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21 अक्तूबर, 2020|10:59|IST

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कैसी हो पुलिस, समाज तय करे

टेलीविजन रेटिंग प्वॉइंट्स (टीआरपी) घोटाले की आंच अब उत्तर प्रदेश तक पहुंच गई है। राज्य सरकार की सिफारिश पर हजरतगंज (लखनऊ) पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया है। टीआरपी में यदि गड़बड़ी हुई है, तो यह वाकई गंभीर अपराध है और अपराधियों को कानून के मुताबिक सजा मिलनी ही चाहिए। मगर इस घोटाले के दो अन्य पहलू भी हैं, जिन पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है। पहला पहलू मीडिया की आजादी से जुड़ा है, तो दूसरा, कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कामकाज से। इन एजेंसियों में पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई जैसी तमाम संस्थाएं शामिल हैं।
मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खुद को स्वतंत्र मानता है। इस मौलिक अधिकार का जिक्र संविधान के अनुच्छेद-19 में है। मगर 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के कुछ महीनों बाद ही यह महसूस किया जाने लगा था कि इस अधिकार को लोग असीमित मानने लगे हैं। इसीलिए 1951 में खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहला संविधान संशोधन विधेयक लेकर आए, जिसमें कहा गया कि सार्वजनिक हित में मौलिक अधिकारों पर पाबंदी लगाई जा सकती है। नेहरू का कहना था कि ये बेशक सांविधानिक अधिकार हैं, लेकिन देश की सुरक्षा व सामाजिक हित के लिए एक सीमा के बाद इन अधिकारों पर पाबंदी जरूरी है। जब किसी एक का मौलिक अधिकार दूसरे व्यक्ति के अधिकार को प्रभावित करे, तो उस पर बंदिश लगनी ही चाहिए। नेहरू ने ये बातें मीडिया के संदर्भ में नहीं कही थीं, पर आज ये उस पर कहीं ज्यादा सटीक बैठ रही हैं। उनकी बातों का अर्थ यही था कि मौलिक अधिकार और उनके इस्तेमाल के बीच एक संतुलन आवश्यक है। 
दुर्भाग्य से, यही संतुलन आज बिगड़ता दिख रहा है। संविधान सभी से यह अपेक्षा करता है कि लोग उन कानूनों का पालन करेंगे, जो संविधान-विरोधी नहीं हैं। मगर जब ऐसा नहीं होता, तो पुलिसिंग शुरू हो जाती है। पुलिसिंग और पुलिस एजेंसी, दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं, इसे एक समझने की भूल कतई न करें। पुलिसिंग एक व्यापक विचार है, जिसमें कानून लागू करने वाली प्रक्रिया के सभी अंग आते हैं। यह दो तरह की होती है, आंतरिक और बाहरी। मीडिया के मामले में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन या सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन जैसी संस्थाएं आंतरिक तौर पर रेग्यूलेट, यानी विनियमन का काम करती हैं। जबकि बाहरी पुलिसिंग का काम कानून लागू करने वाली एजेंसियों के जिम्मे है। अभी दिक्कत यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मौलिक अधिकारों का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल नहीं हो रहा, जिस कारण बाहरी पुलिसिंग की जरूरत बढ़ती दिख रही है। मगर सवाल यह है कि जिसे यह जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, वह एजेंसी इसके लिए कितनी तैयार है?
