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ओपिनियनअपनत्व से भरे नेता की विदाई

कलराज मिश्र, राज्यपाल, राजस्थानPublished By: Rakesh Kumar
Wed, 22 Jul 2020 12:22 AM
अपनत्व से भरे नेता की विदाई

मेरे परम मित्र और अग्रज भ्राता समान लालजी टंडन आज हमारे बीच नहीं रहे। भारतीय जनता पार्टी के शुरुआती दिनों से ही उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ जनता की सेवा की। पार्टी संगठन को आवश्यकता पड़ने पर उचित सलाह- मशविरा देने का कार्य भी उन्होंने खूब किया। सही शब्दों में कहा जाए, तो उत्तर प्रदेश में पार्टी को सुदृढ़ बनाने में उनका महती योगदान था। यह कहना मेरे लिए दु:खद है कि वह अब नहीं रहे।

अभी लगभग डेढ़ माह पूर्व ही 30 मई को मेरी स्वयं उनसे भोपाल में फोन पर बात हुई थी। मुझे जानकारी मिली थी कि मध्य प्रदेश के राजभवन में कुछ लोग कोरोना से संक्रमित हो गए हैं, तो मुझे चिंता हुई। मैंने उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली। लखनऊ  में वेदांता हॉस्पिटल में जब वह भर्ती हुए, तो उनके पुत्र से अनेक बार बात हुई। उनके स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट देख मुझे गहरी चिंता थी। मैं भगवान से प्रार्थना करता था कि वह जल्दी स्वस्थ हो जाएं, लेकिन मंगलवार सुबह 5.30 बजे हम सभी को छोड़कर चले गए। मैं स्तब्ध रह गया। काम में मन नहीं लगा। उनके साथ रहने के कारण स्मृतियां मन-मस्तिष्क में आने लगीं।

जब लखनऊ को केंद्र बनाकर मैंने पार्टी के महामंत्री के रूप कार्य करना प्रारंभ किया, तब हमारे दल की स्थिति ठीक नहीं थी। उस समय टंडनजी विधान परिषद के सदस्य थे। मैं उनके पास गया। घर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वह राजा की मशहूर ठंडाई पिलाते थे। उनकी कार्यशैली बहुत प्रभावी थी। लोगों में उनका विश्वास जमा हुआ था। मुझे लगा कि उनका उपयोग पूरे प्रदेश में प्रभावी तौर पर करना चाहिए। मैंने उनसे आग्रह किया कि लखनऊ केंद्र पर पार्टी का कोई प्रभावी व्यक्ति नहीं है, आपको कार्यालय संभालना होगा। तब कल्याण सिंह अध्यक्ष थे और मैं महामंत्री था।

कार्यालय में ऐसे ही व्यक्ति की आवश्यकता थी, जिसे पूरे प्रदेश की चिंता हो, जिसका सभी सम्मान करते हों। मैंने कार्यालय पर प्रात: 9 बजे से शाम तक रहने के लिए कहा। पूरे प्रदेश से आने वाले कार्यकर्ताओं की वह चिंता करते थे। उनसे मैंने कहा कि मुझे आप योजना बनाकर बताएं। मेरे आग्रह पर उन्होंने लगातार पार्टी कार्यालय पर बैठना शुरू किया। उस समय पार्टी की हालत खराब थी। हम सोच भी नहीं सकते थे कि पार्टी सत्ता में आ सकती है। उनके पत्रकारों से भी अच्छे संबंध थे। सबका सहयोग करते थे। कार्यकर्ताओं व सब लोगों का विश्वास हासिल करने में वह कामयाब रहे।

