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11 अप्रैल, 2021|6:46|IST

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ऐसी सहमति एक छोटा सा कदम

एक बार फिर पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने और संघर्ष विराम का उल्लंघन न करने का भरोसा दिया है। पिछले दिनों संसद में जानकारी देते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया था कि इस साल 28 जनवरी तक संघर्ष विराम के उल्लंघन की कुल 299 घटनाएं हुई हैं, जबकि पिछले वर्ष पाकिस्तान ने 5,133 बार ऐसी हिमाकत की थी, जिसमें हमारे 46 जवान शहीद हुए थे। साल 2019 में तो उसने 3,233 बार सीमा पर हरकतें की थीं। गोलीबारी की इन घटनाओं से नियंत्रण रेखा के करीब रहने वाले लोगों को होती मुश्किलों पर यदि गौर करें, तो दोनों देशों के सैन्य अभियानों के निदेशक जनरलों (डीजीएमओ) के बीच बुधवार-गुरुवार की रात बनी सहमति महत्वपूर्ण जान पड़ती है। मगर सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इसकी लाज रखेगा? बीते कुछ साल इस्लामाबाद की मंशा की चुगली करते हैं। इन वर्षों में उसने तमाम तरह से भरोसे की बात कही। नवंबर, 2003 में भी ऐसी ही एक सहमति जताई, जिसके बाद 2008 तक सीमा अमूमन शांत रही और 2012-13 तक तनातनी की हल्की-फुल्की घटनाएं होती रहीं, लेकिन बाद में वर्षों में हर साल हालात खराब ही होते गए। अब तो मानो अति हो गई है। स्थिति जब हाथ से बाहर जाने लगती है, तब दोनों देशों के सैन्य अधिकारी फिर से ऐसे किसी समान धरातल पर लौट आते हैं। डीजीएमओ की ताजा सहमति पहली नजर में यही जान पड़ रही है। संभव है, कुछ दिनों या महीनों तक सीमा पर शांति पसरी रहे, लेकिन बाद में हालात ढाक के तीन पात वाले हो सकते हैं।
सवाल यह है कि आखिर अभी ऐसा क्यों किया गया है? भारत व पाकिस्तान, दोनों के अलग-अलग कारण जान पड़ते हैं। पहली वजह तो निर्विवाद रूप से बिगड़ते हालात हैं, लेकिन दूसरी वजह, राजनीतिक व कूटनीतिक हो सकती है। दरअसल, अमेरिका में बाइडन सरकार के आने के बाद से दक्षिण एशिया में सत्ता के समीकरण बदलते दिख रहे हैं। चूंकि बाइडन प्रशासन काफी खुलकर भारत से अपनी नजदीकी का इजहार कर चुका है, इसलिए मुमकिन है कि चीन ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया हो कि वह भी उसकी तरह सुलह-समझौते का प्रयास करे, ताकि भारत की दोस्ती के बहाने अमेरिका उप-महाद्वीप में अपना दखल न बढ़ा सके। संभव यह भी है कि चीन और पाकिस्तान मिलकर किसी नई योजना पर काम कर रहे होंगे, जिसके लिए अभी सीमा पर शांति अनिवार्य हो, ताकि भारत का ध्यान यहां से बंट सके। एक अन्य वजह यह भी हो सकती है कि इस नई सहमति की आड़ में इस्लामाबाद नियंत्रण रेखा पर अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश में हो। सीमा पर खुद को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखने के लिए भारत को भी कुछ वक्त की दरकार थी। चूंकि दुश्मन देश अपनी रणनीति लगातार बदलता रहा है, इसलिए सीमा की चौकियों को और मजबूत बनाने की जरूरत इन दिनों शिद्दत से महसूस हो रही थी। भारत भी शायद ही यह चाहेगा कि इस मामले में अमेरिका को किसी तरह की दखलंदाजी का मौका मिले। नई दिल्ली हमेशा द्विपक्षीय तरीके से ही सीमा विवाद का हल निकालना चाहती है। संभवत: इन्हीं सब कारणों से भारत के डीजीएमओ ने अपनी सहमति जताई होगी। साफ है, पाकिस्तान को पहले खुद को साबित करना होगा, तभी इस सहमति का कोई अर्थ है। मगर अभी का सूरतेहाल कुछ और बयां कर रहा है। अभी नियंत्रण रेखा से भले ही घुसपैठ पर अंकुश हो, पर पाकिस्तान लगातार आतंकवाद के निर्यात की कोशिशों में जुटा है। भारत सरकार ने जब से जम्मू-कश्मीर की सांविधानिक स्थिति में बदलाव किया है, तभी से यह कयास लगाया जा रहा है कि घाटी में आतंकी घटनाओं में तेजी आ सकती है। इस साल तो इसमें खासा बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। माना जा रहा है कि दहशतगर्द नए-नए तरीकों से अपनी नापाक योजना को अंजाम दे सकते हैं। यहां मैग्नेटिक बम की भी अच्छी-खासी खेप बरामद की गई है, जबकि इस बम का इस्तेमाल पश्चिम एशिया में काफी ज्यादा होता है। इस तरह के बम को गाड़ी में चिपका दिया जाता है, जो कुछ दूर आगे जाने के बाद विस्फोट कर जाता है। जाहिर है, हमारे यहां आतंकियों के हाथों तक ये बम बिना पाकिस्तान की मदद से नहीं पहुंच सकते। इस माहौल में भला इस सहमति से कितनी उम्मीद की जा सकती है?
नाउम्मीदी की एक अन्य वजह इस्लामाबाद की तरफ से होने वाली बयानबाजी भी है। इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने कहा था कि क्षेत्र के सुरक्षित भविष्य के लिए शांति-बहाली मौजूदा वक्त की जरूरत है। कुछ इसी तरह के बयान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी दिए थे। इन बयानों को भारत से दोस्ती की पेशकश के तौर पर देखा गया। मगर इन बयानों  से पहले और बाद में कही गई बातों से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के शब्दों का अर्थ निकाला जाना चाहिए। बाद की बातें कुछ यूं थीं कि भारत यदि कश्मीर मसले पर अपने घुटने टेक देगा, तो उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाएगा। इस तरह की भाषा उन हुक्मरानों की नहीं हो सकती, जो अमन या दोस्ती के हिमायती हों। अगर वे वाकई बातचीत करना चाहते, तो अपने बयानों में नरमी लाते। मगर ऐसा होता नहीं दिखा। अलबत्ता, पाकिस्तान का एक मंत्री तो भारत को नक्शे से मिटाने की धमकी देता दिखा। साफ है, दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों में बनी ताजा सहमति एक छोटा-सा कदम है। इससे हम लंबी दूरी तय नहीं कर सकते। कुछ दिनों के बाद हालात जस के तस हो सकते हैं। हमें यह समझना ही होगा कि जब तक पाकिस्तान में इमरान खान सत्ता में हैं, वहां की हुकूमत विश्वास बहाली के लिए भरोसेमंद नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 26 february 2021