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24 सितम्बर, 2020|2:59|IST

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कश्मीर पर पाकिस्तान की नई चाल

जोरावर दौलत सिंह, फैलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

दो दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कश्मीर पर की गई टिप्पणी से भारत और अमेरिका की दोस्ती फिर से सुर्खियों में आ गई है। हाल-फिलहाल में यह दूसरा मौका है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से ट्रंप ने कश्मीर पर मदद करने को लेकर अपनी उत्सुकता दिखाई है। यह यूं ही नहीं कहा गया है। ट्रंप के आगामी दौरे को देखते हुए पाकिस्तान ने अपनी चाल चल दी है। लेकिन इस दौरे में ज्यादा महत्वपूर्ण भारत-अमेरिका के रिश्ते होंगे, कश्मीर नहीं।
अमेरिका की नजर से देखें, तो भारत के साथ सहज रिश्ते से उसे काफी फायदा है। इससे दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को मजबूत बनाने में मदद मिलती है। एशिया में अमेरिका को बहुमूल्य वैचारिक समर्थन हासिल होता है। रक्षा, विनिर्माण सहित कई अमेरिकी निजी कंपनियों को यहां बड़ा बाजार उपलब्ध है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना रुख बरकरार रखने में अमेरिकी सेना को मदद मिलती है। भविष्य में चीन के खिलाफ राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद जगती है। और सबसे अधिक यह कि भारत को उस स्थिति में ले जाने में अमेरिका सफल रहा है, जहां वह अपने पड़ोस और एशिया में अमेरिका के हित में (पूरी तरह समर्थन नहीं दे, तब भी) राजनीतिक व कूटनीतिक पहल कर सके। अमेरिका की विदेश नीति की ये चंद उपलब्धियां उसे बहुत मामूली लागत पर हासिल हैं।

अमेरिका के साथ रिश्तों में गरमाहट भारत के लिए भी फायदेमंद है। इससे अंतरराष्ट्रीय सत्ता-व्यवस्था और उसके प्रमुख संस्थानों तक भारत की पहुंच बनती है, जिनमें से कई पर पश्चिम का दबदबा है। भारत को अपने आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण के कई विकल्प मिलते हैं। अत्याधुनिक सैन्य क्षमताओं तक इसकी पहुंच बनती है। पाकिस्तान और चीन के खिलाफ वह मजबूत बनता है। नकारात्मक नीतियों को अपनाए बिना तरक्की का मौका मिलता है। और, कई मौकों पर अमेरिकी संकट प्रबंधन का उसे लाभ मिलता है; पिछले वर्ष पुलवामा आतंकी हमले के बाद भी यह मिला था। जाहिर है, आपसी नजदीकी से कई मुद्दों पर दोनों देश परस्पर लाभान्वित होते हैं।

मगर जब बात वैश्विक सामरिक साझेदार की आती है, तो तनाव ज्यादा दिखता है। तर्क दिए जाते हैं कि आपसी रिश्ते को आकार देने में भारत अपेक्षाकृत सुस्त रहा है, और वाशिंगटन के साथ एक स्थिर संबंध भारतीय रणनीति के व्यापक प्रसार के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि इस रणनीति के अंत के रूप में देखा जाता है। जब हम रणनीतिक तौर पर एक होने की बात करते हैं, तो यह अमूमन इस बारे में होता है कि क्या भारत अमेरिकी प्राथमिकताओं का पोषण कर रहा है? एजेंडा तय करने का दायित्व शायद ही भारतीय नीति-नियंताओं द्वारा उठाया जाता है।

चीन का उदाहरण लें। जब हम उभरते चीन की बातें करते हैं, तो बातचीत में ज्यादा जोर उसके महाद्वीपीय विस्तार की बजाय समुद्री विस्तार पर होता है। बेशक पश्चिम प्रशांत क्षेत्र अमेरिका की प्राथमिकता में है, लेकिन भारत के लिए इस परिधि की भू-राजनीति अहम है। यहां तक कि ‘क्वाड’ (भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान का समूह) में भारत मुख्य रूप से पूर्वी एशियाई सुरक्षा को साझा कर रहा है, पर बदले में अपनी सीमावर्ती चुनौतियों पर उसे कोई स्पष्ट भरोसा नहीं मिलता। खासतौर से चीन से उत्तरी सीमा को सुरक्षित रखने और चीन-पाकिस्तान सैन्य चालों के खिलाफ। यहां तक कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और ‘बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव’ से बढ़ते चीनी प्रभाव के काट के लिए भी किसी सार्थक भारत-अमेरिकी प्रतिक्रिया का अभाव है।

