DA Image
19 अप्रैल, 2021|8:44|IST

अगली स्टोरी

कुछ रह गए तो सब पर खतरा

Herjinder

एक भी बच्चा छूट गया, सुरक्षा चक्र टूट गया- क्या यह नारा याद है आपको। वैक्सीनेशन यानी टीकाकरण का मूल सिद्धांत यह है कि जितनी जल्दी हो सके, ज्यादातर लोगों को वैक्सीन की सुरक्षा दे दी जाए, तभी महामारी की आफत से निजात पाई जा सकती है। कोविड-19 फैलाने वाले कोरोना वायरस के मामले में तो यह और भी जरूरी है। ऐसे वायरस की दिक्कत यह होती है कि वे अगर रहेंगे, तो नए रूप धरते रहेंगे और हमारी चुनौतियां बदलते, बढ़ाते रहेंगे। आप यह सोचते हुए राहत की आरामकुरसी पर इत्मीनान से बैठे होंगे कि मैंने तो वैक्सीन ले ली है, तभी हो सकता है कि वायरस ऐसा वेष धरकर आपका दरवाजा खटखटाए, जिसके लिए आपकी वैक्सीन भी तैयार न हो। इसलिए जरूरी है कि ज्यादातर लोगों को वैक्सीन लगाई जाए और पूरी दुनिया में लगाई जाए। सुरक्षा का हमारे पास इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है। दुनिया के देशों में सिर्फ इजरायल ही ऐसा है, जिसने अपने सभी नागरिकों को वैक्सीन की दोनों खुराक दे दी है। अमेरिका ने कहा है कि वह एक मई तक इस काम को अंजाम दे देगा। ब्रिटेन ने अगस्त को लक्ष्य बनाया है। पर हम भारतीयों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं है। संतोष की बात सिर्फ इतनी है कि यहां बहुत तेजी से टीकाकरण चल रहा है। समस्या यह जरूर है कि हमारे यहां जिस बड़ी तादाद में टीकाकरण की जरूरत है, उसके मुकाबले हमारा स्वास्थ्य-इंफ्रास्ट्रक्चर काफी कम है, इसलिए समय तो लगेगा ही। लेकिन दुनिया के बहुत से देशों की स्थिति तो शायद इतनी अच्छी भी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरस की बात मानें, तो दुनिया के 130 देश ऐसे हैं, जहां अभी तक वैक्सीन की एक भी खुराक नहीं पहुंची है। विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार कह रहा है कि अगर यही स्थिति रही, तो यह महामारी हाल-फिलहाल में नहीं जाने वाली। यानी जो देश पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करके फिर से पुराने दिनों की रौनक में लौटने का रोडमैप बना रहे हैं, उनके सुरक्षित भविष्य की भी कोई गारंटी नहीं होगी। जिस वैक्सीन को रामबाण मानकर हमने पिछले 12 महीने जैसे-तैसे काटे थे, वह हासिल भले ही हो गई, पर अपने लक्ष्य से बहुत दूर है।
तो इस लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता क्या है? एक रास्ता वह है, जो पिछले साल अक्तूबर में भारत और दक्षिण अफ्रीका ने सुझाया था। इन दोनों देशों ने विश्व व्यापार संगठन को एक पत्र लिखकर यह आग्रह किया था कि कोविड-19 की बनने वाली वैक्सीन से बौद्धिक संपदा अधिकार यानी पेटेंट वगैरह को हटा लिया जाए। इससे इस वैक्सीन को कोई भी कहीं भी बना सकेगा और कहीं भी भेज सकेगा। फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत यही है कि बड़े पैमाने पर वैक्सीन बने, सस्ती बने और सबको उपलब्ध हो और सघन टीकाकरण हो। जाहिर है, इन पत्रों पर किसी ने कान नहीं दिए। उसके बाद से अब तक दुनिया के 80 देश ऐसे पत्र लिख चुके हैं। अभी कोई इस पर ध्यान भले न दे रहा हो, लेकिन इसने अमेरिका की दवा कंपनियों को जरूर चिंतित कर दिया है। इन कंपनियों ने अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को एक संयुक्त ज्ञापन भेजकर कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका ऐसी मांग कर रहे हैं और किसी भी तरह से ऐसा होने से रोका जाए। बाइडन ने इस पर चुप्पी साध ली है, वह न तो इन कंपनियों को नाराज करना चाहते हैं और न ही दुनिया के गुस्से का शिकार बनना चाहते हैं। