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18 सितम्बर, 2020|4:12|IST

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अपनी चिंताएं बताने का मौका

हरिंदर सेखों, सीनियर फेलो, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन

अपने दो दिवसीय दौरे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज भारत पहुंच रहे हैं। उनकी यह यात्रा नई दिल्ली के लिए जितनी अहम है, वाशिंगटन के लिए भी इसका समान महत्व है। ट्रंप की यह पहली द्विपक्षीय यात्रा है। इससे पहले वह जिस किसी देश में गए, एक साथ दो या दो से अधिक राष्ट्रों का दौरा किया। मगर इस बार उन्होंने यह परंपरा तोड़ दी है। महाभियोग के आरोपों से मुक्त होने के तत्काल बाद वह अहमदाबाद पहुंच रहे हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? वह भी तब, जब उनकी घरेलू लोकप्रियता अभी सबसे ज्यादा है। फिर, अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी अच्छी हालत में है और वहां रोजगार की स्थिति में भी सुधार आया है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है, जिसमें उनकी व्यस्तता ज्यादा है। निश्चित तौर पर ट्रंप की नजर घरेलू चुनाव पर ज्यादा होगी, क्योंकि अमेरिका में भारतीय मूल के मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है। वे चुनाव में आर्थिक सहयोग भी खूब करते हैं। इसीलिए ‘नमस्ते ट्रंप’ को ‘हाउडी मोदी’ की ही अगली कड़ी कह सकते हैं। मगर बात सिर्फ इतनी नहीं है।

दरअसल, अमेरिका की नजर भारत के बाजार पर  है। खासतौर से द्विपक्षीय व्यापार में सहूलियतें पाने को लेकर ट्रंप प्रशासन भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है। यह विवाद पिछले डेढ़ साल में गहराया है, जब हार्ले डेविडसन पर 50 फीसदी टैरिफ भी मंजूर न होने की बात अमेरिकी राष्ट्रपति ने कही। इन दिनों भी एक बड़े व्यापार समझौते का माहौल गरम था। हालांकि यह समझौता आकार नहीं ले सका, क्योंकि अमेरिका चाहता है कि कृषि और दुग्ध-उत्पादन क्षेत्रों में हम उसकी कंपनियों को पर्याप्त छूट दें। यह भारत के लिए संभव नहीं है। अच्छी बात है कि सरकार ने इस पर अपना रुख साफ कर दिया है, इसीलिए ट्रंप की इस यात्रा में दोनों देशों के बीच छोटे-मोटे व्यापार समझौतों पर ही सहमति बनती दिख रही है। वैसे, ट्रंप प्रशासन ने 2021 में एक बड़े व्यापार समझौते करने पर हामी भरी है, तो संभव है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद, जिसमें ट्रंप के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा है, भारत ऐसे किसी समझौते के लिए अमेरिका को बाध्य कर सके।

यह नई दिल्ली के हित में होगा कि वह इस दौरे का इस्तेमाल ट्रंप पर दबाव बनाने के रूप में करे। भारत और अमेरिका के बीच अभी कई तरह के मतभेद हैं। लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ ‘वन-टु-वन’ बातचीत में यहां की समस्याओं से उन्हें अवगत कराएं। प्रधानमंत्री को यह बताना चाहिए कि भारत कोई विकसित अर्थव्यवस्था नहीं है, जैसा कि ट्रंप प्रशासन मानता है। भारतीय अर्थव्यवस्था अब भी विकासशील है और इससे बाहर निकलने की अनवरत मेहनत कर रहा है। इसका आकार बेशक बड़ा है, लेकिन इसकी वजह यहां की जनसंख्या है। इसीलिए भारत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में किसी तरह की प्रतिस्पद्र्धा नहीं होनी चाहिए। वैसे भी, अमेरिका के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस (अमेरिका से आयात कम और वहां के लिए निर्यात ज्यादा) घटकर 22 अरब डॉलर हो गया है, जो कभी 32 अरब डॉलर हुआ करता था। जाहिर है, अब हम सैन्य साजो-सामान और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका पर ज्यादा निर्भर रहने लगे हैं।

अमेरिका को यह भी बताना होगा कि भारत उसका रणनीतिक साझीदार है, और यह रिश्ता कई वजहों से दोनों देशों के हित में है। पहली वजह तो निश्चय ही चीन है, जिसकी विस्तारवादी नीतियों से अमेरिका और भारत, दोनों को परेशानी हो रही है। दोनों लोकतंत्रों को भू-रणनीतिक चुनौतियों से पार पाने के लिए विश्व स्तर पर एक होने का संकेत देना ही होगा। फिर, हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र भी दोनों देशों के लिए काफी अहमियत रखता है। यहां खुद को मजबूत बनाना हमारे हित में है, तो अमेरिका के लिए भी यह जरूरी है कि वह अपनी दखल बढ़ाने के लिए यहां भारत को अधिकाधिक भूमिका सौंपे। लिहाजा, भारत और अमेरिका का एक-दूसरे से कूटनीतिक सहयोग करना वक्त की मांग है। ट्रंप की यह यात्रा दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति को भी प्रभावित करेगी। चीन की नजर इस दौरे पर तो होगी ही, पाकिस्तान भी मायूसी भरी नजरों से इसे देख रहा होगा। इस्लामाबाद का यह दबाव था कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत पहुंचने से पहले रावलपिंडी में ठहरें। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। साफ है, यह पाकिस्तान को ट्रंप प्रशासन का दो टूक है कि उसे अपनी कूटनीति पर गौर करना चाहिए।

बेशक भारत और अमेरिका, दोनों देशों के लिए अभी ‘न तुम जीते, न हम हारे’ वाली स्थिति है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन पर हमें अपना दबाव ढीला नहीं करना चाहिए। राष्ट्रपति ट्रंप छोटे-छोटे मसलों को तवज्जो नहीं देते। उनका पूरा जोर तस्वीर को बड़े फलक पर देखने का होता है। उन्हें यह बताना होगा कि कृषि, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन भारत में खूब होता है। हमारी 42 फीसदी आबादी खेती-बाड़ी पर ही निर्भर है, जबकि अमेरिका में ऐेसे लोगों की संख्या महज दो फीसदी है। लिहाजा, आंकड़ों में सब्सिडी भले ही भारत में ज्यादा दिखती हो, लेकिन प्रति व्यक्ति रियायत के मामले में हमारे अन्नदाता अमेरिकी किसानों के आगे कहीं नहीं ठहरते। यहां सीमांत किसान भी बहुत ज्यादा हैं। इसीलिए व्यापार समझौते में अपने हितों को लेकर अमेरिका ज्यादा आग्रही न बने। इन सभी बातों को राष्ट्रपति ट्रंप कितना समझ पाएंगे, यह तो अगले दो दिनों में स्पष्ट हो जाएगा, लेकिन उचित यही होगा कि दोनों देशों के शासनाध्यक्ष छोटे-मोटे विवादों में उलझने की बजाय साझा हितों और ‘ग्लोबल आर्किटेक्चर’ पर ध्यान दें, और यह एक-दूसरे की सोच और नजरिया को समझे बिना संभव नहीं है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 24th February 2020