’ छोटे स्तर के पुलिसकर्मियों ने अपनी मर्जी से किया होगा, पर सजा उन्हीं को हुई। विकास दुबे के ‘एनकाउंटर’ में भी कहीं ऐसा ही न हो। जरूरत है कि सरकार विकास दुबे मामले में अदालती निजाम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को गंभीरता से ले। इसके साथ ही पुलिस को कानून का सम्मान करने वाली एक सभ्य संस्था बनाने की आवश्यकता है। पर इन सबके लिए बडे़ धैर्य और संसाधनों की जरूरत होगी। सबसे पहले तो हर अपराध पर एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता है। एनकाउंटर के नाम पर हत्याएं बंद करनी पड़ेंगी। पर क्या सरकारें शॉर्टकट की संस्कृति से मुक्त होना चाहेंगी?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column 28 july 2020