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19 जनवरी, 2021|10:39|IST

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आतंकी हमले की ना रहे गुंजाइश 

सुशांत सरीन, पाकिस्तान मामलों के विशेषज्ञ

आज मुंबई हमले की बरसी है। 2008 में आज के ही दिन, यानी 26 नवंबर को पाकिस्तान से आए दहशतगर्दों ने अगले तीन दिनों तक हमारी आर्थिक राजधानी को बंधक बनाए रखा था। उस हमले के कई सबक हमने सीखे। मसलन, गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) में संशोधन करके उसे और सख्त बनाया गया। 31 दिसंबर, 2008 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम संसद से पास किया गया और एक ऐसी संघीय एजेंसी बनाई गई, जो आतंकी घटनाओं की खुद-ब-खुद जांच कर सकती है; उसे इसके लिए राज्य सरकारों की अनुमति की दरकार नहीं है। खुफिया एजेंसियों को भी मजबूत किया गया। उनको ज्यादा संसाधन मुहैया कराए गए। विभिन्न एजेंसियों के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान पर जोर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी बढ़ाए गए। पुलिस तंत्र का ढांचा मजबूत किया गया। हर बड़े शहर में एनएसजी की टुकड़ी तैनात की गई। समुद्री सुरक्षा पर भी खासा जोर दिया गया। सुरक्षा-व्यवस्था में काफी निवेश बढ़ाया गया।
फिर भी, कुछ गड़बड़ियां बनी हुई हैं। जैसे, कोस्ट गार्ड के लिए नाव तो खरीदे गए, लेकिन बेहतर रखरखाव के अभाव में वे अब सड़ने लगे हैं। आतंकी फंडिंग को रोकने के लिए तेजी से काम तो किया गया, और ऐसा पहली बार हुआ, क्योंकि तब तक हमारा जोर आतंकियों के लिए हथियारों की आमद रोकने की होती थी। मगर मनी-लॉन्ड्रिंग नेटवर्क को खत्म करने की कोशिश जिस गंभीरता से होनी चाहिए, उसका अभाव दिखा है।

साफ है, समस्या कई स्तरों पर है। हम यह तो मंथन करते हैं कि जो हमला हो गया है, उसे आगे किस तरह से नाकाम किया जाएगा, पर भविष्य में किस नई शैली में आतंकी घटना हो सकती है, इस पर हम शायद ही विचार करते हैं। आतंकवाद का वैश्विक ट्रेंड यही बताता है कि एक बड़ा हमला दूसरे से अलग होता है। यह फर्क रणनीति, तरीके, माध्यम, सब कुछ में दिखता है। आतंकी गुट हमेशा ऐसे हमले की फिराक में रहते हैं, जिसके लिए हम तैयार नहीं होते। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ जंग में यह जरूरी है कि हमारी खुफिया और जांच एजेंसियां रणनीति के स्तर पर आतंकियों से एक कदम आगे रहें। तभी हम उन छिद्रों को भर पाएंगे, जिनका लाभ आतंकी गुट उठा सकते हैं।

स्थानीय पुलिस को भी, जो आतंकी हमले को रोकने के लिए तुरंत घटनास्थल पर पहुंचती है, खास प्रशिक्षण की दरकार है। उन्हें ऐसे साजो-सामान मिलने चाहिए कि वे थोड़ी देर के लिए ही सही, दहशतगर्दों से लोहा ले सकें। मगर अब तक ऐसे किसी अभियान की शुरुआत नहीं हो सकी है। कहने के लिए मानक ऑपरेटिंग प्रक्रिया (एसओपी) बनाई गई है। इसके तहत हर बड़े सार्वजनिक और निजी केंद्रों पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। लेकिन इन नियमों पर गंभीरता से अमल होते हमने शायद ही देखा है। मॉल वगैरह में गाड़ियों की जांच जिस लापरवाही से होती है, क्या उससे हम आतंकियों को रोक सकते हैं?
अब दहशतगर्द संगठन आधुनिक तकनीक का खूब इस्तेमाल करने लगे हैं। सीरिया में ही इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ड्रोन से बम गिराए और अपने गुर्गों को निर्देशित किया। पिछले दिनों अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसी ने भी खुलासा किया कि स्थानीय दहशतगर्दी तंजीमें बमबारी में ड्रोन का इस्तेमाल करने लगी हैं। अपने यहां भी जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सीमा पार से ड्रग्स और हथियारों की खेप ड्रोन से पहुंचाई गई। ये तमाम उदाहरण बता रहे हैं कि अपनी नापाक मंशा को पूरा करने के लिए आतंकी नए-नए तरीकों से आधुनिक प्रौद्योगिकी को अमल में ला रहे हैं। नौजवानों को भरमाने और अपने प्रचार-प्रसार के लिए इसका उपयोग तो काफी पहले से वे कर ही रहे हैं। फिर भी, हमारी प्रतिक्रिया ढीली है। सरकार यह निश्चय ही नहीं कर पा रही कि इसका तोड़ किस तरह निकाला जाए। समस्या गहराने पर इंटरनेट सेवा को बंद कर देना एकमात्र हल समझा जाता है, जबकि असलियत में हमें अपना निगरानी तंत्र इस कदर विकसित करना चाहिए कि इंटरनेट पर रोक लगाए बिना हम आतंकियों के प्रचार-तंत्र को ध्वस्त कर सकें।

मुश्किल यह भी है कि जांच एजेंसियों के कई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन हैं। उन पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा। मसलन, जम्मू-कश्मीर की सरहद पर स्कैनर लगाने की मांग अरसे से हो रही है, ताकि सीमा पार  से होने वाली ट्रकों की आवाजाही पर निगरानी रखी जा सके और उनके माध्यम से हथियारों, ड्रग्स या अन्य साजो-सामान की तस्करी रोकी जा सके। मगर पिछले दो दशकों से यह प्रस्ताव फाइलों में धूल फांक रहा है। नगरोटा आतंकी हमले में ही जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके आतंकी आए, इस स्कैनर की जरूरत कहीं ज्यादा महसूस की जाने लगी है।

जरूरत सामाजिक तनाव घटाना भी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि देश में कुछ लोग और संगठन कट्टरपंथ की राह बढ़ चले हैं। इस पर समय रहते विचार हो जाना आवश्यक है। सामाजिक तनाव ऐसे तत्वों के लिए खाद-पानी का काम करते हैं। इसे थामना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसका लाभ आतंकी गुट उठा सकते हैं। अजमल कसाब के जिंदा पकड़े जाने से पाकिस्तान के लिए मुंबई हमले में अपनी संलिप्तता नकारना मुश्किल हो गया था, इसलिए अगली बार वह यही कोशिश करेगा कि कोई दहशतगर्द या तो जिंदा न पकड़ा जाए, या फिर वह भारतीय मूल का हो। ऐसे में, वह इन कट्टरपंथी जमातों का इस्तेमाल हमारे ही खिलाफ कर सकता है। वह कतई नहीं चाहेगा कि अगले हमले का ताना-बना खुद उससे जुड़ता दिखे, ताकि वैश्विक मंच पर उसे फिर से खरी-खोटी सुनने को मिले।
साफ है, आतंक के खिलाफ हमारी जंग खत्म होने वाली नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता कि किसी एक गुट को खत्म करके हम आतंकवाद पर विजय पा लें, खासतौर पर जब पाकिस्तान जैसा देश हमारा बगलगीर हो। लिहाजा, आतंकी योजनाओं पर समय-पूर्व पानी फेर देना ही हमारी जांच और खुफिया एजेंसियों की बड़ी जीत होगी, और यही हमारी चुनौती भी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 26 november 2020