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6 अप्रैल, 2020|11:48|IST

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मुनाफे का गणित और खतरे की घंटी

alok joshi  senior journalist  file pic

इंसान फोन लेता है बात करने के लिए। जिस कंपनी का यह विज्ञापन था, कुछ समय बाद उसने ही फिर बताया- इंसान बात करता है तरक्की के लिए। और एक अन्य साहब थे, जो सबको बताते थे कि कहां-कहां और कैसे-कैसे तरक्की हो सकती है, एक छोटे से मोबाइल के रास्ते। लोगों ने बात पकड़ ली। न सिर्फ तरक्की, बल्कि मनोरंजन, राजनीति और अपने सारे हिसाब सलटाने का हथियार भी बना डाला मोबाइल को। लेकिन इसमें कुछ झोल हो गया। और उसी का नतीजा है कि देश भर के लोगों की तरक्की की जिम्मेदारी उठाने वाला टेलीकॉम सेक्टर आज एक तरह से जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। पिछले 20 साल में देश की 20 से ऊपर टेलीकॉम कंपनियां बंद हो चुकी हैं।

खास बात यह है कि इस दौरान कारोबार लगातार बढ़ता रहा। इस वक्त आइडिया-वोडाफोन के पास करीब 30 करोड़ और एयरटेल के पास लगभग 28 करोड़ कनेक्शन हैं। दोनों मिलकर भारत के टेलीकॉम कारोबार में 60 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदार हैं। लेकिन ये दोनों घाटे में हैं। पिछली तिमाही में भारतीय एयरटेल को लगभग एक हजार करोड़ रुपये और आइडिया-वोडाफोन को करीब साढे़ छह हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। ये कारोबारी घाटा है। इसकी एक बड़ी वजह इस धंधे में मौजूद तीसरा बड़ा खिलाड़ी है- रिलायंस जियो। पिछले डेढ़-दो साल से इस कंपनी ने जियो के सिम, जियो के कनेक्शन और डाटा या कॉल प्लान दूसरों से बहुत सस्ते में बांट-बांटकर खूब सारे ग्राहक जोडे़ हैं। और उससे मुकाबले के चक्कर में सामने खड़ी ये दोनों कंपनियां भी रेट कम करते-करते इस हाल में पहुंच गईं। रिलायंस जियो अब देश की इकलौती टेलीकॉम कंपनी है, जो फायदे में चल रही है।

कहा जाता है कि जब मुसीबत आती है, तो अकेली नहीं आती। थोड़ा पीछे चलें, तो किस्सा वहां से शुरू होता है, जिसे पिछली सरकार का सबसे बड़ा घोटाला बताया जाता है, यानी 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला। भारत सरकार के सबसे बडे़ ऑडिटर यानी सीएजी ने यह भंडाफोड़ किया था कि तब के टेलीकॉम मंत्री ए राजा ने मनमाने तरीके से मोबाइल टेलीफोनी के लिए स्पेक्ट्रम का अधिकार बांटा और इससे सरकारी खजाने को एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह बड़ी रकम थी, और विनोद राय जैसे काबिल अधिकारी की राय थी, तो पूरे देश ने इसे गंभीरता से लिया। जो बवाल मचा, जो राजनीति हुई और उसका जो नतीजा हुआ, वह आज सबके सामने है।

लेकिन यह बात अब लगभग पूरी तरह खुल गई है कि जितने बड़े नुकसान का अंदाजा लगाया गया था, वह सही नहीं था। ज्यादातर विद्वान इस बात पर एकमत हैं। लेकिन अब तो काफी देर हो चुकी है। जिन कंपनियों के लाइसेंस पर सवाल थे, उनमें से ज्यादातर बंद हैं, कुछ के मालिक तो जेल जा चुके हैं और उनके दूसरे धंधे भी बरबाद हो चुके हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यही हुई है कि दुनिया भर की बड़ी कंपनियों के मन में आशंका पैदा हो गई कि भारत में पैसा लगाना बडे़ जोखिम का काम है। वोडाफोन ने तो फिर भी हिम्मत दिखाई, और इसी तरह एयरटेल के विदेशी पार्टनर सिंगापुर टेलीकॉम, यानी सिंगटेल ने भी भारत पर भरोसा नहीं खोया। शायद इसलिए कि इन कंपनियों का यहां काफी कुछ दांव पर था। इसी भरोसे के कारण पिछले साल आइडिया-वोडाफोन के राइट्स इशू में करीब 25 हजार करोड़ रुपये उसके प्रोमोटरों ने ही लगाए। उन्हें अंदाजा था कि मार्च 21 तक कंपनी को करीब तीस हजार करोड़ रुपये और खर्च करने पड़ सकते हैं। मगर यह हिसाब बिगड़ गया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से। कंपनियों को कुल मिलाकर करीब 1.40 लाख करोड़ रुपये चुकाने का हुक्म मिल गया।

