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29 अक्तूबर, 2020|9:08|IST

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यह गूगल तो ऐसे ही चलेगी

हरजिंदर हेड-थॉट, हिन्दुस्तान

कहा जाता है कि हर सफल कारोबार की एक ही मंजिल होती है- मोनोपोली, यानी एकाधिकार। हर कारोबारी यही चाहता है कि सारी दुनिया उसकी मुट्ठी में आ जाए। यहां तक कि वे कारोबारी भी, जो सैद्धांतिक तौर पर यही मानते हैं कि स्पद्र्धा कारोबार के लिए बहुत अच्छी होती है और यह सभी को नया करने व सोचने के लिए बाध्य करती है। लेकिन हकीकत में वे भी स्पद्र्धा को खत्म करके बाजार को अपने कब्जे में लेने की कोशिश में ही जुटे दिखाई देते हैं। कुछ इसमें कामयाब भी हो जाते हैं। लेकिन मोनोपोली की दिक्कत यह है कि यह कुछ लंबी भले खिंच जाए, पर स्थाई कभी नहीं होती। हमारे पास ऐसे कारोबारी तो बहुत हैं, जिनका कारोबार कई पीढ़ियों से कामयाब है, लेकिन इतनी लंबी पारी खेलने वाली मोनोपोली बहुत कम है। किसी भी एकाधिकार का हश्र एक दिन खत्म हो जाना ही होता है। इसका अपवाद बस डाक व्यवस्था और परिवहन जैसे वे एकाधिकार ही हैं, जिनका संचालन सरकारें करती हैं। लेकिन इनकी दिक्कत यह है कि इसमें एकाधिकार की पारी तो लंबी चलती है, लेकिन कोरोबारी सफलता बहुत ज्यादा नहीं टिकती। इस समय गूगल के खिलाफ अमेरिका में मोनोपोली का जो मामला चल रहा है, उसमें            इस तरह की कंपनियों की चर्चा करने का बहुत अर्थ भी नहीं है।
जहां तक गूगल का मामला है, तो हमारी दुनिया में एक ऐसी पीढ़ी पैदा होकर जवान भी हो चुकी है, जो गूगल की उंगली पकड़कर इंटरनेट की दुनिया में पहुंची है। बहुत से लोगों के लिए इंटरनेट गूगल से ही शुरू होता है, चाहे वह उनके पास मोबाइल फोन से पहुंचे या फिर लैपटॉप से। वैसे गूगल कंपनी अब सिर्फ इन्हीं तक सीमित नहीं है, वह कार में भी पहुंच चुकी है और टेलीविजन में भी। जल्द ही शायद वह हमारे रेफ्रिजरेटर में भी होगी और वाशिंग मशीन में भी। हो सकता है कि कुछ समय  के  बाद आपके बिजली के बल्ब में भी। 
कंपनी ने 22 साल पहले एक मामूली सी सर्च वेबसाइट के साथ इंटरनेट की दुनिया में कदम बढ़ाया था, लेकिन उसने अब तक इस मैदान से बड़े-बडे़ खिलाड़ियों के पैर उखाड़ दिए हैं। आज इंटरनेट, और खासकर सर्च के 90 फीसदी से ज्यादा कारोबार पर इसका कब्जा है। पूरी दुनिया ने इसे मौजूदा दौर की एक हकीकत के रूप में स्वीकार कर लिया था और इस पर कुछ लोग भले ही बोलते-लिखते रहे, लेकिन बड़ी आपत्ति कभी नहीं हुई। आपत्ति अब हुई है, तो इसकी वजह गूगल का एकाधिकार नहीं, बल्कि यह है कि अब गूगल कंपनी वे सारे रास्ते बंद करने निकल पड़ी है, जिससे हाल-फिलहाल उसका कोई प्रतिद्वंद्वी बाजार में उतर ही न सके। कोई उसके खिलाफ ताल ठोक सके, वह ऐसी नौबत आने ही नहीं देना चाहती। कई बरस से वह सभी स्मार्टफोन कंपनियों पर अपने सर्च इंजन की निर्भरता थोपती आई है, इसका अपवाद बस एप्पल के आईफोन रहे हैं। और अब जब गूगल ने मोटी रकम के बदले एप्पल को भी इसके लिए राजी कर लिया है, तो कई स्तरों पर उसका विरोध शुरू हो गया है। विरोध ही नहीं, यह मामला अब अमेरिका के न्याय विभाग में पहुंच गया है, जहां उसके खिलाफ एंटी ट्रस्ट कानूनों के अनुसार मामला चलेगा। 
