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7 मई, 2021|4:16|IST

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असम में तीखा होता चुनावी बिगुल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के शोर में पड़ोसी असम का चुनावी समर भले दब गया हो, पर यहां भी चुनाव कम अहम नहीं हैं। यहां चुनावी समीकरण कई मायनों में बंगाल के ठीक उलट है। मसलन, बंगाल में भाजपा जहां 200 से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं असम में उसका मिशन बहुमत हासिल करना और सरकार बचाना है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि बंगाल में उसके पास खोने को कुछ खास नहीं है, पर असम में उसका बहुत कुछ दांव पर लगा है। 
भाजपा के चुनावी घोषणापत्र से दोनों राज्यों का राजनीतिक समीकरण समझा जा सकता है। पार्टी ने जहां बंगाल में सरकार बनते ही मंत्रिमंडल की पहली बैठक में नए नागरिकता कानून (सीएए) को लागू करने का एलान किया है, तो वहीं असम में उसने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है, जबकि यहीं पर इस कानून का सबसे ज्यादा हिंसक विरोध हुआ था। असम में उसका मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व में बने सात दलों के गठबंधन से है, जिसमें बदरुद्दीन अजमल के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के अलावा कई अन्य क्षेत्रीय दल शामिल हैं। इनमें वह बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) भी है, जो हाल तक भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल था। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में यहां मुकाबला भाजपा और कांग्रेस नीत गठबंधनों के बीच है। बदरुद्दीन अजमल को साथ लेने की वजह से भाजपा के तमाम नेता कांग्रेस को लगातार निशाना बनाते रहे हैं। अजमल को बंगाली मुसलमानों का संरक्षक माना जाता है और बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ में सबसे ज्यादा तादाद ऐसे मुसलमानों की ही रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी तक कई बार असम का दौरा कर चुके हैं, लेकिन पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी तरुण गोगोई के बाद उनके कद के किसी नेता का न होना है। दूसरी ओर, भाजपा के पास असम ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के राजनीतिक चाणक्य कहे जाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेता हैं, जो तरुण गोगोई सरकार में लंबे अरसे तक मंत्री रहे हैं। फिलहाल जो स्थिति है, उसमें बदरुद्दीन अजमल ही कांग्रेस गठबंधन के सबसे बडे़ नेता के तौर पर उभरे हैं। इससे भाजपा को हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण में मदद मिलने की उम्मीद है। असम की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अस्सी के दशक से ही अहम रही है। इस बार भी सीएए-विरोधी आंदोलन की कोख से उपजी दो नई पार्टियों- असम जातीय परिषद और राइजोर दल ने हाथ मिलाया है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी इन पार्टियों के प्रदर्शन के बारे में पूर्वानुमान संभव नहीं है, लेकिन इनका बेहतर प्रदर्शन भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है। जहां तक मुद्दों का सवाल है, तो भाजपा ने अपने घोषणापत्र और चुनाव अभियान के दौरान राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को दुरुस्त करने के अलावा असमिया अस्मिता, भाषा और संस्कृति की रक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया है, लेकिन नागरिकता कानून के मसले पर उसने आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साध ली है। दरअसल, उसे इस मुद्दे के ‘बैकफायर’ करने का संदेह है। ऊपरी असम क्षेत्र में करीब 45 सीटों पर मूल असमिया लोगों, यानी अहोम समुदाय का जबर्दस्त असर है। नागरिकता कानून का सबसे ज्यादा विरोध उसी इलाके में हुआ था। यही वजह है कि भाजपा का पूरा जोर एनआरसी की खामियों को सुधारने और असम के विकास पर है। सरकार में उसकी सहयोगी रही असम गण परिषद (अगप) ने भी अपने घोषणापत्र में सीएए पर चुप्पी साधते हुए असम समझौते की धारा छह को लागू करने की बात कही है।
दूसरी ओर, कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सीएए और एनआरसी को ही प्रमुख मुद्दा बनाया है। इसके जरिए वह अहोम समुदाय के अलावा अल्पसंख्यकों को भी साधने का प्रयास कर रहा है। राज्य के 27 में से नौ जिले अल्पसंख्यक बहुल हैं और कम से कम 49 सीटों पर इस तबके के वोट निर्णायक हैं। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इनमें से 22 सीटें जीती थीं, लेकिन तब कांग्रेस और एआईयूडीएफ के अलग-अलग चुनाव लड़ने की वजह से अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन का फायदा उसे मिला था। मगर इस बार ये दोनों साथ हैं। हर चुनाव की तरह इस बार भी महिलाओं और चाय बागान मजदूरों का मुद्दा सुर्खियों में है। असम के 2.24 करोड़ वोटरों में 1.10 करोड़ महिलाओं को ध्यान में रखते हुए तमाम दलों ने अपने-अपने घोषणापत्रों में इस तबके के लिए आकर्षक वायदे किए हैं। राज्य के 856 चाय बागानों में काम करने वाले 10 लाख मजदूर करीब 40 सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस इनको लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। असम और बंगाल के चाय मजदूरों के हितों के लिए केंद्रीय बजट में 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। भाजपा ने इसका बखूबी प्रचार किया है। राज्य सरकार ने बीते दिनों इन मजदूरों की दैनिक मजदूरी 167 रुपये से बढ़ाकर 217 रुपये करने का फैसला किया था, लेकिन बागान मालिकों की याचिका पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फिलहाल सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी है। हालांकि, बागान मालिकों ने बीते सप्ताह इसे 26 रुपये जरूर बढ़ाया है, लेकिन इससे मजदूरों में नाराजगी है। दरअसल, वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने इस रकम को बढ़ाकर 315 रुपये करने का वायदा किया था, लेकिन चुनाव जीतकर सत्ता में आने के बाद उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। दूसरी ओर, मजदूरों की इस नाराजगी को अपने पक्ष में भुनाने के लिए कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जिन पांच मुद्दों की गारंटी दी है, उनमें चाय मजदूरों की मजदूरी बढ़ाकर दैनिक 365 रुपये करना शामिल है। असम विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के अलावा कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का भी बहुत कुछ दांव पर है। भाजपा अगर बहुमत हासिल कर सरकार में लौटती है, तो एक ओर जहां पूर्वोत्तर की राजनीति में उसकी पकड़ मजबूत होगी, तो वहीं वह यह भी दावा कर सकती है कि एनआरसी और सीएए के प्रति राज्य के लोगों में नाराजगी नहीं है। दूसरी ओर, कांग्रेस गठबंधन के लिए यह चुनाव पार्टी की स्थिति पर जनमत संग्रह साबित होगा। बेहतर प्रदर्शन की स्थिति में कांग्रेस दावा कर सकेगी कि तरुण गोगोई के निधन से उपजे शून्य को पाटने में उसे काफी हद तक कामयाबी मिल गई है और लोगों को अब भी सबसे लंबे समय तक असम पर शासन करने वाली पार्टी पर भरोसा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 26 march 2021