दरअसल, संचार विभाग और मोबाइल या टेलीकॉम कंपनियों में समझौता है कि कंपनियां अपनी कमाई का एक हिस्सा सरकार को या संचार विभाग को देती रहेंगी। इससे उन पर एक साथ भुगतान का बोझ नहीं पड़ता और यदि कारोबार काफी तेज हो जाए, तो सरकार को भी नुकसान न होता। लेकिन झगड़ा हो गया इस बात पर कि कमाई का हिसाब कैसे लगाया जाए? सरकार ने हिसाब जोड़ा कि टेलीकॉम लाइसेंस लेने वाली कोई भी कंपनी जितनी भी कमाई करेगी, उस पूरी कमाई में से हिस्सा देना होगा, जबकि कंपनियों का तर्क है कि सिर्फ टेलीकॉम कारोबार से होने वाली कमाई का ही हिस्सा बांटा जाए। इस गणित का ही नतीजा है कि ऑयल इंडिया, पावर ग्रिड और गैस अथॉरिटी जैसी सरकारी कंपनियों पर भी कुल मिलाकर करीब तीन लाख करोड़ रुपये की देनदारी निकल आई है, जबकि वे टेलीकॉम से कमाई या तो नहीं करती हैं या फिर न के बराबर। उनसे यह हिस्सा सिर्फ इसलिए मांगा जा रहा है, क्योंकि उनके पास टेलीकॉम लाइसेंस है, जो उन्होंने इस उम्मीद में लिया था कि शायद भविष्य में कभी वे ऐसा कोई इंतजाम खड़ा करें, जिससे कमाई हो सकती हो। इन कंपनियों का मामला तो टीडीसैट में है और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत दे रखी है। सवाल उठ रहा है कि फिर रिलायंस इंडस्ट्रीज की पूरी कमाई में से भी संचार विभाग क्या यह हिस्सा मांग सकता है?

एयरटेल ने तो पैसा भरना शुरू भी कर दिया है। लेकिन खासकर आइडिया-वोडाफोन के लिए यह बड़ी मुसीबत है। उसे करीब पचपन हजार करोड़ रुपये सरकार को चुकाने हैं। खबर है कि यह रकम और बढ़ सकती है, क्योंकि सरकारी अफसरों ने अभी साल 2017 के बाद की देनदारी का हिसाब तो जोड़ा ही नहीं है। अगर कंपनी यह रकम नहीं भर पाई, तो वह बंद हो जाएगी, लेकिन सरकार की भी इतनी बड़ी रकम डूब जाएगी। इसी कंपनी ने अनेक बैंकों से, जिनमें स्टेट बैंक भी है, करीब पचास हजार करोड़ रुपये का कर्ज ले रखा है, कंपनी दिवालिया हो गई, तो उसकी वसूली भी मुश्किल।
यहां यह बात हमें ध्यान में रखनी होगी कि कमाई में हिस्से का फॉर्मूला 1999 में बना था, जबकि स्पेक्ट्रम की नीलामी 2010 के बाद से हो रही है। तो यह गणित ही सवालों के घेरे में है। अभी सरकार बीएसएनएल को 70 हजार करोड़ रुपये का पैकेज दे चुकी है। फिर उसे आइडिया-वोडाफोन को राहत देने का रास्ता क्यों नहीं निकालना चाहिए? खासकर तब,जब इस कंपनी के बंद होने में सरकार और ग्राहकों का भी बड़ा नुकसान है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 22nd February 2020