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22 जनवरी, 2021|8:24|IST

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जिंदगी और जेब के मुताबिक हो सफर

पिछले साल 4 अक्तूबर को बडे़ जोर-शोर से देश की पहली ‘कॉरपोरेट’ ट्रेन तेजस को पटरी पर उतारा गया था। यह लखनऊ और नई दिल्ली के बीच दौड़ रही थी, जबकि इस साल 17 जनवरी को अहमदाबाद और मुंबई के बीच दूसरी तेजस सेवा शुरू की गई। दावा किया गया था कि इससे स्वस्थ प्रतियोगिता का माहौल बनेगा और भारतीय रेल-सेवा का कायाकल्प हो जाएगा। मगर अब इन ट्रेनों को जारी न रखने का फैसला लिया गया है। यात्रियों की कम होती संख्या को देखते हुए ऐसा किया गया है, जिसका ठीकरा कोविड-19 महामारी पर फोड़ा जा रहा है। मगर तेजस के अब तक के सफर को देखें, तो इसकी यह नियति तय थी।
बेशक, पहले महीने में लखनऊ तेजस से करीब 70 लाख रुपये फायदा कमाने की खबरें आईं, लेकिन बाद के दिनों में यह ट्रेन घाटे में ही रही। अहमदाबाद तेजस की कहानी भी कमोबेश यही कही जाएगी। यह स्थिति इसलिए बन गई थी, क्योंकि इनमें सफर की कीमत सार्वजनिक रेल-सेवाओं से खासा ज्यादा थी। रही-बची कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी। आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन से पहले जहां ये अपनी कुल क्षमता के मुकाबले 50-80 फीसदी यात्रियों को लेकर दौड़ा करती थीं, तो वहीं कोरोना-काल में यह संख्या घटकर 24 से 40 फीसदी रह गई थी। जाहिर है, किसी निजी कंपनी के लिए यह घाटा लगातार बर्दाश्त करना मुश्किल था, लिहाजा इन ट्रेनों का परिचालन बंद करने का फैसला लिया गया। 
संभव है कि आने वाले महीनों में तेजस की फिर से शुरुआत हो जाए, लेकिन इसने कई जरूरी सबक हमारे नीति-नियंताओं को दिए हैं। पहला संदेश तो यही है कि जिस देश में 25.7 फीसदी ग्रामीण आबादी और 13.7 प्रतिशत शहरी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे बसर करती हो, और जहां कोरोना महामारी में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज पहुंचाने की मजबूरी हो, वहां पर ऐसी महंगी सेवाओं की कल्पना नहीं की जा सकती, जो अधिकांश लोगों की पहुंच से दूर हो। सच यही है कि आज भी देश में कई लोगों के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे सुविधा-संपन्न यात्रा कर सकें। खर्च की तुलना में कम किराया वसूलकर भारतीय रेलवे उनकी मुश्किलें कम करने की कोशिश करता है। ये वे लोग हैं, जो शहरों में हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं और अपने परिवार को गांव में रखते हैं। जब इन लोगों के पास साधारण टिकट खरीदने के ही पैसे नहीं हैं, तो भला तेजस जैसी प्रीमियम ट्रेन के टिकट कैसे खरीद सकेंगे?
