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किसानों को दोषी न ठहराया जाए

किसी भी समस्या के लिए किसानों पर दोष मढ़ देना आज सबसे आसान काम है। पिछले कई वर्षों से किसी न किसी तरीके से किसानों को ही निशाना बनाया जा रहा है। पराली-दहन की समस्या में भी उन्हें ही खलनायक बताया...

किसानों को दोषी न ठहराया जाए
Amitesh Pandeyदेविंदर शर्मा, खाद्य एवं कृषि विशेषज्ञWed, 22 Nov 2023 11:02 PM
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किसी भी समस्या के लिए किसानों पर दोष मढ़ देना आज सबसे आसान काम है। पिछले कई वर्षों से किसी न किसी तरीके से किसानों को ही निशाना बनाया जा रहा है। पराली-दहन की समस्या में भी उन्हें ही खलनायक बताया जा रहा है, जबकि गलत नीतियों को आगे बढ़ाने और संकट बढ़ाने की जिम्मेदारी से हमारे नीति-नियंता बच नहीं सकते। पराली-दहन कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे किसानों ने पैदा की है। यह तकनीक की देन है। इसमें दोषी फसल कटाई मशीनें हैं, क्योंकि जब ये मशीनें फसल काटती हैं, तो करीब दो फुट पराली छोड़ देती हैं। समस्या की जड़ यही है, क्योंकि इन मशीनों के आने से पहले यह समस्या नहीं थी।
आज पंजाब में करीब 200 लाख टन पराली निकलती है। पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने कार्यकाल में नई दिल्ली से गुजारिश की थी कि उनको धान के लिए 100 रुपये प्रति क्विंटल अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाए, ताकि पराली को प्रभावी रूप से नियंत्रित करने के लिए वह राशि किसानों में बांटी जा सके। अगर उस समय उनकी यह मांग मान ली गई होती, तो आज पराली की समस्या इतिहास बन चुकी होती। मौजूदा मुख्यमंत्री भगवंत मान भी किसानों को प्रति एकड़ 2,500 रुपये (1,000 रुपये पंजाब व दिल्ली सरकार और 1,500 रुपये केंद्र सरकार) अनुदान देने की मांग करते हैं, लेकिन इस पर भी गौर नहीं किया जा रहा। 
हकीकत यही है कि पंजाब में हमने इस समस्या को पैदा होने के लिए मजबूर किया है। यहां 32 लाख हेक्टेयर में धान की बुआई होती है। यह स्थिति तब है, जब धान यहां की फसल नहीं है। वास्तव में, देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हमारे नीति-नियंताओं ने वहां के किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित किया था। इस चुनौती को पंजाब के किसानों ने सफलतापूर्वक स्वीकारा भी। आज भी यहां पैदा हो रहे 190 लाख टन धान में से बमुश्किल पांच फीसदी ही पंजाब में इस्तेमाल होता है, शेष 95 फीसदी चावल के रूप में या तो अन्य राज्यों में जाता है या फिर विदेश। बेशक, हमें यहां धान से हटाना है, लेकिन इसके लिए हमें किसानों को ठोस विकल्प देना होगा। पिछले साल ही जब यह अंदेशा हुआ था कि मौसम की मार के कारण धान की पैदावार कम हो सकती है, जो कि हुई भी, तो चावल का निर्यात रोक दिया गया था। यह जानते हुए भी कि किसान हमारे अन्नदाता हैं, हम उन्हीं पर उंगली उठा रहे हैं।
