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यही विधान हमें आगे की राह दिखाएगा

संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के स्वार्थों की रक्षा के अतिरिक्त मैं अन्य किसी महानतर आकांक्षा को लेकर नहीं आया था। मुझे स्वप्न में भी यह विचार नहीं आया था कि मुझे और भी बड़े कार्यों को हाथ...

यही विधान हमें आगे की राह दिखाएगा
Amitesh Pandeyभीमराव आंबेडकर, संविधान निर्माताFri, 24 Nov 2023 11:02 PM
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संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के स्वार्थों की रक्षा के अतिरिक्त मैं अन्य किसी महानतर आकांक्षा को लेकर नहीं आया था। मुझे स्वप्न में भी यह विचार नहीं आया था कि मुझे और भी बड़े कार्यों को हाथ में लेने के लिए बुलाया जाएगा। इस कारण जब सभा ने मुझे मसौदा समिति में निमंत्रित किया, तो बड़ा आश्चर्य हुआ और जब मुझे मसौदा समिति का सभापति चुना गया, तो और आश्चर्य हुआ। मसौदा समति में मुझसे बड़े, मुझसे अच्छे और मुझसे सक्षम व्यक्ति विद्यमान थे, जैसे मेरे मित्र अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर। ...जो मुझे श्रेय दिया गया है, उसका वास्तव में मैं अधिकारी नहीं हूं। उसके लिए अधिकारी बी एन राउ भी हैं, ... जिन्होंने मसौदा समिति के विचारार्थ संविधान का एक मोटे रूप में मसौदा बनाया। ...सबसे अधिक श्रेय इस संविधान के मुख्य मसौदा लेखक एन एन मुखर्जी को है।... 
यदि पक्ष के अनुशासन का कठोरता से पालन किया जाता, तो यह सभा जी हुजूरियों की सभा बन जाती। सौभाग्यवश कुछ द्रोही थे। मुझे प्रोफेसर के टी शाह और पंडित हृदयनाथ कुंजरू का भी उल्लेख करना चाहिए। जो प्रश्न उन्होंने उठाए वे बड़े सिद्धांतपूर्ण थे...। मैं उनका कृतज्ञ हूं। यदि वे न होते, तो मुझे वह अवसर नहीं मिलता, जो मुझे इस संविधान में निहित सिद्धांतों की व्याख्या करने के लिए मिला...। 
इस संविधान की निंदा अधिकतर दो क्षेत्रों से की जाती है। साम्यवादी पक्ष द्वारा और समाजवादी पक्ष द्वारा। वे क्यों इस संविधान की निंदा करते हैं? क्या इसलिए कि यह संविधान वास्तव में खराब है? मैं यह कहने का साहस करता हूं कि नहीं है। साम्यवादी पक्ष श्रमिकों की तानाशाही के सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहते हैं, वे संविधान की इस कारण निंदा करते हैं कि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। ...समाजवादी यह चाहते हैं कि संविधान में वर्णित मूलाधिकार निरपेक्ष तथा बिना किसी परिसीमा के होने चाहिए, जिससे यदि उनके पक्ष के हाथ में शक्ति आ जाए, तो उन्हें आलोचना करने के लिए ही नहीं, वरन राज्य को उलटने तक के लिए भी पूरी-पूरी आजादी मिल जाए। 
...सांविधानिक अर्थ की केवल एक बात है, ...बड़ी शिकायत की गई है कि केंद्रीकरण बहुत अधिक है और राज्यों की स्थिति नगरपालिकाओं जैसी कर दी गई है। यह स्पष्ट है कि यह विचार केवल अतिशयोक्ति ही नहीं है, बल्कि यह इस बात के प्रति मिथ्याधारणा पर भी आधारित है कि संविधान यथार्थ रूप में किन-किन बातों के लिए प्रयास करता है। ...हमारे संविधान के अधीन राज्य अपने विधायी और कार्यपालिका अधिकार के लिए किसी प्रकार से भी केंद्र पर आश्रित नहीं हैं। इस विषय में केंद्र और राज्यों की स्थिति समान है। यह अनुभव करना कठिन है कि ऐसे संविधान को केंद्रवादी किस प्रकार कहा जा सकता है। ...यह हो सकता है कि विधायी तथा कार्यपालिका प्राधिकार के प्रवर्तन के लिए केंद्र को जितना क्षेत्र किसी अन्य संघीय संविधान में दिया गया है, उससे अधिक क्षेत्र इस संविधान में दिया गया हो। ...मैं कह चुका हूं संघीय शासन पद्धति की मुख्य बात यह है कि संविधान द्वारा केंद्र और एककों में विधायी तथा कार्यपालिका प्राधिकार का विभाजन हो। यह सिद्धांत हमारे संविधान में निहित है। इसमें कोई भ्रम हो ही नहीं सकता। अत: यह कहना गलत है कि राज्य केंद्र के अधीन रख दिए गए हैं। केंद्र अपनी स्वेच्छा से उस विभाजन में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है, न न्यायपालिका कर सकती है। 
...केवल राजनैतिक लोकतंत्र से ही हमें संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। अपने राजनैतिक लोकतंत्र को हमें सामाजिक लोकतंत्र का रूप भी देना चाहिए। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थ जीवन के उस मार्ग से है, जो स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में अभिज्ञात करता है। ...यदि हम इस संविधान की रक्षा करना चाहते हैं, जिसमें हमने जनता के लिए जनता द्वारा जनता की सरकार के सिद्धांत की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है, तो हम इस बात का संकल्प करें कि जो बुराइयां हमारे मार्ग में हैं और जिनके कारण जनता के लिए सरकार को जनता द्वारा सरकार से अधिक पसंद करती है, उन बुराइयों को समझने में विलंब न करें और उन बुराइयों को दूर करने के उपक्रम में कमजोरी न दिखाएं। देश सेवा का यही मार्ग है। इससे अच्छे मार्ग से मैं परिचित नहीं हूं।
    (संविधान सभा में दिए गए भाषण के अंश) 

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