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23 अक्तूबर, 2020|11:33|IST

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शक्ति और मर्यादा संजोने का समय

अब नवरात्र के दिनों में पुराना बंगाल खूब याद आता है। 1950 के दशक के शुरुआती वर्षों में बिजली आपूर्ति शुरू नहीं हुई थी, तेल से जलने वाली बड़ी-बड़ी बत्तियां रखी जाती थीं, खूब रोशनी होती थी, वह चकाचौंध आज भी याद है। बार-बार पंडाल जाने का वह उत्साह, भाई, बहन, चचेरे, ममेरे, फुफेरे, आस-पड़ोस के सब बच्चे मिलकर उत्सव मनाते थे। नए-नए वस्त्र पहनकर निकलते थे, तरह-तरह के भोग-पकवान मिलते थे। हर समाज के लोग, हर धर्म के लोग दुर्गा पूजा में शामिल होते थे, कभी कोई भेद महसूस नहीं होता था। पूरा गांव, शहर अपना सा लगने लगता था। परस्पर प्रेम और समन्वय का  भाव उमड़ आता था। बांग्ला समाज जैसे-जैसे भारत और दुनिया भर में फैला, दुर्गा पूजा का भी वैसे-वैसे फैलाव हुआ है। बंगाल के बाद दिल्ली के चितरंजन पार्क में भी बांग्ला संस्कृति की भव्यता दुर्गा पूजा के दौरान देखते बनती है। 

आज आयोजन बडे़ होते जा रहे हैं, लेकिन भाव में कमोबेश कमी होती जा रही है। शक्ति और देवी का अर्थ लोग भूलते जा रहे हैं। समय के साथ, महिला सुरक्षा में बहुत अंतर आया है। अपने युवा दिनों में कोलकाता में मैंने छेड़छाड़ या दुव्र्यवहार की घटनाएं कभी सुनी नहीं। बांग्लाभाषी समाज के साथ ही दूसरे शहरों में भी पहले ऐसी बातें चिंता की वजह नहीं बनी थीं। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदली हैं, दुव्र्यवहार की घटनाएं भी बढ़ी हैं और प्रतिकार भी बढ़ा है। बदलाव इस अर्थ में भी आया है कि स्त्री शक्ति की बात बहुत की जाने लगी है। बंगाल में तो छोटी बच्ची को भी ‘मां’ कहते हैं। घरों में महिलाओं का बहुत सम्मान रहा है। सामाजिक व्यवहार और सुधार में बांग्लाभाषी समाज आदर्श रहा है। इस समाज ने सबसे पहले लड़कियों को बाहर निकाला। साल 1962-63 में जितनी लड़कियां कोलकाता में तब दिखती थीं, उतनी दिल्ली आकर नहीं दिखीं। दिल्ली में तो यह हालत थी कि कॉफी हाउस में यदि कोई महिला चली जाती थी, तो लोग अचरज से देखने लगते थे। बहरहाल, हालत पहले जैसी नहीं रही, स्त्रियां बहुत सजग हुई हैं। अब तो संदेश ही यही है कि पुरुष सत्तात्मक समाज से बाहर निकलो। मां की पूजा करो, मां से बाहुबल लो, जैसे वह असुरों का दमन करती थीं, वैसे ही तुम भी करो। 

