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2 मार्च, 2021|10:48|IST

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समता, स्वतंत्रता और न्याय पर परखें

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सागर विश्वविद्यालय में दीक्षांत भाषण देने आए थे। वह आठ-दस दिनों बाद ही राष्ट्रपति पद ग्रहण करने वाले थे। अपना देश गणतंत्र घोषित होने वाला था। तब मेरे पिता उस विश्वविद्यालय में अधिकारी थे, उनकी ड्यूटी डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की देखभाल में लगी थी। भावी राष्ट्रपति सर्किट हाउस में रुके थे, जो हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं था, तो मैं पिता के साथ चला गया। हम सर्किट हाउस पहुंचे, तो वह अपने कमरे में नहीं थे। चौकीदार ने बताया कि लॉन में बैठे हैं। हम वहां गए, तो हमने देखा कि वह अपनी बंडी के बटन कस रहे थे। जो दस दिन बाद भारत के राष्ट्रपति होने वाले हैं, वह बंडी के बटन कस रहे हैं। उन्होंने मेरे पिता को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने देखा, बटन झूल गया है। दीक्षांत समारोह में ऐसे तो नहीं जाना चाहिए, इसलिए मैं इसे ठीक कर रहा हूं। मेरे मन में पहला प्रभाव यही पड़ा कि यह भारतीय गणतंत्र गांधी से चली रही जो सादगी है, साधारण नागरिक की जो गरिमा है, उसे पहचानने का एक तरीका या व्यवस्था बनेगा। तब स्कूलों में बहुत धूमधाम से हमने गणतंत्र दिवस मनाया था और मैंने अपनी पहली तुकबंदी भी उसी दौरान गणतंत्र की अभ्यर्थना में लिखी थी। इसके दो साल बाद जवाहरलाल नेहरू आए थे, सागर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय भवन का शिलान्यास करने। उस शहर में परिवर्तन यह आया कि सड़कें दुरुस्त कर दी गईं, क्योंकि प्रधानमंत्री की सवारी निकलनी थी। उस समय सामान्य लोगों और नेताओं के बीच दूरी बहुत कम थी। ज्यादातर नेताओं के बारे में यह संदेह भी नहीं होता था कि ये दबे-छिपे कोई गड़बड़ भी करते होंगे। एक तरह की सादगी, पारदर्शिता थी, खुला जीवन था, उनके आपस में झगड़े होते होंगे, लेकिन उनके बारे में आम धारणा यही थी कि समझदार और संवेदनशील लोग हैं। नेताओं के बारे में तब वैसी धारणा नहीं थी, जैसी अब है। उन तक अपनी बात पहुंचाना ज्यादा आसान था। जब मैं नौवीं कक्षा में था, तब विश्व-शांति को लेकर खूब चर्चा थी, एटम बम विस्फोट हुआ था। उस वक्त मैंने प्रधानमंत्री नेहरू को एक चिट्ठी लिखी थी कि हमें शांति के लिए प्रयत्न करने चाहिए। उनका जवाब आया कि जो मुद्दा तुमने उठाया, वह ठीक है, मगर इस वक्त तुमको अपना ध्यान पढ़ाई पर लगाना चाहिए। मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमन को भी चिट्ठी लिखी थी कि आपको शांति के लिए प्रयत्न करने चाहिए। जवाब में ह्वाइट हाउस से एक बड़ा पार्सल आया, जिसमें दुनिया भर के बहुत सारे नक्शों का संग्रह था। तब के नेता लोगों की बहुत परवाह करते थे। एक अलग ही उत्साह होता था। गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस के आयोजनों में हम लोग बहुत उत्साह से शामिल होते थे। आज लोक बदला है। लोक में संकीर्णता, घृणा भाव, भेदभाव बढ़ गए हैं। तंत्र तो मानो स्वेच्छाचार को चलाने वाली मशीन बन गया है। वैसे लोकतंत्र में लोक और तंत्र के बीच तनाव रहता है, और यह तनाव लगभग अनिवार्य है, तंत्र का काम है व्यवस्था बनाए रखना और