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6 अप्रैल, 2020|11:50|IST

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मेरा और दिल्ली का दर्द साझा है

rajinder kaur 1984 anti sikh riots victim

दिल्ली मुझे एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिखी, जहां वह आज से 35 साल पहले मिली थी। जलते हुए खोमचों, धधकती हुई दुकानों और खबरों में लाशों की गिनतियों ने मेरे जख्म फिर से कुरेद दिए हैं। ऐसा लगा, जैसे दिल्ली उसी मंजर को फिर से जी रही है। अक्तूबर 1981 में मेरी शादी हुई थी। मौजपुर में अपने संयुक्त परिवार के साथ हम खुशहाल जिंदगी जी रहे थे। पति और उनके भाइयों का दिलशाद गार्डन में आरा मशीन का काम था। अच्छी कट रही थी। मगर नवंबर 1984 के उन मनहूस दिनों ने हम सबकी जिंदगी तबाह कर दी। 31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद शाम से तनाव गहराने तो लगा था, मगर हमें रत्ती भर भी अंदेशा न था कि हमारे साथ इस कदर जुल्म होगा।

मेरे घर पर तीन दिनों तक हमले हुए, तीसरे दिन मेरा सब कुछ खत्म हो गया। मैं अपने बच्चों को लेकर धूप में बाल सुखा रही थी। तभी दंगाइयों के हुजूम को अपनी तरफ आते देखा। उस वक्त मेरा बड़ा बेटा एक साल ग्यारह महीने का और छोटा सिर्फ साढ़े चार माह का था। दंगाई हमारे घर में घुस आए। मेरी आंखों के सामने उन्होंने पति को जिंदा जला दिया, मैंने किसी तरह अपने दोनों बच्चों को कलेजे से चिपकाए पड़ोस के घर में घुसकर जान बचाई। दंगाइयों ने घर का सारा सामान लूट लिया, और जो वे नहीं ले जा सके, उनमें आग लगा दी। मेरा सब कुछ राख हो गया। सिर्फ तन पर जो कपड़े थे, वही रह गए थे।

मैं तो आज भी सोचती हूं कि हमारा क्या कुसूर था? हम तो मेहनतकश लोग थे। अगर दंगाइयों ने हमें निशाना न बनाया होता, तो आज हम कहां होते? हमारी तबाही यहीं तक सीमित नहीं थी। पति के बडे़ भाई को भी दिलशाद गार्डन में आग के हवाले कर दिया गया था। उस वक्त तो वह बच गए, क्योंकि उनको हॉस्पिटल पहुंचा दिया गया, मगर वह कोई काम करने लायक नहीं रहे और चार-पांच साल बाद उन्होंने आखिरकार दम तोड़ दिया।

चौरासी के दंगे ने हमें अपने घर से श्यामलाल कॉलेज के राहत शिविर में पहुुंचा दिया था। कैंप में पड़े लोगों के रिश्तेदार उन्हें ढूंढ़ते हुए आते और अपने साथ ले जाते। मेरा हाल पूछने वाला कोई न था। भाई भी हरियाणा में कहीं फंस गया था। ससुराल वाले भी नहीं लेकर जा रहे थे और तब तक गुरुद्वारे से भी मदद नहीं मिली थी। अपनी तकलीफ का क्या कहूं, बच्चों की जिंदगी का यूं दर-बदर होना बहुत तकलीफें दे रहा था। हम काफी डरे हुए थे। करीब तीन महीने तक राहत कैंप में ही पड़े रहे। उसके बाद की दुनियादारी और तकलीफों का सामना मैंने कैसे किया, यह तो मेरा रब जानता है।

मैं 19 साल में ब्याहकर आई और 23 साल में दंगाइयों द्वारा विधवा बना दी गई थी। गोद में दो नन्हे बच्चे थे, और भविष्य बिल्कुल अंधकारमय। जिंदगी का कोई सिरा नजर ही नहीं आ रहा था, पर कब तक शिविर में रहते? अपने बच्चों के लिए तकदीर से लड़ना ही था। वे बड़े तकलीफ भरे दिन थे। जिन रिश्तेदारों के यहां कभी बराबरी की हैसियत में जाते थे, अब उनके रहमो-करम के पात्र थे। कुछ पैसे वाले रिश्तेदार मिलते, तो कुछ पैसे पकड़ा जाते। कोई अपनी उतरन दे जाता, तो कोई बच्चों की यूनीफॉर्म खरीद देता। किसी ने घर के जरूरी सामान दिला दिए। हर मदद के साथ मददगार के लिए दिल से दुआएं निकलतीं, पर आत्म-सम्मान भी उतना ही आहत होता था। बेटों को गुरु हरिकिशन स्कूल में दाखिला मिल गया था। वहां से कुछ मदद मिल जाती थी और कुछ सिख पेंशन का सहारा था। स्कूल के छोटे-मोटे काम कर देती, तो उसके भी पैसे मिल जाते थे। मगर मैंने तय कर लिया था कि अपने बच्चों को हर कीमत पर पढ़ाना है।

सरकार की तरफ से मुझे तिलक नगर के पास रघुबीर नगर में फ्लैट मिला था, मगर उस पर भी वहीं के एक सरदार ने कब्जा कर लिया। मेरे लिए कौन उससे लड़ता? मैं अकेली जाती, तो वह गंदी-गंदी गालियां देता। एक दिन मेरे पास बच्चों की फीस के लिए पैसे नहीं थे। मैंने कब्जेदार से बात की। उसने मुझे एक लाख रुपये दिए और फ्लैट अपने नाम करा लिया। मेरे बच्चों ने बड़ी तकलीफें सहीं, मगर आज वे अच्छे मुकाम पर हैं। एक कंप्यूटर इंजीनियर है और दूसरा मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करता है। उनकी गृहस्थी भी बस गई है।

मैंने जो भोगा, उसका असर वक्त के साथ मद्धिम पड़ चला था, मगर मंगलवार की दोपहर जब एक बार फिर अपने इलाके में हंगामा बढ़ते और दुकानों से उठते धुएं को देखा, तो चौरासी का खौफ उभर आया। मैंने बच्चों को घर के अंदर बंद कर दिया। देखिए, एक बार फिर कितने सारे बच्चों के सिर से बाप का साया उठ गया, कितनी मांग उजड़ गई, माओं की गोद सूनी हो गई? यह सब देख-सुनकर लगा कि दिल्ली और मेरा दर्द कितना साझा है। एक बार फिर मौजपुर में दहशत की स्थिति है। चौरासी के बाद से आज तक अपनी हर प्रार्थना में मैंने अपने रब से यही दुआ मांगी है कि अमन-चैन कायम रहे, ताकि कोई बच्चा यतीम न हो। राजनीति करने वालों का तो कुछ नहीं बिगड़ता, मारे सिर्फ गरीब जाते हैं। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 27th February 2020