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20 जनवरी, 2021|12:06|IST

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एक फुटबॉलर, जो जीवित किंवदंती थे 

वह जिंदादिल थे। बहादुर थे। जीनियस थे। इतिहास के सबसे निपुण खिलाड़ी थे। जादूगर थे। हीरो थे। परम आदर्श थे... और न जाने क्या-क्या थे। डिएगो अरमांडो माराडोना फुटबॉल की दुनिया में सिर्फ एक नाम नहीं थे। वह जीते-जागते किंवदंति थे। ऐसी कोई उपमा नहीं है, जो उनसे जुड़ी हुई नहीं थी। वह सही मायने में फुटबॉल के शहंशाह थे। उनका जाना मुझ जैसे कई खिलाड़ियों के लिए व्यक्तिगत क्षति है।

खेल की विशिष्ट तकनीक और कौशल उन्हें अपने समकक्षों से अलग मुकाम पर ले जाती है। मैदान पर उनकी चपलता देखते ही बनती थी। बाएं पैर का अधिकाधिक इस्तेमाल कई खिलाड़ी करते हैं। मैसी भी बाएं पैर से ही अपना हुनर दिखाते हैं, लेकिन माराडोना की खासियत यह थी कि वह बाएं पैर से बखूबी ड्रिबलिंग (विपक्षी खिलाड़ियों को छकाते हुए गेंद को आगे की तरफ ले जाना) करते थे। वह ड्रिबलिंग करते-करते गोल पोस्ट तक पहुंचते और फिर दाएं पैर से गोल दागा करते। उनका यह कौशल उन्हें इसलिए बाकी खिलाड़ियों से अलग करता था, क्योंकि फुटबॉल बहुत तेज खेल है और इसमें बॉडी-कॉन्टैक्ट बहुत ज्यादा होता है। मेरा मानना है कि देश-दुनिया में ऐसा कोई दूसरा खेल शायद ही है, जिसमें इस कदर खिलाड़ी एक-दूसरे से भिड़ते हैं और पैरों से ही सब कुछ करते हैं। 
माराडोना हाफ-लाइन से भी अपने बूते गोल करने में सक्षम थे। 1986 के फीफा विश्व कप में इंग्लैंड के साथ मुकाबले में उन्होंने जो ‘गोल ऑफ द सेंचुरी’ किया था, वह यही तो था। उस दिलचस्प मुकाबले में मिडफील्डर हेक्टर एनरिक ने अपनी ही हाफ में उन्हें गेंद पास किया था। इसके बाद डिएगो माराडोना ने इंग्लैंड के चार-चार आउटफील्डर को, जिनमें पीटर बेयर्डस्ले, पीटर रीड, टेरी बुचर और टेरी फेनविक थे, न सिर्फ छकाया, बल्कि गोलकीपर पीटर शिल्टन के बगल से गेंद नेट में डाल दी। अर्जेंटीना और इंग्लैंड का यह वही मैच है, जिसमें ‘द हैंड ऑफ गॉड’ गोल हुआ था। हालांकि, सच यह भी है कि आज कथित तौर पर हाथ से किया गया वह गोल शायद ही मान्य होता। उस वक्त चूंकि फुटबॉल की दुनिया तकनीकी तौर पर इतनी समृद्ध नहीं थी कि एक्शन रिप्ले से ‘सच’ पता चल जाता। तब इंग्लैंड के गोलकीपर पीटर शिल्टन ने ऐतराज भी जताया था, लेकिन अंपायर ने डिएगो माराडोना के पक्ष में फैसला सुनाया। संभवत: विवादित होने की वजह से ही माराडोना ने उसे ‘हैंड ऑफ गॉड’ कहा था, यानी उसे ईश्वर की मर्जी से हुआ गोल बताया था।