वैसे यह मामला चलने का एक और कारण गिनाया जा रहा है कि चुनावी लड़ाई में बुरी तरह घिरे हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप टेक कंपनियों के पीछे लट्ठ लेकर पड़ गए हैं। यह बात तो वह कई बार कह चुके हैं कि टेक कंपनियां उनके खिलाफ हैं। हालांकि, यह मूल मामला जितना गंभीर है, ट्रंप के बयान को उतनी गंभीरता से लेने का फिलहाल कोई अर्थ नहीं।
दूसरी तरफ, अभी से यह मान लेने का कोई अर्थ नहीं है कि गूगल कंपनी पूरी तरह से घिर चुकी है, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी और फिर इंटरनेट बाजार में स्पद्र्धा के एक नए युग की शुरुआत होगी। ऐसा ही एक मामला दो दशक पहले माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ तब शुरू हुआ था, जब उसने ब्राउजर के बाजार में नेटस्केप नेविगेटर को मात देने के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम के अपने एकाधिकार का बेजा फायदा उठाने की कोशिश की थी। लेकिन यह मामला ज्यादा चला नहीं। न्याय विभाग ने खुद ही इसे निपटाकर माइक्रोसॉफ्ट को सस्ते में छोड़ दिया। 
अमेरिका के लिए माइक्रोसॉफ्ट और गूगल सिर्फ कारोबार नहीं हैं, वे तकनीक की दुनिया में अमेरिकी दबदबे का बहुत बड़ा प्रतीक भी हैं। जिसे हम इन कंपनियों का एकाधिकार कहते हैं, वही दरअसल दुनिया के बाजार में अमेरिका के बड़े रुतबे का एक जरिया भी है। भले ही सैद्धांतिक तौर पर यह एकाधिकार बहुत से लोगों को बुरा लगता हो और भले ही यह नैतिक रूप से गलत भी हो। भले ही अमेरिका के कुछ बुद्धिजीवी, हाशिये के कुछ कार्यकर्ता समूह और खुद अमेरिकी बाजार के ही छिटपुट खिलाड़ी ऐसे एकाधिकार के खिलाफ कमर कसे हुए हों, लेकिन अमेरिकी सत्ता शायद यह कभी नहीं चाहेगी कि यह एकाधिकार पूरी तरह से खत्म हो। इस एकाधिकार का कम होना या इन कंपनियों का कमजोर होना दरअसल अमेरिकी रुतबे की जड़ों में ही मट्ठा डालने का काम करेगा। इसलिए गूगल के खिलाफ चलने वाला मामला भी देर-सवेर वहीं पहुंचेगा, या शायद वहीं पहुंचा दिया जाएगा, जहां कभी माइक्रोसॉफ्ट का मामला पहुंचा था।
खतरा जितना दो दशक पहले था, अब उससे कहीं ज्यादा बड़ा है। बीस साल पहले माइक्रोसॉफ्ट कंपनी अगर कमजोर भी हो जाती, तब भी उसका विकल्प अमेरिका से ही उभरता। पर अब इसकी गारंटी नहीं है। आज यह विकल्प पूरी दुनिया में कहीं से भी सामने आ सकता है। उस चीन से भी, जिससे आज के अमेरिका को सबसे ज्यादा डर लगता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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