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6 जनवरी, 2021|12:03|IST

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दक्षिण में पीछे चलती राष्ट्रीय पार्टियां 

भाजपा का उद्देश्य तमिलनाडु में सत्ता हासिल करना है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस संदर्भ में कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दिया, जब वह गुजरे हफ्ते के अंतिम दिन चेन्नई पहुंचे। साल 2014 के बाद से भाजपा को राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय चुनावों में जो सफलता मिल रही है, अमित शाह उसके मुख्य रणनीतिकार रहे हैं। शनिवार को उन्होंने तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन किया।
तमिलनाडु पिछले कुछ समय से भाजपा के रडार पर है। इस राज्य में अपनी राह आसान करने की वह लगातार कोशिश करती रही है, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है, क्योंकि यहां की दो द्रविड़ पार्टियों ने राष्ट्रीय दलों को पांव जमाने का ज्यादा मौका नहीं दिया है। अमित शाह की यात्रा इस जमीनी हकीकत से रूबरू कराती है कि कांग्रेस  और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को अब भी यहां अपने वजूद के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ ही जाना होगा।
अमित शाह से मुलाकात करने वाले आरएसएस व भाजपा के स्थानीय नेताओं ने राज्य में पार्टी के आधार को विस्तार देने की कोशिशों में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक से मिलने वाली चुनौतियों की शिकायतें कीं। भाजपा की राज्य इकाई इस बात के लिए खासतौर से चिंतित है कि विभिन्न आंदोलनों द्वारा हिंदू वोटों को गोलबंद करने के उसके सभी प्रयासों की सूबे की सरकार हवा निकालती रही है। ‘वेट्री वेल यात्रा’ से भी पार्टी हिंदुत्व का अपना संदेश प्रसारित करना चाहती थी, जिसे भगवान मुरुगन (उत्तर में इन्हें कार्तिकेय कहा जाता है) को समर्पित किया गया था। हालांकि, अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को फिलहाल इस मुद्दे को ज्यादा तूल न देने को कहा और जमीनी स्तर पर पार्टी की मजबूती के लिए पूरा ध्यान देने की बात कही। भाजपा कार्यकर्ता अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन का भी विरोध कर रहे थे और अकेले चुनाव लड़ने पर जोर दे रहे थे। मगर, अमित शाह ने इशारों-इशारों में उन्हें बता दिया कि पार्टी अपने बूते चुनाव में उतरने को अभी तैयार नहीं है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को यह सलाह भी दी कि वे धैर्य बनाए रखें और दूर की सोचें। बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में भी पार्टी धीरे-धीरे ही आगे बढ़ेगी और अपने पांव मजबूत करेगी।
बहरहाल, अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाली राज्य सरकार और भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के बीच हालिया महीनों में कई मुद्दों पर तलवारें खिंची रही हैं। इससे यह सवाल पूछा जाने लगा था कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बना उनका गठबंधन क्या अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भी कायम रह सकेगा? चिकित्सा कॉलेजों में प्रवेश की संयुक्त परीक्षा या एनईईटी में ग्रामीण सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए आरक्षण, स्कूली शिक्षा में तीन-भाषा की नीति व केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी पर ‘जोर’ देने की कोशिश जैसे तमाम मुद्दों पर सूबे की सरकार केंद्र को निशाने पर लेती रही है। इससे पहले अन्नाद्रमुक सरकार भाजपा और संघ परिवार के कार्यकर्ताओं को गणेश चतुर्थी यात्रा निकालने से भी रोक चुकी है। दक्षिणपंथी नेताओं व कार्यकर्ताओं पर धार्मिक रूप से असंवेदनशील टिप्पणी करने के कारण मुकदमे भी किए गए हैं। इन सबकी वजह से कई राजनीतिक पर्यवेक्षक यह मान चल रहे थे कि मुख्यमंत्री पलानीसामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार आत्मविश्वास से लबरेज हो चुकी है और धीरे-धीरे केंद्र की छाया से बाहर निकल रही है।
इन कदमों के लिए अन्नाद्रमुक कार्यकर्ता अपने मुख्यमंत्री के गुण गाने लगे थे, तो कट्टर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक ने उसे निशाने पर लिया था और उसे ऐसा संगठन बताया था, जो केंद्र के इशारे पर काम कर रहा है। अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता भाजपा को पार्टी पर भार मानने लगे थे और वे उत्सुक थे कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में अकेले उतरेगी। लेकिन केंद्र के दबाव, उप-मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम के नेतृत्व में पार्टी के एक धड़े की चाहत और सीबीआई व प्रवर्तन एजेंसियों के छापे के डर से ही लगता है कि अन्नाद्रमुक पार्टी अपना सुर बदलने को मजबूर हुई है।
देखा जाए, तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और  कार्यकर्ताओं द्वारा अमित शाह की चेन्नई यात्रा को लेकर जो उत्तेजना पैदा की गई थी, वह कुछ मायनों में सिर्फ इस साधारण बयान से खत्म हो गई कि अन्नाद्रमुक के साथ ही पार्टी अगला विधानसभा चुनाव लड़ेगी। भाजपा नेताओं व उनके समर्थकों ने दावा किया था कि गृह मंत्री के दौरे से राज्य की सियासत में एक ‘बड़ा बदलाव’ आएगा। मगर, असलियत में भाजपा राज्य को अपने अधीन करने की योजना अगले पांच साल तक टालती दिखी और इस दरम्यान राज्य में संगठनात्मक आधार को मजबूत करने का फैसला लिया गया।
बिहार की सफलता ने अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं को भी आशंकित कर दिया था। बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपने प्रमुख सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) से बेहतर प्रदर्शन किया है और गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। अन्नाद्रमुक के कई समर्थकों ने यह आशंका जाहिर की थी कि तमिलनाडु में भी वैसा ही कुछ हो सकता है। वैसे, दिलचस्प यह भी है कि बिहार में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन ने उसकी तमिलनाडु इकाई को भी हिलाकर रख दिया था। एक अप्रत्याशित कदम के तहत तमिलनाडु कांग्रेस के केंद्रीय पर्यवेक्षक दिनेश गुंडुराव भी द्रमुक प्रमुख एम के स्टालिन को यह भरोसा देने के लिए पहुंचे कि पार्टी उनके द्वारा प्रस्तावित सीट बंटवारे के फॉर्मूले को बिना किसी हीला-हवाली के स्वीकार करेगी।
ये दोनों दौरे (अमित शाह और दिनेश गुंडुराव की) इसी तथ्य को साबित करते हुए दिखते हैं कि राज्य की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां फिलहाल अपने-अपने मित्र क्षेत्रीय दलों के साथ ही आगे बढ़ती रहेंगी। हां, दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में एक अंतर यह है कि कांग्रेस ढलान पर है, तो भाजपा निरंतर आगे बढ़ रही है। केंद्र में सत्तासीन होने का फायदा भी भाजपा उठा रही है। वह योजनाओं व विकास कार्यों में अधिक फंड देकर राज्य के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है। हिंदुत्व का एजेंडा तो उसका है ही, जिसके बूते वोटरों को आकर्षित करने का उसका प्रयास जारी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 24 november 2020