बंगाल में एक और परंपरा है, हर दैनिक समाचारपत्र के पूजा अंक निकलते थे, कुछ अब भी निकलते हैं, जिनकी तैयारी साल-दो साल पहले से ही शुरू हो जाती थी। लेखकों को बाकायदे टिकट देकर नैनीताल, मसूरी भेज देते थे कि जाइए, हमारे लिए उपन्यास लिख लाइए। बडे़ चित्रकारों से मुख पृष्ठ तैयार करवाए जाते थे। करीब 12-15 साल पहले की बात है कि एक दैनिक ने चित्रकार अर्पिता सिंह से कवर बनवाया। वह कवर बहुत चर्चित रहा था। उन्होंने दुर्गा के हाथों में पिस्तौल थमा दी थी। पत्रिका ने उसे प्रकाशित किया था, उसमें गहरा संदेश था। साधारण स्त्री की तरह दिखने वाली दुर्गा लोगों को खूब पसंद आईं, तो कुछ ने कहा कि ये तो हिंसा की बात कर रही हैं, लेकिन वास्तव में यह तो प्रतीक था। आज का अस्त्र है पिस्तौल। जब संकट आए, तो हरसंभव अस्त्र से अपना और सबका बचाव गलत नहीं। 
दुर्गा पूजा पर अपने देश में लगभग हर जगह सामयिक विषयों पर पंडाल बनाए जाते हैं। महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार दर्शाने वाले पंडाल भी बनते रहे हैं। हालांकि, मेरी स्मृति में दशहरा या रावण दहन नहीं है, विजयादशमी जरूर है। पूजा के बाद देवी की प्रतिमाओं के साथ ही उनके चित्रों का भी विसर्जन होता है। रावण का उतना नहीं, महिषासुर मर्दन का ज्यादा महत्व है। विसर्जन बहुत धूमधाम से होता है। बंगाल के लोग जहां भी गए हैं, विसर्जन की परंपरा भी ले गए हैं। शुभ विजया नाम के कार्ड बनते हैं। लोग एक-दूसरे को शुभ विजया कहते हैं, यह भी बंगाल की विशेषता है। जिस तरह बंगाल की दुर्गा पूजा मशहूर है, ठीक उसी तरह से मैसूर का दशहरा, रामनगर की रामलीला, गुजरात का डांडिया, गरबा भी प्रसिद्ध है। कोरोना की वजह से इस बार धूमधाम कुछ कम लग रही है, वरना हरेक सोसायटी, मोहल्ले और गली में रावण दहन या रामलीला का प्रसार हो चुका है। उत्सव परस्पर मिल गए हैं, जैसे शक्ति और राम। खासकर उत्तर भारत में रामनवमी का बड़ा महत्व है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला राम की शक्ति पूजा को विशेष बना देते हैं-  
होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।
कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन।
देवी की पूजा राम जी भी कर रहे हैं, उन्हें भी शक्ति की जरूरत पड़ रही है। इसी तरह के संबंधों में हमें अपनी परंपराओं को देखना चाहिए। उसके प्रतीक अर्थ में जाना चाहिए। प्रतीक के अर्थ गहरे हैं। पौराणिक, धार्मिक के रूप से न भी लें, कथाओं के रूप में भी लें, तो इस महोत्सव के भाव को समझने की जरूरत है। हमें विवादों से बचने की कोशिश करनी चाहिए। कुछ साल पहले बहस तेज हो गई थी, देवी महिषासुर का वध करती हैं और आप उत्सव क्यों मनाते हो? हम भूल जाते हैं कि यह मात्र प्रतीक है। यह बात बहुत ध्यान में रखने वाली है कि धार्मिक-सामाजिक आयोजनों को लेकर संकीर्णता बढ़ रही है। आपको हर बुराई का विरोध करना है, किसी भी तरह के अत्याचार का प्रतिकार, संहार करना है और अपने लिए सुरक्षा का घेरा बनाते चलना है। 
निराला की शक्ति पूजा एक जमाने में हममें से बहुतों को कंठस्थ थी, कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ इसका पाठ करते थे। निराला भी प्रतीकार्थों की ही बात करते हैं, वह एक पौराणिक घटना का उत्सव मना रहे हैं। मेरा मानना है, पौराणिक प्रसंगों में किसी जाति-बिरादरी के बारे में कुछ बातें आ भी जाती हैं, तो उसे उतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, प्रतीकार्थ देखने चाहिए। वरना हम ऐसी बहस में उलझ जाएंगे, जो बेमतलब होगी। शक्ति, विश्वास, श्रद्धा, मर्यादा का मोल हम समझेंगे, तो उत्सव और जीवन का सही आनंद ले पाएंगे। अच्छी बातों का अनादर हो रहा है, तो देखना होगा कि कमी कहां रह गई।
सारे उत्सव बच्चे बहुत उत्साह से मनाते रहे हैं। पहले हम उनसे विशेष रूप से मनवाते रहे थे, इसमें अब कमी आई है, इस पर ध्यान जाना चाहिए। प्रेमचंद की कहानी है, रामलीला , जिसमें एक बच्चा रामलीला देखकर मुग्ध हो जाता है। अब बच्चों में रोशनी को लेकर उत्साह रहता है, लेकिन उसका मूल अर्थ क्या है, जो बंगाल में अभी भी कमोबेश बना हुआ है, लेकिन दुर्भाग्य से उत्तर भारत में उतना नहीं है। बच्चों को सही रूप में अच्छी परंपराओं के अनुरूप ढालना होगा। शक्ति की समझ और मर्यादाओं का ज्ञान देना होगा, तभी वे वस्तुत: प्रेम, लगाव और उत्सव का सही अर्थ जान पाएंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 24 october 2020