बेशक पुलिस कानून लागू करने वाली एकमात्र एजेंसी नहीं है, मगर आम धारणा में यह उसी का दायित्व माना जाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अपने यहां पुलिस सरकार का हिस्सा है, जबकि अमेरिका, जापान जैसे तमाम देशों में यह एक स्वायत्त संस्था है। इसी कारण अपने यहां पुलिस का सदुपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा दिखता है। इतना ही नहीं, अपने यहां पुलिस की जिम्मेदारी दोहरी प्रवृत्ति की है। वह नियुक्ति, तबादला, सेवा निवृत्ति जैसे कामों के लिए सरकार व राजनेताओं पर निर्भर है, जबकि कानून लागू करने के वास्ते न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह है। यह एक ऐसा भंवरजाल है, जिससे भारतीय पुलिस चाहकर भी नहीं निकल पा रही। पुलिस की इसी दोहरी प्रकृति का लाभ सरकार उठाती है। बाबरी मस्जिद ध्वंस इसका एक बड़ा उदाहरण है। 6 दिसंबर, 1992 को जब आयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, तब आनन-फानन में वहां के तत्कालीन डीएम और एसएसपी को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन आज की तारीख में कानूनन कोई राजनेता या कोई इंसान इस घटना का कुसूरवार नहीं है। 
जाहिर है, लोकतंत्र में पुलिस के माध्यम से शासन करने का तरीका गलत है। स्थिति यह है कि आज पुलिस-प्रशासन को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हैं। जो आज सत्ता में है, वह विपक्ष में जाने पर वही भाषा दोहराता है, जो आज विपक्षी दल बोल रहे होते हैं। पुलिस सैद्धांतिक तौर पर ‘एजेंसी ऑफ लॉ’ (कानून लागू करने वाली संस्था) होती है, पर असलियत में उसे ‘रूलर्स एजेंसी’ (शासकों की एजेंसी) बना दिया गया है। नतीजतन, आज पुलिस जो कुछ भी करती है, हर किसी को यही लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख्स के इशारे पर वह हो रहा है। अब ‘अपराधी और पुलिस के गठजोड़’ जैसी बातें बेमानी हो चुकी हैं। इससे भी खतरनाक गठजोड़ ‘पुलिस और राजनेता’ का बन चुका है। लिहाजा समाज को ही यह सोचना होगा कि उसे कैसी पुलिस चाहिए? मीडिया से अपेक्षा होती है कि वह समाज को इस बाबत जागरूक करेगा, लेकिन दुखद है कि उसे भी पूरी जानकारी नहीं है। 
आजकल हम यह चर्चा तो खूब करते हैं कि अपने यहां एक लाख की आबादी पर सिर्फ 144 पुलिसकर्मी हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र कम से कम 222 पुलिसकर्मियों की वकालत करता है। मगर हम अपने समाज की प्रकृति पर बहस नहीं करना चाहते। स्वीडन में पुलिस की उतनी जरूरत नहीं होती। नॉर्वे, डेनमार्क जैसे देशों में भी नाममात्र के पुलिसकर्मी दिखेंगे। इसका अर्थ है कि उन समाजों को पुलिसिंग के लिए पुलिस की उतनी जरूरत नहीं है। लोग खुद-ब-खुद नियम-कानूनों का पालन करते हैं। आदर्श स्थिति भी यही है कि समाज में पुलिस का कम से कम दखल हो, लेकिन अपने यहां हालात उलट हैं। 
सन1980 के आसपास जब मैं मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में तैनात था, तब स्थानीय लोग यह पूछने भी आते थे कि वे त्योहार मनाएं कि नहीं? ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें अपने आसपास सीआरपीएफ या केंद्रीय बल की तैनाती नहीं दिखती थी। वे आश्वस्त होना चाहते थे कि सब ठीक-ठाक रहेगा। मानो, त्योहार इन टुकड़ियों को मनाना हो, उन्हें नहीं! 
साफ है, एक जागरूक समाज ही अच्छी पुलिसिंग की व्यवस्था कर सकता है। मगर दुर्भाग्य से हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं है, और पुलिस भी उत्तरोत्तर शासन का हिस्सा बनती जा रही है, जिससे होने वाली गड़बड़ियां हमारे सामने हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि जब पुलिस को राजनीतिक पार्टी का हिस्सा बना दिया जाएगा, तब सदुपयोग से ज्यादा उसके दुरुपयोग होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 22 october 2020