क्षेत्रीय सुरक्षा की बात करें, तो पुलवामा-बालाकोट के दौरान भी यह जाहिर हो गया था कि पाकिस्तानी फौज को शर्मिंदा करने या आक्रामक भारतीय नीति का समर्थन करने में अमेरिका की कोई रुचि नहीं है। वास्तव में, तीसरे पक्ष के रूप में क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने की अमेरिकी भूमिका का अभाव दिखता है और उप-महाद्वीप के अपने दोनों मुख्य सहयोगियों के सुरक्षा-हितों के बीच एक अच्छा संतुलन बनाता वह नहीं दिखता। यहां तक कि रक्षा के मोर्चे पर भी, हाल के वर्षों में अमेरिकी निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि बुनियादी मतभेदों को गहरा करती है। भारत के समग्र सैन्य आधुनिकीकरण की बजाय समूचा विमर्श अमेरिकी बाजार को भारत में बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इसलिए वैकल्पिक तकनीकी विकल्पों पर आगे बढ़ने के भारतीय प्रयास से नकारात्मक नीतियों और दबाव की चर्चा छिड़ जाती है। हालांकि टकराव के मसले कहीं अधिक गहरे हैं। अपने हथियारों की बिक्री के माध्यम से अमेरिका का लक्ष्य राष्ट्रों का ऐसा नेटवर्क विकसित करना है, जो तकनीक व इंटेलिजेंस के अमेरिका-नियंत्रित तंत्र को साकार करे। मगर भारत के लिए इस तरह की अवधारणा न सिर्फ समावेशी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के नजरिए से असंगत है, बल्कि यह सामरिक स्वायत्तता को भी कमजोर करती है। इस स्वायत्तता में विदेश और सुरक्षा नीतियों के लिहाज से मनमर्जी सैन्य ताकतों का इस्तेमाल भी शामिल है।
एशिया में क्षेत्रीय और वैश्विक हितों में बदलाव भी आज भारत और अमेरिका के संबंध को उलझाता है। सवाल यह है कि क्या भारत को एशिया में अपना दबदबा हासिल करने के लिए अमेरिका की मदद करनी चाहिए या एक स्थिर वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में आगे बढ़ना चाहिए? इस नई व्यवस्था में अन्य वैश्विक ताकतों के साथ क्षेत्रीय शक्तियों के समन्वय की भी दरकार होगी, जिनमें से कई आने वाले दशकों में अमेरिका से दो-दो हाथ करने की तैयार कर रही हैं।

जाहिर है, अपने-अपने वैश्विक और क्षेत्रीय हित भारत और अमेरिका के संबंधों को जटिल बना रहे हैं। 2000 के दशक के मध्य में, जब वाशिंगटन और दिल्ली आपसी रिश्ते का भविष्य देख रहे थे, तब बहुध्रुवीय विश्व की संकल्पना बहस से कोसों दूर थी। मगर आज हम उस मोड़ पर पहुंच चुके हैं, जहां अमेरिकी संबंधों के दायरे को फिर से परिभाषित करना होगा। भारत वही भूमिका नहीं ओढ़ सकता, जो आने वाले वर्षों में अमेरिका चाहता है, और वाशिंगटन भी नई दिल्ली के लिए अपना हित दांव पर नहीं लगा सकता। ऐसे में, परिस्थिति के मुताबिक हमें आगे बढ़ना चाहिए। और यह काम हमें तभी शुरू कर देना चाहिए, जब राष्ट्रपति ट्रंप भारत की यात्रा पर आएंगे। इस दौरान वह पाकिस्तान भी जाएंगे। जाहिर है, वहां कश्मीर मुद्दा एक बार फिर उठेगा ही।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 24th january 2020