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3 मार्च, 2021|11:03|IST

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जैसे को तैसा का सियासी दांव

अरसे पहले भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विषय में मुझे यह बताया था कि मजबूत संकल्प शक्ति उनका सबसे बड़ा राजनीतिक गुण है। निस्संदेह, हर इंसान की कुछ न कुछ चाहत होती है, लेकिन उसे कामयाबी तभी मिलती है, जब उसकी इच्छाशक्ति मजबूत हो। कार्ल माक्र्स ने भी तो यही कहा है कि कुछ हासिल करने के लिए हमें उस काम के प्रति दृढ़ संकल्प प्रदर्शित करना होगा। आज पश्चिम बंगाल ऐसे ही संकल्पों का रणक्षेत्र बन गया है। भाजपा ने जिस तरह से इसे कुरुक्षेत्र का मैदान बना दिया है, उससे मुझे लालकृष्ण आडवाणी की बातें याद आ रही हैं। यहां का चुनाव जीतना अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी, दोनों का सपना रहा है। वर्षों पुरानी इस चाहत को पूरा करने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी मैदान में उतर आई है। प्रधानमंत्री मोदी अगर देश के सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) हैं, तो उनके सीओओ (मुख्य संचालन अधिकारी) हैं अमित शाह। जब अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बने थे, तभी उन्होंने बताया था कि पार्टी को अखिल भारतीय बनाना उनका सपना है। उन्होंने साफ-साफ कहा था कि पूर्व और दक्षिण में भाजपा कमजोर है, जिसे मजबूत बनाने की तरफ ध्यान दिया जाएगा। आज पूर्वोत्तर तक में पार्टी पहुंच गई है, जबकि दक्षिण में कर्नाटक में उसका झंडा लहरा रहा है। ऐसे में, स्वाभाविक तौर पर उनकी नजर पश्चिम बंगाल पर है, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से बेहद उर्वर राज्य है।
पश्चिम बंगाल ब्रिटिश राज्य में राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता था। मगर बाद के वर्षों में दिल्ली राजनीति का केंद्र बन गई, तो मुंबई आर्थिक गतिविधियों का। ले-देकर सांस्कृतिक माहौल यहां की ताकत रह बची है, वह भी लगातार छीज रही है। यहां परिवर्तन लाना और ममता बनर्जी का राजनीतिक नियंत्रण खत्म करना भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य है। पार्टी बेशक इसके लिए जी-जान से जुटी है, लेकिन पार्टी नेतृत्व जानता है कि ममता को कमतर आंकना उसकी भूल साबित होगी। ममता बनर्जी एक जुझारू नेता हैं। उन्होंने सड़कों पर राजनीतिक लड़ाइयां लड़ी हैं। आज भी वह पूरा दम-खम रखती हैं। 
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रोफेसर मैत्रेयेश घटक ने मुझे एक बार बताया था कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की एक सफल राजनीतिक उद्यमी हैं। वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की एक टीम लेकर अध्ययन के लिए 2007 में पश्चिम बंगाल पहुंचे थे, जब सिंगूर का आंदोलन चल रहा था और नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग हुई थी। ममता बनर्जी ने आम जनता की नाराजगी को अपनी राजनीतिक पूंजी बनाया और 35 वर्षों की वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका। अमित शाह ने हाल ही में एक साक्षात्कार में माना भी है कि ममता बनर्जी का खासा राजनीतिक महत्व है, उन पर निजी रूप से मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रहा, लेकिन बंगाल के लिए कुछ ठोस करने में वह विफल साबित हुई हैं। यही वजह है कि आज भाजपा यहां साम-दाम-दंड-भेद, हर नीति को अपना रही है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के घर पर सीबीआई पहुंच चुकी है। भाजपा इस बहाने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाना चाहती है। प्रधानमंत्री का ममता पर ‘कटमनी’ को लेकर हमलावर होना, उसी की एक कड़ी है। भाजपा की मंशा अभिषेक बनर्जी को निशाने पर लेकर ममता बनर्जी की छवि को खंडित करना है। मुझे याद है कि जब ज्योति बसु यहां के मुख्यमंत्री थे, तब उनके बेटे चंदन बसु के खिलाफ ऐसे ही मामला चला था। मगर आज तक यह साफ नहीं हो पाया है कि चंदन ने कितना भ्रष्टाचार किया था? हालांकि, चंदन कोई राजनीतिक चेहरा नहीं थे, जबकि अभिषेक राजनीति के एक माहिर खिलाड़ी हैं। उन पर कार्रवाई से भाजपा को कितना फायदा या नुकसान होगा, यह तो अभी साफ नहीं है, लेकिन ममता ने इसे ‘पश्चिम बंगाल की बेटी’ पर हमला बताया है। वह पिछले चुनाव में ‘दीदी’ थीं, लेकिन इस बार वह ‘बेटी’ बन गई हैं। यही ममता बनर्जी का राजनीतिक कौशल है। साढ़े तीन दशक की अपनी पत्रकारीय यात्रा में इतना आक्रामक चुनाव मैंने पहले नहीं देखा। इस चुनाव में भाषा का स्तर ही देखिए। जबर्दस्त तू-तू, मैं-मैं हो रही है। दोनों दल एक-दूसरे को सीधे-सीधे टक्कर दे रहे हैं। कभी-कभी लगता है कि ‘बुरा न मानो अभी चुनाव है’। इसे ‘चुनाव संस्कृति’ की देन कहेंगे, जो आज के दिनों में सबसे बड़ी संस्कृति है। भाजपा किस तरह से अपनी तैयारी कर रही है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल चुनाव का आधिकारिक एलान अब तक नहीं हुआ है, लेकिन प्रधानमंत्री पहले से अच्छी बांग्ला बोलने लगे हैं। अमित शाह को भी स्थानीय भाषा में बोलते सुना जा सकता है। तृणमूल कांग्रेस ने कभी वाम मोर्चा की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए ‘परिवर्तन’ का नारा दिया था, आज भाजपा उसी के खिलाफ ‘असली परिवर्तन’ की बात कह रही है। हालांकि, चुनाव में एक बड़ा सवाल राजनीतिक हिंसा का भी है। अद्र्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई जा रही है। राजनीतिक ध्रुवीकरण भी तेज हो गया है। यहां पर 28 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं। आम धारणा है कि ये सभी वोट ममता बनर्जी के खाते में जाते हैं, मगर मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। मुर्शिदाबाद, मालदा जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस जीतती रही है। फिर, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की नजरें भी अब बंगाल पर हैं। उसने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को अपना चेहरा बनाने का फैसला किया है। ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार ममता को कितना मुस्लिम मत मिल पाता है? जाहिर है, यहां ‘जैसे को तैसा’ का सियासी दांव चला जा रहा है। एक आरोप उधर से उठता है, तो दूसरे यहां से लगाए जाते हैं। हालांकि, नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी में समानताएं भी खूब हैं। दोनों जमीनी नेता हैं और उन्हें विरासत में राजनीति नहीं मिली। दोनों लोकप्रिय भी खूब हैं- मोदी देश में, तो ममता राज्य में। ऐसे में, पूरा चुनाव मोदी बनाम ममता बन गया है। हालांकि, ममता के सामने मोदी को खड़ा करना भाजपा की मजबूरी भी है, क्योंकि राज्य में उसका कोई चेहरा नहीं है। देखा जाए, तो यही भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती भी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 24 february 2021