1989 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव थे। उस समय हमारी संख्या कम थी। कल्याण सिंह को तब विधायक दल का नेता बनाया गया था। टंडन जी पार्टी प्रवक्ता बने। आंदोलन में उस समय उनकी प्रभावी भूमिका रही। साल 1991 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए। मुलायम सिंह की सरकार थी। संसदीय उम्मीदवार के रूप में अटल जी सुनिश्चित किए गए। पूरे प्रदेश के चुनाव की जिम्मेदारी मेरी थी। उस समय अटल जी के चुनाव में किसी प्रकार की कमी न हो, इसलिए टंडन जी को जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने बड़ी कुशलता से चुनाव अभियान को व्यवस्थित किया। उनके कुशल संचालन में अटल जी को हराने में लगे विरोधी दल के लोगों को हमारे लोगों ने पराजित कर दिया। अटल जी विजयी हुए। विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। उस समय टंडन जी को मंत्रिमंडल में शामिल कराने की पुरजोर कोशिश मैंने की थी। मुझे पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। मैं कह सकता हूं कि राज्य सरकार और पार्टी अध्यक्ष में तब बेहतर सामंजस्य था। उस वक्त टंडन जी, कल्याण सिंह, ओमप्रकाश जी, राजेंद्र जी, सभी अध्यक्ष के साथ मिलकर चर्चा करते थे।

उत्तर प्रदेश में शासन हो या पार्टी, दोनों में टंडन जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मिलकर काम करते थे। चार-पांच लोग बैठकर शासन की दृष्टि से भी निर्णय लेते थे। सभी मंत्रियों को सहभागी बनाया जाता था। संगठन और शासन में अच्छा समन्वय था। कोई भी व्यक्ति आता, तो उसकी समस्या का समाधान होता था। उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में भाग लिया। मैंने भूमिगत रहकर काम किया। उन्होंने जेल में रहकर भी मार्गदर्शन किया। टंडन जी जुड़ी इतनी यादें हैं कि उन पर पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। साल 1996 में चुनाव हुए, तब सबसे बड़ी पार्टी भाजपा रही, लेकिन बहुमत नहीं आया। टंडन जी मंत्री बने, मैं भी मंत्री बना। हम दोनों ने मिलकर कोशिश की कि जहां भी रहें, प्रदेश में ऐसा संदेश जाए कि सभी मिलकर अच्छा कार्य कर रहे हैं। उन्होंने नगर विकास मंत्री रहते हुए अद्भुत कार्य किए। वह पहले परिषद के सदस्य रहे थे, तब का अनुभव उनके बहुत काम आया।

अटल जी के बाद टंडन जी चुनाव लड़े। सांसद बने। मैं उन्हें अपना बड़ा भाई मानता था। वह मेरी परेशानी का निवारण भी करते थे। एक घटना मुझे याद आ रही है। किसी ने उनसे मेरी चुगली कर दी। मुझे पता लगा, तो मैं बहुत दुखी हुआ और महसूस हुआ कि उनके मन में भी गहरी पीड़ा हो रही होगी। मैं कहीं बाहर से आया था, लेकिन अपने आपको रोक नहीं सका और रात को ही उनके पास पहुंच गया। तब रात के 12 बज गए थे। चैक स्थित उनके घर गया। उन्हें जगाया। उनको पूरी बात बताई। उन्होंने कहा कि मुझे भी कष्ट हुआ। उनमें बड़ी सहजता, अपनापन था। कई घटनाओं का उल्लेख कर सकता हूं। वह भी दिन थे, अटल जी के लिए टंडन जी के घर से खाना आता था। सब मिलकर रहते थे।

वह मुख्यालय पर ज्यादा रहते थे। कार्यकर्ता उनके पास ही आते थे। मुझे बाहर की जिम्मेदारी दी गई थी। वे लोगों के आकर्षण का केंद्र थे। पूरे देश के लोग उनके पास जाते थे। राज्यपाल बनने से पहले भी उनके पास लोगों का तांता लगा रहता था। आत्मीयता व सहजता उनके व्यवहार में थी। हिंदू हो या मुस्लिम, सभी के बीच उनका स्थान महत्वपूर्ण था। सभी वर्ग व संप्रदाय के लोग मिलने आते थे। वह किसी के दुश्मन नहीं थे। सभी से प्यार करते थे। आज मैं अकेलापन महसूस कर रहा हूं। उनके प्रति अपार श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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