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कसौटी पर परखे जाएंगे तीन कानून

मनुष्यता के इतिहास में मूल्यगत परिवर्तन बड़े धीमे-धीमे होते हैं और कई बार तो सैकड़ों साल लग जाते हैं किसी ऐसे परिवर्तन को स्वीकृति प्राप्त करने में, जो हमारी समूची गतिविधियों को प्रभावित कर सकता हो...

कसौटी पर परखे जाएंगे तीन कानून
vibhuti narayan rai
Pankaj Tomarविभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारीMon, 24 Jun 2024 11:01 PM
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मनुष्यता के इतिहास में मूल्यगत परिवर्तन बड़े धीमे-धीमे होते हैं और कई बार तो सैकड़ों साल लग जाते हैं किसी ऐसे परिवर्तन को स्वीकृति प्राप्त करने में, जो हमारी समूची गतिविधियों को प्रभावित कर सकता हो। पिछली शताब्दी इस अर्थ में बड़ी महत्वपूर्ण रही है कि इसमें बदलाव बड़ी तेजी से घटित हुए। कई बार तो कुछ दशकों में ही इतने बडे़ मूल्यगत परिवर्तन हुए, जितने कई शताब्दियों में हुआ करते थे। यौनिकता एक ऐसा ही क्षेत्र है, जिसमें बदलाव की सुनामी आसानी से महसूस की जा सकती है। लंबे संघर्षों के बाद मैग्नाकार्टा और फ्रांसीसी क्रांति के चरण पार करते हुए मानव इतिहास ने कानून की सर्वोच्चता को स्वीकार किया और धीरे-धीरे राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की धारणा कमजोर होती गई। इस बदलाव ने ही कानून के राज्य की अवधारणा को विकसित किया और वे सारे परिवर्तन संभव हुए, जिनकी कुछ शताब्दियों पहले कल्पना करना भी संभव न था।
मनुष्य जाति पहले तो परिवर्तनों को नकारने की कोशिश करती है, पर एक बार स्वीकृत करने के बाद कुछ को नियमों या संहिताओं के रूप में संरक्षित करती है और फिर उनके माध्यम से अपने जीवन का संचालन करती है। ऐसा ही एक क्षण भारतीय राज्य के जीवन में 1860 के दशक में आया, जब पहली बार उसने बड़े विस्तार से अपराध को परिभाषित करने और समाज को उससे बचाने के उपायों पर विचार किया। इस दशक में भारतीय दंड संहिता, नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम जैसे कानून अस्तित्व में आए और इनके जरिये भारतीय समाज ने अपराध और दंड की एक नई समझ विकसित की थी। यह समझ एक लंबे समय तक शासकों के तो काम आती ही रही, शासितों को भी उसने एक सर्वथा नई दुनिया से परिचित कराया। बेमन से ही सही, पर इन कानूनों को स्वीकृति मिली और लगभग दो शताब्दियों तक उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित की, पर अब तो वर्षों से सारे हितधारक महसूस करने लगे थे कि इनकी प्रासंगिकता खत्म हो गई है और इनमें बुनियादी परिवर्तनों की जरूरत है।
बड़े परिवर्तनों के इस क्षण से भारतीय समाज का एक ऐसा ही साक्षात्कार 1 जुलाई को फिर होने जा रहा है, जब भारतीय दंड संहिता, नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम अपने नए अवतार में उसे मिलेंगे। यह विचारना दिलचस्प होगा कि भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम नामक ये तीनों नए कानून किस हद तक अपने समय की कसौटी पर खरे उतरेंगे और उससे भी बढ़कर किस हद तक जनापेक्षाओं की पूर्ति करेंगे। जैसे ही इन नए कानूनों के ड्रॉफ्ट सार्वजनिक हुए, उन पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आने लगीं। अनेक भाषाओं, बहुराष्ट्रीयताओं और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं वाले देश ने स्वाभाविक ही इनको अलग-अलग रूपों में लिया।