यातायात के दो जरूरी पहलू होते हैं। एक, वह सुरक्षित होना चाहिए और दूसरा, उसकी कीमत वाजिब होनी चाहिए। निजी सेवाएं सुरक्षित तो हो सकती हैं और सुविधा संपन्न भी, पर उनकी कीमत भी वाजिब हो, इसकी गारंटी नहीं है। कहा यह भी जाता है कि भारतीय रेल घाटे में रहती है, इसलिए कुछ सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना जरूरी है। मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। मुझे याद है कि जब दिव्यांगों को रेल-यात्रा में सुविधाएं देने संबंधी पीआईएल दाखिल किया गया था, तब जो कमिटी बनाई गई थी, उसमें मैं शामिल था। तमाम तर्क-वितर्क के बाद जब सहमति बन गई, तो रेलवे के पास जरूरी पैसा भी आ गया। इसी तरह, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिव्यांग शब्द गढ़े, तब भी रेलवे में उनके लिए अतिरिक्त फंड जुटाए गए। मैं यह नहीं कहता कि रेलवे के पास पर्याप्त पैसे हैं, मगर हां, सरकार के पास ऐसे कई मद हैं, जहां से पैसे जुटाए जा सकते हैं। इसीलिए, मैं एअर इंडिया को बेचने के भी खिलाफ हूं। सार्वजनिक क्षेत्र की यह विमानन सेवा करीब 60 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में डूबी है। सरकार चाहे, तो इन पैसों का बंदोबस्त कर सकती है। आखिरकार निजी विमानन कंपनियों को आम आदमी के टैक्स का पैसा बतौर बेलआउट दिया ही जाता है। तो फिर, महाराजा को चलाने के लिए इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई जाती?
अपने यहां यातायात-सेवाओं के निजीकरण का जो हश्र हुआ है, उसे देखते हुए बुलेट ट्रेन को लेकर भी चिंताएं बढ़ गई हैं। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत सरकार इस परियोजना पर आगे बढ़ रही है। मगर पीपीपी को पीपीपीपीपी कहना ज्यादा उचित होगा, यानी निजी कंपनी का सरकारी संपत्ति पर विशेषाधिकार (प्रिविलेज ऑफ पब्लिक प्रॉपर्टी बाय प्राइवेट पार्टी)। फिर, भारत में रेल सेवा महज यातायात का साधन नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से जो आर्थिक गतिविधियां होती हैं, उससे भी सरकार को परोक्ष रूप से फायदा मिलता है। इसी कारण तो वह यात्रियों को सब्सिडी भी देती है। जबकि निजी कंपनियों के लिए यह सिर्फ पैसे बनाने का माध्यम है। अगर उन्हें फायदा नहीं होगा, तो वे तुरंत अपने हाथ खींच लेंगी। दिल्ली में ही मेट्रो एक्सप्रेस लाइन में हमने देखा है कि किस तरह एक निजी कंपनी घाटे का रोना रोकर इससे अलग हो गई और सारा बोझ डीएमआरसी के कंधों पर आ गया।
निजीकरण के पक्ष में दिया जाने वाला यह तर्क भी उचित नहीं जान पड़ता कि निजी कंपनियों के कर्मचारी तुलनात्मक रूप से बेहतर काम करते हैं। दिल्ली मेट्रो का अनुभव बताता है कि यहां काम करने वाले अधिकतर इंजीनियर भारतीय रेल से बुलाए गए हैं। इसका अर्थ है कि कर्मचारी तो वही होते हैं, काम करने की उनकी योग्यता भी समान होती है, सिर्फ उन्हें निर्देशित करने वाले हाथ बदल जाते हैं, यानी अगर सरकारी क्षेत्र की कंपनियों की कार्य-प्रणाली को दुरुस्त कर दिया जाए, तो यहां भी निजी क्षेत्र की तरह ‘अच्छे’ ढंग से काम हो सकेगा।
बहरहाल, किसी भी लोकतंत्र में सरकार का मकसद आम जनजीवन को सुधारना होता है। इसमें परिवहन क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। लोगों को जब गुणवत्तापूर्ण जीवन मिलता है, तो उन्हें बेहतर काम-काज भी मिलने लगता है। इस तरह एक बड़ा सामाजिक बदलाव होता है। निजी कंपनियां इस सामाजिक जवाबदेही से दूर भागती हैं। वे अगर सुविधाएं देंगी भी, तो ऊंची कीमत वसूलेंगी। ऐसे में, भारत जैसे विकासशील देशों में निजीकरण भला कितना कारगर होगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 25 november 2020