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इन कंपनियों ने वैक्सीन का विकास और निर्माण अपने निवेश से नहीं किया है, इनमें से लगभग सभी की अमेरिकी सरकार ने बड़ी आर्थिक मदद की है। सबसे पहले वैक्सीन को बाजार में लाने वाली मॉडेरना को तो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इसके लिए 50 करोड़ डॉलर की मदद की थी। यानी अमेरिकी कंपनियों की जितनी भी वैक्सीन बाजार में उतर चुकी हैं, उनमें उनका खुद का नहीं, बल्कि वहां के लोगों और कंपनियों द्वारा दिए गए कर का पैसा है। ये कर भी उन्होंने अपनी उस कमाई में से चुकाए हैं, जो पूरी दुनिया के लोगों के माइक्रोसॉफ्ट और एडोब के सॉफ्टवेयर खरीदने, गूगल और एंड्राएड के इस्तेमाल करने या अमेजन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खरीदारी से उन्हें हुई है। इस गणित से इन टीकों पर पूरी दुनिया का अधिकार बनता है। अब अमेरिकी सरकार के निवेश से इन दवा कंपनियों के शेयरों के भाव लगातार बुलंदी पर जा रहे हैं और उनका बाजार पूंजीकरण भी तेजी से बढ़ रहा है। इस बीच अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट  में एक खबर बांग्लादेश की छपी है। बांग्लादेश की एक दवा कंपनी है इन्सेप्टा, जो वैक्सीन भी बनाती है। उसने वैक्सीन बनाने वाली दुनिया की तकरीबन सभी कंपनियों से कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के लिए मदद मांगी है, लेकिन अभी तक किसी ने पलटकर जवाब तक नहीं दिया है। अमेरिकी कंपनियां खासतौर पर किसी अन्य देश की कंपनी के साथ समझौता करने से बच रही हैं। एकमात्र अपवाद जॉनसन ऐंड जॉनसन है, जिसने एक भारतीय कंपनी से वैक्सीन की एक करोड़ खुराक बनाने का समझौता किया है। जबकि ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड भारत की सीरम इंडिया में बन रही है और यहां इस्तेमाल भी हो रही है। इसी तरह, रूस ने भी अपनी स्पूतनिक वैक्सीन बनाने के लिए डॉ. रेड्डी लेबोरेटरीज से समझौता किया है। अगर बौद्धिक संपदा अधिकार पर भारत और दक्षिण अफ्रीका की मांग स्वीकार कर ली जाती है, तो भारतीय व तमाम दूसरे देशों की और  कंपनियां आगे आ सकती हैं और पूरी दुनिया में वैक्सीन की किल्लत खत्म हो सकती है। अगर नहीं मानी जाती है, तो आगे जाकर यह भारत को परेशान भी कर सकती है। तब यह पूछा जाएगा कि भारत अपने यहां विकसित वैक्सीन को बौद्धिक संपदा अधिकार से क्यों नहीं मुक्त कर देता? जब बौद्धिक संपदा कानून को पूरी दुनिया में लागू करने के लिए विश्व व्यापार संगठन ने आस्तीनें चढ़ाई थीं, तब इसे मानव सभ्यता का एक बड़ा कदम कहा जा रहा था, लेकिन अब जब इस सभ्यता पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है, तो यही कानून अड़चन बना हुआ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column 27 march 2021