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अपने नेताओं से जवाब मांगते इजरायली

पिछले महीने की 7 अक्तूबर को इजरायलियों पर ‘होलोकॉस्ट’ के बाद से सबसे भयानक हमला किया गया था। होलोकॉस्ट दूसरे विश्व युद्ध का वह नरसंहार है, जिसमें नाजियों ने करीब 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी...

अपने नेताओं से जवाब मांगते इजरायली
Amitesh Pandeyखींवराज जांगिड़, विशेषज्ञ, इजरायल मामलेThu, 23 Nov 2023 11:02 PM
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पिछले महीने की 7 अक्तूबर को इजरायलियों पर ‘होलोकॉस्ट’ के बाद से सबसे भयानक हमला किया गया था। होलोकॉस्ट दूसरे विश्व युद्ध का वह नरसंहार है, जिसमें नाजियों ने करीब 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी। 7 अक्तूबर को भी 1,200 से अधिक लोगों की मौत हुई, जिनमें से ज्यादातर आम नागरिक थे। इजरायल के दक्षिण में हुए इस हमले में जो लोग मारे गए, वे इन सबसे अनजान अपने घरों या किबुत (सामुदायिक कृषि से जुड़ी इजरायल की एक सामाजिक व्यवस्था) में रमे थे। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि हमास और फलस्तीनी इस्लामी उग्रवादियों ने उनके घरों को यूं घेर लिया हो। उग्रवादी (उनको आतंकवादी कहना ज्यादा सही होगा) गाजा में अपने साथ बंधक भी ले गए, जिनके रील और वीडियो बनाकर वे खुश हो रहे थे। गाजा में करीब 240 बंधक हैं, जिनमें सैनिकों के साथ बुजुर्ग, महिला, लड़की, किशोर और छोटे-छोटे बच्चे हैं। इजरायली सैनिकों के कुछ शवों को बाद में इजरायल के खिलाफ इस्तेमाल भी किया गया। 
इन सबकी प्रतिक्रिया में इजरायल ने गाजा पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। उसने गाजा के उत्तरी हिस्से पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है, जहां से 10 लाख से अधिक बाशिंदे दक्षिणी हिस्से में विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए हैं। गाजा में 12 हजार से भी अधिक लोग मारे गए हैं, जिनमें से ज्यादातर बच्चे और महिलाएं हैं। हमास ने इजरायल के साथ संघर्ष-विराम के बदले में बंधकों को वापस करने से इनकार किया था। अगर ऐसा हो पाता, तो संभवत: गाजा के हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
तमाम वैश्विक आलोचनाओं के बावजूद गाजा में इजरायली सैन्य अभियान हमास को खत्म करने और बंधकों को मुक्त कराने के लिए शुरू किया गया था। मगर इन दोनों मोर्चों पर इजरायली सैनिकों को खास सफलता नहीं मिल पाई है। यह उम्मीद नहीं थी कि इजरायली सेना एक महीने में भी हमास को खत्म नहीं कर पाएगी। अब तो यह एक साल की कार्रवाई में भी असंभव लगता है। हमास के आतंकी 500 किलोमीटर से अधिक लंबी सुरंगों में छिप गए हैं। हालांकि, बंधकों का पता लगाना शुरू में बहुत मुश्किल नहीं लग रहा था, लेकिन इजरायल की सेना अब इससे भी बहुत दूर लग रही है। इस रणनीतिक विफलता और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर बढ़ते घरेलू दबाव ने इजरायल को वैकल्पिक नजरिया अपनाने को मजबूर किया है। अब कतर की मध्यस्थता से इजरायल और हमास के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत हमास 50 इजरायली नागरिकों को छोड़ रहा है, जिनमें अमूमन बच्चे और महिलाएं हैं। इसके बदले में इजरायल भी अपनी जेलों से 150 फलस्तीनी कैदियों को रिहा कर रहा है। चार दिनों के संघर्ष-विराम पर भी सहमति बनी है, क्योंकि हमास सभी को एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग आजाद करेगा। हमास ने मांग की थी, जिसे मान भी लिया गया है कि इजरायल न सिर्फ युद्ध बंद करेगा, बल्कि ड्रोन से निगरानी भी रोकेगा, क्योंकि इससे हमास की गतिविधियां उनके ठिकानों के अंदर और बाहर नजर में आ सकती थीं।