आज पूरे समाज को किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए, लेकिन इसके उलट उनको गिरफ्तार करने का डर दिखाया जा रहा है। इस साल तो पुलिस की निगरानी में किसान फसल काट रहे हैं। उन पर अब तक करीब दो करोड़ रुपये के जुर्माने लग चुके हैं, और 900 से अधिक एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। क्या यह विडंबना नहीं कि एक कृषि प्रधान देश में किसान पुलिस की निगरानी में खेती करें? ऐसे में, नजर स्वाभाविक तौर पर अदालत की तरफ जाती है, और यह देखकर सुकून मिलता है, जब वह कहती है कि  ऐसा लगता है कि हम किसानों पर दोष मढ़ रहे हैं, मगर दूसरी तरफ, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से वंचित करने संबंधी टिप्पणी भी आ जाती है। 
किसानों को हम कैसे दोषी ठहरा सकते हैं, जब वे खुद कह रहे हैं कि खेतों में ही वे इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। वे इसके लिए प्रोत्साहन राशि की मांग कर रहे हैं, जो पराली-निपटान में अतिरिक्त खर्च के रूप में उनको वहन करना होगा, मगर सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं। किसानों की यह मांग इसलिए भी अनुचित नहीं जान पड़ती, क्योंकि देश में सबसे कम आमदनी किसानों की ही है। 
सवाल है, आखिर होना क्या चाहिए? सबसे पहले तो जो किसान कह रहे हैं, उन पर हमें गौर करना चाहिए। क्या हम उनके कहे मुताबिक, अगस्त महीने में ही 2,500 रुपये की प्रोत्साहन राशि उनको नहीं दे सकते, ताकि पराली को वे खेतों में ही निपटा सकें? अगर यह राशि देने के बाद भी वे पराली में आग लगाते हैं, तब उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे शायद ही किसी को ऐतराज होगा।
दूसरी बात, सरकार ने साल 2018-19 में फसल अवशेष प्रबंधन योजना (सीआरएम स्कीम) शुरू की, जिसमें मशीनों को बढ़ावा दिया गया। नतीजतन, आज पंजाब में 1.37 लाख मशीनें खड़ी हैं और दावा है कि यहां के किसानों को रियायती दर पर प्रति 24 हेक्टेयर भूमि पर एक मशीन उपलब्ध कराई जा रही है। आने वाले दिनों में इसे प्रति हेक्टेयर किया जाएगा, यानी हर हेक्टेयर खेत पर एक मशीन उपलब्ध रहेगी। इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले वर्षों में पंजाब मशीनों का डंप-यार्ड बनने जा रहा है, क्योंकि ये मशीनें महज तीन हफ्ते इस्तेमाल होती हैं, शेष समय में यूं ही खड़ी रहती हैं।
इतना ही नहीं, तर्क यह भी दिया जा रहा है कि यहां धान की खेती बंद कर देनी चाहिए। मगर जिस तरह से यहां मशीनों का जाल बिछाया जा रहा है या बायो-फ्यूल प्लांट लगाए जा रहे हैं, अंदेशा यही है कि शायद ही ऐसा हो सकेगा, क्योंकि धान की फसल बंद होने के बाद इन मशीनों या प्लांट के लिए जरूरी कच्चा माल, यानी पराली मिलना भी बंद हो जाएगा। सच तो यह है कि सीआरएम स्कीम लागू होने के बाद यहां धान का रकबा बढ़ गया है। 
दरअसल, आम लोगों की नजर में किसानों को खलनायक बनाया जा रहा है। यह बताया जा रहा है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, सब्सिडी, कर्ज-माफी जैसी तमाम रियायतें मिलती हैं, लेकिन वे समाज की नहीं सोच रहे! यह एक गलत धारणा है। पराली में आग लगाने के दुष्प्रभावों से किसान भी परिचित हैं। यहां तक कि कई किसान इसके कारण खुद सांस की बीमारियों के शिकार हो गए हैं और दवा पर उनकी निर्भरता बढ़ गई है। मगर दिक्कत यह है कि खेती-किसानी को न जानने वाले आज पराली की समस्या का समाधान दे रहे हैं। जिनको मूल वजह ही नहीं पता, उनसे समाधान की उम्मीदें आखिर कितनी की जाए?
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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