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ओपिनियनसख्त तालाबंदी को मजबूर दक्षिण

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Manish Mishra
Mon, 24 May 2021 11:11 PM
सख्त तालाबंदी को मजबूर दक्षिण

रविवार को चेन्नई से दो चौंकाने वाली, लेकिन विपरीत तस्वीरें सामने आईं, जिनसे कोरोना वायरस से निपटने को लेकर तमिलनाडु की दुविधा उजागर हो गई। एक लोकप्रिय अखबार की वेबसाइट ने एक तरफ सब्जी व किराना बाजार की तस्वीर दिखाई, जहां बड़ी संख्या में लोग खरीदारी करने जमा हुए थे, क्योंकि राज्य में सोमवार से एक सप्ताह के सख्त लॉकडाउन का एलान किया गया था। वहीं दूसरी तरफ, राजीव गांधी के नाम वाले शहर के एक प्रमुख सरकारी अस्पताल में टीकाकरण केंद्र पर एक भी व्यक्ति टीका लेने नहीं पहुंचा। तमिलनाडु में ‘पॉजिटिविटी रेट’ काफी ज्यादा 20 फीसदी है, जिसका अर्थ है कि जांच कराने वाले हर पांच व्यक्ति में से एक संक्रमित पाया जा रहा है। अनुमान है, अगले दो सप्ताह में यहां संक्रमण चरम पर पहुंच सकता है। इस प्रसार-चक्र को तोड़ने के लिए ही सूबे की सरकार ने चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह पर सख्त लॉकडाउन लगाने का फैसला किया है। हालांकि, यह वायरस का प्रसार तो धीमा कर देगा और अस्पतालों में बिस्तरों (खासकर ऑक्सीजन सुविधा वाले) की उपलब्धता भी बढ़ा देगा, लेकिन यह पुन: संक्रमण या नए संक्रमण को रोकने की गारंटी नहीं देगा। इसके लिए तो राज्य में तेज टीकाकरण अभियान चलाने की दरकार है, जो दुर्भाग्य से इस समय धीमा हो गया है।