हमास के साथ हुए इस समझौते को लेकर बंधकों के परिवारों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखी जा रही है। यह उन परिवारों के लिए निश्चित रूप से सुखद है, जो 47 दिनों के बाद अपने परिजनों से मिलेंगे। मगर कई अन्य परिवारों को, जिनके सदस्यों को हमास नहीं रिहा कर रहा, अभी लंबा इंतजार करना होगा। अंतरराष्ट्रीय कानूनों व नियमों के विपरीत, हमास ने रेड क्रॉस के जरिये वैश्विक सहायता भी बंधकों को उपलब्ध कराने  की मांग खारिज कर दी है। कई इजरायली परिवारों को यह तक नहीं पता कि हमास की कैद में उनके परिजन जीवित भी हैं या नहीं?
इन सबसे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ इजरायल में नाराजगी बढ़ने लगी है। इजरायल की सेना एक ऐसी लड़ाई लड़ रही है, जिससे उसकी पेशानी पर अब बल पड़ने लगे हैं और जिसे वह जीत नहीं पा रही है। नेतन्याहू जैसे वरिष्ठ सियासी नेताओं को इसके बारे में बता दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसे अनसुना कर दिया। कई अन्य दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी नेताओं ने भी खुफिया चेतावनियों पर गौर करना मुनासिब नहीं समझा था। नतीजतन, इजरायली अब अपने अस्तित्व को संकट में मानने लगे हैं, वह भी तब, जब उनकी सेना दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है और उनके खुफिया उपकरणों व उन्नत युद्ध-सामग्रियों की भारत जैसे कई देशों में मांग रही है।
निस्संदेह, अपने लंबे राजनीतिक करियर में ताजा सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में विफल रहने के लिए बेंजामिन नेतन्याहू तो कुछ हद तक अपमानित भी होना पड़ा है। खुद का बचाव करने के लिए उन्होंने सुरक्षा में चूक का ठीकरा रक्षा व खुफिया प्रमुखों पर फोड़ने का प्रयास किया। पिछले माह 29 अक्तूबर को उन्होंने ट्वीट किया था कि उन्हें सुरक्षा प्रमुखों द्वारा हमास के आसन्न हमले को लेकर कोई चेतावनी नहीं दी गई थी। हालांकि, अपने युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य बेनी गैंज की आलोचना के बाद उन्हें अपना वह ट्वीट हटाना पड़ा था। एक मर्तबा तो उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी, क्योंकि उन्होंने युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद अपने खिलाफ चले विरोध-प्रदर्शनों की जांच कराने की बात कही थी, जिसके कारण कई लोग इजरायली सेना की स्वैच्छिक सेवा से हटने लगे थे। इजरायल के ताजा सर्वेक्षण में नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति काफी कमजोर लग रही है। उनकी पाटी के कुछ सदस्यों ने इजरायल की विफलता के लिए उन्हें दोषी ठहराते हुए इस्तीफा भी दे दिया है।
बंधकों के परिजनों ने 18 नवंबर को तेल अवीव से येरुशलम तक चार दिवसीय यात्रा की, जिसमें बंधकों को गाजा से मुक्त कराने में विफल रहने के लिए नेतन्याहू और अन्य नेताओं से ‘लुक अस इन द आई’ की मांग की गई। सर्दियों की भारी बारिश में भीगते हुए भी सैकड़ों लोग येरुशलम की ओर चल पड़े थे, जहां उन्होंने 30 हजार से भी अधिक लोगों के साथ बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। फिलहाल, नेतन्याहू और इजरायल में किसी भी अन्य नेता के पास अपने उन नागरिकों के लिए कोई बेहतर आश्वासन नहीं है, जो एक नाउम्मीदी और गम व गुस्से में हैं।
    (लेखक इजरायल के बेन-गुरियन विश्वविद्यालय मेें विजिटिंग फैकल्टी हैं, ये उनके अपने विचार हैं) 

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