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बड़ा फलक मांगती विदेशी नीति

सैयद अकबरुद्दीन, भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारीPublished By: Naman Dixit
Fri, 23 Jul 2021 11:12 PM
बड़ा फलक मांगती विदेशी नीति

वैश्विक मानदंडों को नई सोच के साथ नया रूप देने की तैयारी है। एक तरफ, एक नए वैश्विक टैक्स पर काम हो रहा है, जिसका उद्देश्य एक न्यूनतम कॉरपोरेट व्यवस्था लागू करने के साथ ही एक ऐसा तंत्र बनाना भी है, जिसमें बड़ी कंपनियों के कुछ मुनाफों पर कर लगाया जाए। यह टैक्स वहीं पर वसूला जाएगा, जहां पर लाभ कमाया गया होगा। इसके अलावा, शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने के लिए कार्बन सीमा शुल्क भी लगाया जा रहा है। ये तमाम प्रयास व्यापार और जलवायु की अभूतपूर्व जुगलबंदी का पूर्वाभास देते हैं। इसी तरह, अनिवार्य विवाद समाधान प्रावधानों को अंतरराष्ट्रीय समझौतों में शामिल करने की मांग भी बढ़ती जा रही है।
दूसरी तरफ, स्थापित मानकों का विरोध किया जा रहा है और तकनीकी रूप से सभी अलग-अलग हो रहे हैं, जिससे नई मूल्य शृंखलाएं स्थापित हो रही हैं। ये सभी संकेत हैं कि वैश्विक आर्थिक क्षेत्र में बदलाव होने वाला है। अब यहां से वापस मुड़ना कठिन है। बदलाव की गति एक मसला जरूर है, लेकिन इससे बचने की कोई राह नहीं। इसका प्रभाव हम पर भी पडे़गा। लिहाजा, भारत की भूमिका इसे समझने और आकार देने की होनी चाहिए या फिर बदलावों को आत्मसात करने की। अन्य तमाम राष्ट्रों की तरह हमारी विदेश नीति में भी अमूमन भू-राजनीति के अनुसार दोस्ती और दुश्मनी पर विशेष ध्यान दिया गया है। भू-आर्थिकी को आमतौर पर पीछे रखा गया है। उपनिवेशवाद की मुखालफत, परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग, शीत युद्ध के जवाब में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की रूपरेखा तैयार करना, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों का समर्थन, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की इच्छा, और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक कन्वेंशन का आह्वान विदेश नीति के वे पहलू हैं, जो स्पष्ट दिखते हैं। ऐसी सफलताओं का मकसद अपनी भू-राजनीतिक हैसियत को बढ़ाना, और अपनी अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाना होता है।
जैसे-जैसे वैश्विक मुद्दे उभरते गए, भारत अपनी वैश्विक भूमिका बढ़ाते हुए विकास और आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए और अधिक मुखर होता गया। मिसाल के तौर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलवायु कार्यक्रमों को एक ऐसा मुद्दा माना, जहां भारत अपने नागरिकों के हित में अपनी सरहद के भीतर जो कुछ भी करता है, वह सीमाओं से परे भी मायने रखता है। इसके आर्थिक और राजनीतिक, दोनों फायदे हैं। राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक रिश्तों का लाभ उठाना कोई नई बात नहीं है। दक्षिण के देशों के साथ भारत के दशकों पुराने विकासात्मक सहयोग के समय से ऐसा होता आया है। अंतर बस यह है कि भारत वैश्विक पटल पर उभरने वाले मुद्दों पर जो कुछ करता है या नहीं करता है, उसका पैमाना और वैश्विक प्रभाव अब बदल गया है। जैसे, जलवायु संकट, स्वास्थ्य सुरक्षा और डिजिटल प्रौद्योगिकी। इन्हें अब क्षेत्रीय मसलों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, बल्कि ये वैश्विक चिंता के मसले बन गए हैं।
कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान हमारी विदेश नीति आवश्यक वैश्विक आपूर्ति हासिल करने में खासा अहम साबित हुई। लिहाजा वैश्विक कॉरपोरेट्स का कर-निर्धारण, सीमा-पार के डिजिटल मंचों का नियमन, बिग डाटा का प्रबंधन, आपदा और मानवीय राहत, व्यापारिक मुद्दे जैसे विषयों को व्यापक नजरिए से, विशेषकर वैश्विक आयामों के आधार पर देखने से हमें फायदा मिल सकता है। इसी तरह, प्रवासन और लोगों का मुल्क-बदर होना उभरते मुद्दे हैं। आने वाले दिनों में भारत और अफ्रीका युवा आबादी के सबसे बड़े भंडार होने वाले हैं। इसी तरह, विषाणु-जनित तनाव चिंता के कारण हैं और साइबर सुरक्षा भी। ये सभी आंतरिक सुरक्षा नीति के साथ-साथ वैश्विक मसले हैं, क्योंकि इनमें हमें विश्व स्तर पर काम करना है, और जो घरेलू स्तर पर हम करते हैं, उसका वैश्विक प्रभाव पड़ता है। अपने नजरिए को क्षेत्रीय से वैश्विक बनाने में कई चुनौतियां भी सामने आएंगी। मगर हमें नहीं भूलना चाहिए कि ज्यादातर मामलों में भारत वैश्वीकरण की अंतिम लहर के लाभार्थी के रूप में उभरा है। अब एक अलग तरह के वैश्विक बदलाव हो रहे हैं, हमें उनसे कदमताल करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा। कम शब्दों में कहें, तो हमारी विदेश नीति के एजेंडे को अब पारंपरिक सोच, यानी भू-राजनीति से परे देखने की जरूरत है। 
अच्छी बात है कि इसके लिए हमें अपने फोकस को नहीं बदलना होगा। चीन के साथ सीमा से जुडे़ प्रश्न वैसे ही साल भर महत्वपूर्ण बने रहेंगे, जैसे पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते हैं। अफगानिस्तान में लगातार बनते-बिगड़ते भू-राजनीतिक हालात भी अहम होंगे। वैश्विक बदलावों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी विदेश नीति का दायरा बढ़ाना होगा। भू-आर्थिकी अनिवार्य रूप से भू-राजनीति को प्रभावित करती है। चीन का बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) इसका बड़ा उदाहरण है। जलवायु, स्वास्थ्य सुरक्षा और डिजिटल तकनीक अब विभिन्न प्रकार के भू-राजनीतिक संघर्षों के कारक बन रहे हैं। इसलिए, जिन क्षेत्रों को हमने पहले अपनी विदेश नीति में शामिल नहीं किया था, उन्हें आगे बढ़ाना वैश्विक परिवर्तन की आगामी लहर को आत्मसात करने की हमारी कुंजी होगी। विदेश नीति का मूल लक्ष्य राष्ट्रीय हितों को व्यापक अर्थों में संरक्षित करना, बढ़ावा देना और उनकी रक्षा करना है, न कि उनकी हदें तय करना। हमारे पास समर्पित अधिकारियों के रूप में खासा प्रतिभा है, साथ ही सियासी दुर्ग को संभालने वाले योग्य राजनयिक। राजनीतिक नेतृत्व के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो जोखिम लेने से गुरेज नहीं करते। जरूरत बस इस बात की है कि आगामी वैश्विक बदलावों के अनुरूप विभिन्न नीतियों के तमाम पहलुओं को मुख्यधारा में शामिल किया जाए। 2023 में जी-20 की अध्यक्षता हमारे हाथों में होगी। यह भू-राजनीतिक हितों को भू-आर्थिक विषयों के साथ जोड़ने का अवसर बन सकता है। यदि हम आगामी वैश्विक बदलावों का फायदा उठाना चाहते हैं, तो हमें जल्द ही एक व्यापक वैश्विक एजेंडा बनाना होगा और सावधानीपूर्वक अपनी नीतियां तैयार करनी होंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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