माराडोना को पूरी दुनिया के लोगों से खूब प्यार मिला। पिछले विश्व कप में ही वह न तो खिलाड़ी के रूप में, और न ही कोच के रूप में टूर्नामेंट का हिस्सा थे। मगर कोलकाता तक में उनके बड़े-बड़े कटआउट टंगे थे। यह बताता है कि लोग उन्हें किस शिद्दत से चाहते थे। वैसे, माराडोना में भी लोगों का मन मोहने की भरपूर कला थी। मैच से पहले वार्म-अप करते हुए वह जब गेंद को अपनी उंगलियों और पैरों पर नचाया करते थे, तो दर्शक मानो पागल हो जाते थे। वह जगलिंग (फुटबॉल को जमीन पर गिरे बिना पैरों से लगातार उछालना) करते थे। फिर उसे उछालकर छाती में ठीक चुंबक की तरह चिपका लेते थे। फिर उसे अपने सिर पर ले लेते थे। गरदन के नीचे दबा लेते थे। यह सब देखने के लिए दर्शक काफी पहले से अपनी सीट पर जम जाते थे। वाकई, इसे देखना जादू सरीखा होता था।

माराडोना की एक और खासियत थी। वह विभिन्न तरीकों से विपक्षी खिलाड़ियों को छकाने में माहिर थे। इसीलिए उन्हें लगातार ‘मार्क’ करके रखा जाता था, यानी विपक्षी टीम अपने चार-पांच खिलाड़ियों से उन्हें घेर लेती थी। फिर भी, वह न सिर्फ ड्रिबलिंग करते, बल्कि गेंद को आगे ले जाते। ‘मार्किंग’ होने की वजह से जब वह गोल नहीं कर पाते, तो साथी खिलाड़ियों को छोटे-छोटे पास देते और विपक्षी टीम के गोलपोस्ट के करीब पहुंचते। उनका यही प्रयास विपक्ष टीम को दबाव में लाने के लिए काफी होता था।
अपनी अद्भुत प्रतिभा के कारण माराडोना अर्जेंटीना की जूनियर टीम में चयनित होने वाले सबसे युवा खिलाड़ी भी थे। वर्ष 1976-1981 में वह जूनियर टीम के सदस्य रहे। इसके बाद वह राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बने। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए उन्होंने अर्जेंटीना के लिए चार फीफा विश्व कप में भाग लिया, जिसमें 1986 का विश्व कप उन्होंने अपनी कप्तानी में जर्मनी को हराकर देश के नाम किया। खेल-जीवन के अपने चरम पर वह बार्सिलोना और नपोली क्लब से भी जुड़े और अपना  हुनर दिखाया। 

डिएगो माराडोना ने बहुत कम समय में ही अभूतपूर्व सफलता, प्रसिद्धि और धन कमाए। वह अन्य खिलाड़ियों और प्रशंसकों के लिए अविस्मरणीय रहे। मगर उनका पथहीन हो जाना निराशाजनक था। सही पथ-प्रदर्शक न मिल पाने की वजह से उन्हें मैदान से बहुत जल्दी बाहर हो जाना पड़ा। नशा-सेवन को लेकर भी उनकी आलोचना हुई और क्लब के अन्य खिलाड़ियों के साथ मनमुटाव को लेकर भी बदनामी उनके सिर बंधी। लिहाजा, यह कहा जा सकता है कि माराडोना का जीवन एक सीख है कि सफलता प्राप्त करने, उसे बनाए रखने के लिए हमारा अनुशासित रहना जरूरी है। हमें अपनी प्रतिभा व कौशल की कद्र करनी चाहिए और लोगों के सामने मिसाल पेश करनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि महान खिलाड़ियों के जीवन को लोग अपने जीवन में उतारना चाहते हैं। माराडोना बस इसी मामले में थोड़े कमजोर देखते हैं। फिर भी, युवा खिलाड़ी और प्रशंसक उनके जीवन से कई तरह की प्रेरणा ले सकते हैं।
माराडोना ने अर्जेंटीना की राष्ट्रीय राजनीति में भी शिरकत की और वहां की वामपंथी पार्टी को अपना समर्थन दिया। मगर सियासत से ज्यादा वह एक फुटबॉलर के तौर पर ही लोगों को भाए। आर्थिक रूप से कई गरीब खिलाड़ियों की सहायता करके उन्होंने उनका दिल जीता। कुल मिलाकर, वह एक बेहतरीन फुटबॉलर थे और अपने जादुई व्यवहार व कौशल से लोगों को नचाना जानते थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 27 november 2020