लोक का काम है उस व्यवस्था को बदलना, तो तनाव होगा ही। हजारों किसान दो महीने से राजधानी की सीमा पर बैठे हैं, लेकिन तंत्र उनकी बात मानने को तैयार नहीं है। जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल की धारणा थी कि एक स्थाई तंत्र देश को अराजक होने से बचाएगा, एक समय तंत्र ने इस भूमिका का निर्वहन भी किया, लेकिन धीरे-धीरे वह राजनीतिक, आर्थिक रूप से भ्रष्ट हो गया। लोक से किए वादे पूरे नहीं हो पा रहे हैं। तंत्र में भी अपवाद हैं, अच्छे लोग भी हैं, लेकिन समग्रता में तंत्र में वैसा साहस है, वैसी सहनशीलता, वह अनेक बार गलत चीजों का बचाव करने लगता है। खासकर हिंदीभाषी अंचल में नागरिक समाज ढंग से विकसित ही नहीं हुआ। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, बंगाल, असम में फिर भी नागरिक समाज है, लेकिन हिंदी समाज के ज्यादातर विश्वविद्यालय ध्वस्त हैं, ज्यादातर शैक्षणिक संस्थाएं और अध्यापक या तो राम भरोसे हैं या राज भरोसे। हिंदी समाज को कोई परवाह नहीं। क्या हिंदी इस समय धर्मांधता, घृणा, भेदभाव और झगडे़ की भाषा बनकर रह गई है? हिंदी साहित्य की जो परंपरा थी, उसे आम हिंदी समाज ने मानो रौंद डाला है। आज गणतंत्र में सुधार के लिए छोटे-छोटे परिवर्तनों की जरूरत है, लेकिन यह इतना बड़ा देश है कि बड़ा परिवर्तन हो, तो कैसे होगा, शंका स्वाभाविक है। छोटे-छोटे सत्याग्रहों से भी एक बड़ा बदलाव हो सकता है। राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, न्यायिक सुधार के लिए लोक को ही आगे आना होगा। किसान आंदोलन का इस मायने में भी खास महत्व है, यह सफल हो या विफल। किसानों ने संगठित राजनीतिक तंत्र से अलग रहकर आंदोलन किया है। इस आंदोलन ने बता दिया है कि लोक अभी भी तंत्र को दबाव में ला सकता है। लोकतांत्रिक और नैतिक दबाव जरूरी है। सारी दुनिया के किसान देख रहे होंगे कि भारत के किसान क्या कर रहे हैं, जिन मुद्दों को इन किसानों ने उठाया है, वे सारी दुनिया में हैं। इसी तरह के प्रयत्न पर्यावरण, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में भी करने की जरूरत है। लोक अपने को फिर मजबूती से स्थापित करने के लिए समय तो लेगा। आज हर चीज का कॉरपोरेटीकरण हो रहा है। तंत्र में बैठे लोगों को क्या यह दिखाई नहीं पड़ रहा है कि अगर हमारी सार्वजनिक संस्थाएं, व्यवस्थाएं ध्वस्त हो गईं, तो बचेगा क्या, हम सब बिकाऊ हो जाएंगे? सुधार की जरूरत है। लोकतंत्र तो अपने को लगातार संशोधित करने वाली प्रक्रिया है। और हमने संविधान को अनेक बार संशोधित किया है। संविधान की बुनियादी मान्यता है कि भारत में हर व्यक्ति नागरिक है। दूसरा, हर नागरिक को स्वतंत्रता, समता और न्याय का अधिकार है। इसे ध्यान में रखकर जांचना शुरू करें कि आखिर जो कुछ हो रहा है, क्या वह हमारी स्वतंत्रता बढ़ाता है या उसे बाधित करता है, सिकोड़ता है? जो कुछ हो रहा है, क्या वह समता फैला रहा है? क्या जो हो रहा है, वह विषमता बढ़ाकर समता को रौंद रहा है? तीसरा, न्याय के नाम पर जो हो रहा है, क्या वह न्याय है? हममें से हर एक नागरिक को इन तीन आधारों पर अपने गणतंत्र को जांचना चाहिए। वे सुधार, जो समता बढ़ाएं, जो स्वतंत्रता का भूगोल बढ़ाएं, जो न्याय को अधिक सजग, संवेदनशील, मानवीय और सच्चा बनाएं, उनका स्वागत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 26 january 2021