1860 के दशक में बने कानूनों ने दो अर्थों में बड़ा योगदान दिया था। पहला तो इनकी वजह से भारतीय समाज ने समानता जैसे मूल्य का सम्मान करना सीखा और दूसरा इन्होंने सही अर्थों में भारतीय उपमहाद्वीप को एक राष्ट्र-राज्य में तब्दील होने में मदद की थी। नए कानूनों की राह इसलिए आसान होगी कि अब समानता का विरोध करना काफी हद तक असंभव हो गया है। 1 जुलाई से लागू होने वाले कानूनों के समक्ष चुनौतियां दूसरी हैं और उन्हें पहले वाली से कमतर आंकना यथार्थ से मुंह चुराना होगा ।
देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में कहा कि इन विधेयकों का संसद से पारित होना एक ऐतिहासिक क्षण है, क्योंकि उनके ही शब्दों में दूसरे कानून हमारे समाज की रोजमर्रा की गतिविधियों को इन फौजदारी कानूनों से अधिक प्रभावित नहीं करते। वैसे, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने नए कानूनों के कारगर इस्तेमाल के लिए सरकार के स्तर पर बड़े पैमाने पर संसाधनों के निवेश और सभी हितधारकों की सोच में परिवर्तनों को रेखांकित किया। दोनों जरूरी हैं, मगर सोच के स्तर पर बदलाव सबसे जरूरी है। खास तौर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के बदले प्रारूपों की सफलता के लिए बड़े पैमाने पर तकनीक की जरूरत होगी। एक औसत भारतीय दिमाग आसानी से नए परिवर्तनों को स्वीकार नहीं करता। कंप्यूटर का अनुभव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां वर्षों तक हमने देखा कि अदालतों में कंप्यूटर डिब्बों में बंद रहे और वरिष्ठ अधिकारी इस लोभ से अपने कक्ष में कंप्यूटर रखते थे कि उसके चलते उनके कमरे वातानुकूलित हो जाते थे। इसी तरह जेलों और अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा पिछले कुछ वर्षों से उपलब्ध होने के बावज़ूद असंख्य कैदी अब भी रोज अदालतों में रिमांड के लिए लाए जाते हैं। न्यायिक अधिकारियों के साथ पुलिस और जेल के अमले को तकनीकी रूप से उस स्थिति के लिए प्रशिक्षित करना एक दुष्कर कार्य होगा, पर यह तो करना ही होगा।
नई व्यवस्था लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती होगी,  मुकदमों के निस्तारण में लगने वाले समय में कमी लाना। नए कानूनों का ड्राफ्ट संसद में पेश करते समय दावा किया गया कि अब फौजदारी के मुकदमों का फैसला तीन वर्षों में हो जाएगा। इसके लिए कई तरह के प्रावधान भी किए गए हैं, पर जानकारों के मन में इन्हें लेकर संशय है। अब तक का अनुभव बताता है कि पीड़ित पक्ष को छोड़कर सारे हितधारकों की कोशिश मुकदमों को लंबा खींचने में होती है और पीड़ित अक्सर असहाय होकर टुकुर-टुकुर ताकने के सिवाय कुछ नहीं कर पाता। देखना है कि नए कानून किस हद तक इस मानसिक बाधा से पार पा सकेंगे।
मैंने बड़ी उत्सुकता से समझने की कोशिश की कि नए कानूनों के लागू होने के पहले कितनी जरूरी तैयारियां हुई हैं? मैंने पाया कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पुलिस ने अपने विवेचकों और पर्यवेक्षण अधिकारियों के लिए कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रम जरूर चलाए हैं, पर ज्यादा सघन हस्तक्षेप की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कुछ अधिकारियों से बात करके मुझे निराशा हुई और लगा कि उनकी उदासीनता नई व्यवस्था के सफल संचालन में बाधा बनेगी। सरकार को विवेचकों, न्यायिक अधिकारियों और अभियोजकों के प्रशिक्षण व जरूरी तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करने की जरूरत होगी। यह मानना बहुत जरूरी है कि हमें विश्वस्तरीय सड़कों, हवाई अड्डों या बंदरगाहों जैसी आधारभूत सुविधाओं से कम जरूरत विश्वस्तरीय न्यायालयों, विवेचना उपकरणों और जेलों की नहीं है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)