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आशा के अनुरूप नहीं बन सका संविधान

अध्यक्ष महोदय, संविधान-विषयक इस वाद-विवाद के अवसर पर मैं समझता हूं कि यह आवश्यक है कि मैं उन भूलों की ओर तथा जान-बूझकर की हुई गलतियों की ओर ध्यान दिलाऊं , जिनके संबंध में यथा समय मैंने संशोधन...

आशा के अनुरूप नहीं बन सका संविधान
Amitesh Pandeyके टी शाह, संविधान सभा सदस्यFri, 24 Nov 2023 10:58 PM
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अध्यक्ष महोदय, संविधान-विषयक इस वाद-विवाद के अवसर पर मैं समझता हूं कि यह आवश्यक है कि मैं उन भूलों की ओर तथा जान-बूझकर की हुई गलतियों की ओर ध्यान दिलाऊं , जिनके संबंध में यथा समय मैंने संशोधन उपस्थित किए थे। चूंकि उन संशोधनों को, लगभग उनमें से प्रत्येक को, मसौदाकारों ने पसंद नहीं किया, इसलिए मैं यह समझता हूं कि इस अंतिम अवसर पर मैं उन गलतियों की ओर ध्यान आकृष्ट कर दूं। ...मेरे इस कथन से यह न समझा जाए कि मसौदा समिति तथा उसके सभापति और कुछ अन्य सदस्यों ने जो कठिन परिश्रम किया है तथा जिस बुद्धिमत्ता और सावधानी का परिचय दिया है, उसकी मैं प्रशंसा नहीं करता। 
...मेरे विचार से यह संविधान दूषित है और इस कारण उस स्वरूप को प्राप्त नहीं है, जिस स्वरूप की हमें आशा थी। ... हो सकता है कि संविधान का स्वरूप लोकतांत्रिक हो और उसका लक्ष्य भी लोकतंत्र ही हो। किन्तु यदि कोई व्यक्ति इस संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों की सावधानी से परीक्षा करे, तो उसे ज्ञात हो जाएगा कि लोगों का शासन, लोगों के लिए शासन और लोगों द्वारा शासन के रूप में लोकतंत्र की मंजिल अभी बहुत दूर है। ... बहाना यह बनाया गया है कि अभी हम लोकतंत्र को पूर्ण रूप से व्यवहार में लाने के उपायों को अपनाने के योग्य नहीं हुए हैं। हमसे कहा गया है कि हमें अधिक अनुभव की आवश्यकता होगी और अधिक शिक्षा की भी आवश्यकता होगी। ...आपका जनसाधारण पर विश्वास नहीं है। इससे भी अधिक सच्चाई इस कथन में है कि आपको अपने नेताओं पर ही विश्वास नहीं है। ...सम्पूर्ण संविधान में कोई भी ऐसी बात नहीं है, जिससे यह प्रकट होता हो कि ये अधिकार और स्वतंत्रताएं केवल कागज पर लिखे हुए अधिकार नहीं रहेंगे...।
मेरे विचार से इस संविधान में मूलाधिकार तथा नागरिक स्वतंत्रताओं के विषय में जो अध्याय है, उससे अधिक दुखद अध्याय और कोई नहीं है। ...आप पूर्ण अधिकार इसलिए नहीं दे रहे हैं, क्योंकि आपको भय है कि लोकतंत्र नृशंस समूहतंत्र में बदल जाएगा। इसलिए आपने नागरिकों के आभार—विषयक अध्याय को प्रतिबंधित किया है। ... इस देश में कार्यशील लोकतंत्र अभी भविष्य की ही व्यवस्था है। कम से कम उसे इस संविधान में कोई स्थान नहीं मिला है। 
...प्रशासन को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए इस सभा में बार-बार प्रयत्न किए  गए, किंतु वे उतने सफल नहीं हुए, जितने सफल होने की मुझे आशा थी। ... बहुत से निकायों के पारस्परिक संबंध, विभिन्न अंगों की स्थापना तथा स्थानीय स्थापित शासन का स्वरूप ही बहुत सीमित है। यदि आप केंद्र के तथा स्थानीय एककों (राज्यों) के, कृत्यों अथवा विषयों से संबद्ध अनुसूचियों की परीक्षा करें, तो आपको विदित हो जाएगा कि स्थानीय एककों को बिल्कुल अशक्त बनाया गया है। अपने कर्तव्यों का सुचारु रूप से निर्वहन करने के लिए न तो उनके पास शक्ति है और न धन ही। मुझ से पूर्व बोलने वाले एक वक्ता महोदय यह कह चुके हैं कि वास्तविक स्वशासन तथा लोकतंत्र केवल एककों (या राज्यों) में ही सम्भव है। केंद्र में केवल एककों के प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि होने चाहिए...। 
...वह तथ्य यह है कि जिस रूप में संविधान इस समय है, उस रूप में उसके द्वारा वास्तविक व्यावहारिक लोकतंत्र का उतना विकास नहीं होगा, जितना फासिज्म का विकास होगा। एककों की अपेक्षा केंद्र में इसका खतरा अधिक है। संविधान में आपने राज्य के प्रधान में, जो वास्तव में नाममात्र का प्रधान होगा और प्रधानमंत्री उसके नाम पर काम करेगा, शक्तियों का केंद्रीकरण किया है और इस कारण यदि प्रधानमंत्री चाहे, तो वह वास्तव में एक तानाशाह हो सकता है। इस दशा में मंत्रिमंडल के सहकारी तथा संसद भी केवल उसके रजिस्ट्री के दफ्तर का रूप धारण कर लेगी। ...
मैं यह कहने के लिए तैयार हूं कि अनेक दोषों के होते हुए भी हम इस संविधान को इस प्रकार व्यवहार में लाएं कि इसमें सन्निहित भावना से हमारा पथप्रदर्शन हो तथा इसी की छत्रछाया में हम आगे बढ़ें। ...मुझे विश्वास है कि दोषों तथा कमजोरियों के होते हुए भी इस संविधान को इस प्रकार क्रियान्वित किया जा सकता है कि थोड़े ही समय में वास्तविक लोकतंत्र स्थापित हो जाएगा और यदि निकट भविष्य में नहीं, तो पांच या दस वर्षों में यहां के लोग अपने देश के वास्तविक शासक हो जाएंगे। 
    (संविधान सभा में दिए गए भाषण के अंश) 

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