अब तक यहां की 10-11 फीसदी आबादी को ही टीका लग सका है। 18-44 आयु वर्ग वालों के लिए भी टीकाकरण शुरू करने के केंद्र के फैसले से राज्य पर भारी दबाव है। लिहाजा, राज्य सरकार ने 3.5 करोड़ खुराक के लिए ‘ग्लोबल बिड’ (वैश्विक निविदा) जारी की है। यहां 18-44 आयु वर्ग की 3.65 करोड़ आबादी है, जिसके 70 फीसदी हिस्से के टीकाकरण के लिए करीब 2.5 करोड़ खुराक की जरूरत है। दोनों खुराकों को जोड़ दें, तो राज्य को पांच करोड़ खुराक चाहिए। चूंकि केंद्र से 1.5 करोड़ खुराक मिलने की उम्मीद है, इसलिए शेष 3.5 करोड़ खुराक सीधे आयात करने का फैसला लिया गया है। चूंकि निविदा में किसी भी देश को प्रतिबंधित नहीं किया गया है, इसलिए चीन भी इसमें भाग ले सकता है। द्रमुक सरकार ने हाल ही में शासन संभाला है और उस पर दबाव ज्यादा है, क्योंकि बड़ी संख्या में नौजवानों ने टीकाकरण के लिए पंजीकरण कराया है और उसके पास सभी को देने के लिए टीके नहीं हैं। फिर भी, लोग बाजार में सामाजिक दूरी का उल्लंघन कर रहे हैं। इसीलिए राज्य सरकार ने मजबूर होकर कुछ होम डिलिवरी सुविधाओं को छोड़कर सभी दुकानों को बंद करने की घोषणा कर दी। पड़ोसी राज्य केरल में तो लॉकडाउन महीने के अंत तक बढ़ा दिया गया है। वहां 8 मई से सख्त तालाबंदी है। हालांकि, जिन चार जिलों में तेज संक्रमण के कारण ‘ट्रिपल लॉकडाउन’ लागू था, उनमें से तीन जिलों में राहत दी गई है। राज्य में पॉजिटिविटी रेट पहले 22 फीसदी के आसपास थी, उसमें मामूली कमी आई है, लेकिन चिंता की बात यह है कि महामारी के बाद से जो मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत (1.3 फीसदी) के मुकाबले बेहद कम 0.4 फीसदी थी, उसमें इजाफा होने का अंदेशा है। इससे प्रदेश सरकार और स्वास्थ्यकर्मी बहुत चिंतित हैं।
तमिलनाडु की तरह केरल ने भी वैश्विक निविदा जारी की है। उसे तीन करोड़ टीके की जरूरत है। यहां 1.1 करोड़ से अधिक लोगों को टीका लग चुका है, जो देश के तमाम राज्यों में सर्वाधिक है। राज्य की आबादी 3.5 करोड़ है और यह अधिकाधिक लोगों का टीकाकरण करना चाहता है। यहां हर आयु वर्ग के लोग सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में टीका ले सकते हैं। इसी तरह, कर्नाटक में संक्रमण की दर काफी ऊंची है। अन्य दो दक्षिणी राज्य- तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में, जो कभी ऊंची पॉजिटिविटी रेट की समस्या से जूझ रहे थे, संक्रमण के प्रसार में थोड़ी-बहुत कमी आई है। मगर ये तीनों सूबे टीकाकरण की धीमी रफ्तार से चिंतित हैं। इसीलिए जहां तमिलनाडु ने 3.5 करोड़ खुराक के लिए वैश्विक निविदाएं जारी की हैं, तो केरल ने तीन करोड़ खुराक के लिए और आंध्र व तेलंगाना ने एक-एक करोड़ खुराक के लिए वैश्विक बाजार का दरवाजा खटखटाया है। इन चारों गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारों ने यह जानते हुए भी वैश्विक निविदाएं जारी की हैं कि वैश्विक बाजार में टीके की भारी कमी है और जितनी आपूर्ति हो रही है, मांग उससे कहीं ज्यादा है। उनको इसलिए ऐसा करना पड़ा, क्योंकि केंद्र सरकार अपनी ‘मेक इन इंडिया’ नीति से पीछे हट गई है और राज्यों को अपनी जरूरतों का एक हिस्सा खुद खरीदने को कहा है। नतीजतन, राज्य उन टीका-निर्माताओं के यहां दौड़ लगा रहे हैं, जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन या अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, जापान जैसे देशों के नियामकों ने आपातकालीन उपयोग के लिए मान्यता दी है। राज्य सरकारें इसलिए भी वैश्विक निविदाएं जारी कर रही हैं, ताकि अपने-अपने प्रदेश की जनता को वे यह दिखा सकें कि इस मुश्किल वक्त में ‘काफी कठिन प्रयास’ कर रही हैं; वह भी तब, जब केंद्र ने ‘अपने हाथ पीछे खींच’ लिए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवद्र्धन ने घोषणा की थी कि मई से जुलाई के बीच टीके की 30 करोड़ खुराक उपलब्ध कराई जाएगी। इसकी आपूर्ति दो भारतीय कंपनियां- भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया करेंगी। उन्होंने वादा किया था कि अन्य 216 करोड़ खुराकें अगस्त से दिसंबर के बीच मिलेंगी। माना जा रहा है कि देश को कोरोना वायरस की तीसरी लहर से बचाने के लिए अगले दो-तीन महीने में 51 करोड़ लोगों का टीकाकरण होना चाहिए। जिन्हें टीके की दोनों खुराकें मिल गई हैं, उन्हें शायद ही आईसीयू में भर्ती कराने की नौबत आती है। चूंकि 18 साल से कम उम्र वालों को अभी टीका नहीं लगेगा और अब तक देश में लगभग 13 करोड़ लोगों को टीका लग चुका है, इसलिए अन्य 51 करोड़ लोगों (यानी कुल 65 करोड़ लोग अंदाजन, जो कुल आबादी का 50 प्रतिशत हिस्सा होंगे) का टीकाकरण हमें तीसरी लहर से बचा सकता है। मगर बड़ा मसला है, टीकों को कम कीमत पर प्राप्त करना। चूंकि राज्य सरकारें, और मुंबई जैसी नगरपालिकाएं भी अपने स्तर पर निविदाएं जारी कर रही हैं, इसलिए टीके की कीमत और टीका पाने की प्रक्रिया, दोनों जटिल हो सकती हैं। उम्मीद बस यही है कि केंद्र जल्द ही इस मुश्किल से पार पाने का कोई रास्ता खोज निकालेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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