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22 अक्तूबर, 2020|1:51|IST

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नफरत का कारोबार और हम

हरजिंदर वरिष्ठ पत्रकार

सोशल मीडिया किसी देश के हालात को किस हद तक और कितनी तेजी से बिगाड़ सकता है, इसे समझना हो, तो हमें इथियोपिया जाना होगा। बस एक साल पहले तक इस पूर्वी अफ्रीकी देश के हालात इतने अच्छे दिख रहे थे कि उससे पूरे अफ्रीका में एक नई उम्मीद बांधी जाने लगी थी। और तो और, इस देश के प्रधानमंत्री अबी अहमद को पिछले साल विश्व शांति के लिए नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था। पुरस्कार तो खैर उन्हें मिल गया, लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर चारों तरफ से घिरे इस देश से शांति गायब होने लगी। इस साल जून में जब इथियोपिया के लोकप्रिय गायक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हचलू हंडेसा की हत्या हुई, तो उसके बाद हिंसा का जो दौर शुरू हुआ, वह अभी तक रुका नहीं है। तब से इस देश में न जाने कितने दंगे और न जाने कितने सामूहिक हत्याकांड हो चुके हैं, अनगिनत इमारतें जलाकर राख कर दी गई हैं और यह तांडव रुकने का नाम नहीं ले रहा। 
इन सबका दोषी कौन है? बेशक हम वहां की विभाजक जातीय रेखाओं और उनके आधार पर चलने वाली राजनीति को इसका दोषी ठहरा सकते हैं। लेकिन सच यह भी है कि ये विभाजक रेखाएं वहां हमेशा से ही थीं, लेकिन इस बार जैसी और जितनी हिंसा हो रही है, उतनी पिछले कई दशकों में वहां देखने को नहीं मिली। इस बार जो चीज फर्क डाल रही है, वह है सोशल मीडिया   की मौजूदगी। कई विशेषज्ञों  और डाटा वैज्ञानिकों ने तमाम उदाहरणों के साथ बताया है कि वहां का पूरा सोशल मीडिया नफरत फैलाने वाले भाषणों और हिंसा भड़काने वाली सामग्रियों से भरा पड़ा है। तमाम शिकायतों के बावजूद ये सामग्रियां वहां से हटाई नहीं गई हैं। कहा जाता है कि इसे बढ़ावा देने में इथियोपिया की सरकार बड़ी भूमिका निभा रही है। यह मुमकिन है, क्योंकि इस हिंसा में सरकार भी एक पक्ष है और इस सबका सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा भी उसी को मिल रहा है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि सोशल मीडिया चलाने वाली कंपनियों का इस हिंसा और नफरत से कोई सीधा हित सध रहा है, फिर भी वे इसे रोकने के लिए कदम क्यों नहीं उठा रही हैं?
यह सवाल सिर्फ इथियोपिया को लेकर नहीं, बहुत से दूसरे मामलों में भी किया जाता है। बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जो कुछ हुआ, उस पर भी इसी तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। पिछले दिनों हमारे यहां भी यही चीज एक बड़ी खबर बनी थी, जब यह पता चला कि फेसबुक ने नफरत फैलाने वाली सामग्री हटाने में लंबी आना-कानी की थी। ऐसा क्यों होता है कि सोशल मीडिया चलाने वाली कंपनियां नफरत फैलाने वाली सामग्री हटाने को आसानी से तैयार नहीं होतीं? भले ही वे हर समय सद्भाव की कितनी भी बातें करती रहें।
इसका एक कारण तो अच्छी और बुरी चीजों पर हमारा अलग-अलग ढंग से प्रतिक्रिया करना है, यानी जब हमें सोशल मीडिया पर कोई अच्छी चीज, सुभाषित या प्यार बढ़ाने वाली पोस्ट दिखती है, तो हम उसे पसंद करते हैं, और कई बार लाइक के बटन को भी दबा देते हैं। ज्यादा अच्छी लग जाए, तो उसे फॉरवर्ड भी कर देते हैं और फिर भूल जाते हैं। ऐसी पोस्ट बहुत ज्यादा हो जाएं, तो हम उन्हें नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं। लेकिन जब कोई नफरत फैलाने वाली पोस्ट दिखती है, तब हमारी प्रतिक्रिया ऐसी नहीं होती। तब हमारी प्रतिक्रिया बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि हम उस नफरत के किस तरफ खडे़ हैं? अगर वह हमारी धारणा से मेल खाती है, तब हम उसे लाइक तो करते ही हैं, उसे बढ़-चढ़कर फॉरवर्ड भी करते हैं, दूसरों को भेजते भी हैं, उन्हें दिखाते भी हैं। उसका इस्तेमाल विपरीत विचारधारा वालों को चिढ़ाने के लिए भी करते हैं। और अगर वह नफरती पोस्ट हमें नापसंद होती है, तो हम उस पर तीखी प्रतिक्रिया भी देते हैं। हम उस पर जो भी प्रतिक्रिया दें, आगे उस पर और प्रतिक्रिया होती है, फिर यह सिलसिला लंबा चलता है। अच्छी पोस्ट को हम भले ही कुछ समय बाद नजरअंदाज करने लगते हों, लेकिन नफरत सोशल मीडिया पर हमारी सक्रियता को बढ़ाती है।
अगर इसे सोशल मीडिया के व्यापार की भाषा में कहें, तो नफरत जितनी ज्यादा होती है, उतना ही ट्रैफिक जेनरेट होता है। जितना ट्रैफिक जेनरेट होता है उतना ही ज्यादा डाटा जेनरेट होता है। सोशल मीडिया का सारा कारोबार अंतत: डाटा का ही कारोबार है, इसलिए जितना ज्यादा डाटा तैयार होता है, उतना ही अधिक मुनाफा भी बढ़ता है। सीधे शब्दों में कहें, तो जिसे हम नफरत कहते हैं, सोशल मीडिया के कारोबार में कमाई का वह सबसे अच्छा साधन है। इसीलिए जब नफरत फैलाने वाली पोस्ट को हटाने की बात आती है, तब सोशल मीडिया चलाने वाली कंपनियां या तो आना-कानी करती हैं या फिर बहाने तलाशती हैं। 
यह नफरत कोई नई चीज नहीं है। नई चीज है, इसका बड़े पैमाने पर कारोबारी मुनाफे के लिए इस्तेमाल। यह कुछ वैसा ही है, जैसे हमारे समाज के कई अपशिष्ट पदार्थ हमारी नदियों को लंबे समय से प्रदूषित करते रहे हैं। तब नदियों का तंत्र, उसके जीव-जंतु, उसके आस-पास के जंगल इसे साफ करने में सक्षम थे, लेकिन जब से बड़ी-बड़ी फैक्टरियों ने नदियों को प्रदूषित करना शुरू किया, उन्हें साफ करना किसी के लिए संभव नहीं रहा। नदियों की जो दुर्गति हमारी कई फैक्टरियां कर रही हैं, हमारे समाज और राजनीति की वही दुर्गति बहुत हद तक सोशल मीडिया कर रहा है। यह बात अलग है कि हमारे समाज के लिए इसकी उपयोगिता भी कम नहीं है। ठीक वैसे ही, जैसे हमारे समाज के लिए प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां भी बहुत उपयोगी हैं, इसीलिए हम उन्हें पूरी तरह नकार नहीं पाते। दुनिया इस प्रदूषण से मुक्ति के रास्ते तो तलाश रही है, लेकिन सोशल मीडिया के मामले में ऐसी चिंता अभी नहीं दिखाई दे रही।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 27 september 2020