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4 मार्च, 2021|12:45|IST

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अमेरिकी गौरव लौटाने का इरादा 

अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद जो बाइडन का भावपूर्ण उद्बोधन कई मायनों में भरोसा जगाता है। यह वही राष्ट्र है, जहां संसद की गरिमा को कुछ दिन पूर्व चंद लोगों ने तार-तार करने की कोशिश की थी। लिहाजा, कैपिटल हिल के प्रांगण से देश को संबोधित करते समय बाइडन के सामने न सिर्फ लोकतंत्र के प्रति लोगों के डिगे विश्वास को बचाए रखने की चुनौती थी, बल्कि विश्व नेता के तौर पर अमेरिका का खाका भी खींचना था। वह इसमें सफल साबित हुए हैं। इसीलिए डेमोक्रेटिक पार्टी के आलोचक भी यह कहने से नहीं चूक रहे कि जॉन एफ केनेडी के बाद बाइडन से अच्छा भाषण शायद ही किसी राष्ट्रपति ने दिया है। बाइडन ने अपने संबोधन में कैपिटल हिल की हिंसा, कोविड-19 से निपटने में नाकामी और सामाजिक अलगाव की खासतौर से चर्चा की है। अपने चुनाव अभियान के समय उन्होंने कहा भी था कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति-काल में अमेरिकी समाज कहीं ज्यादा बंट गया है। अपने संबोधन में वह इस खाई को पाटने के लिए गंभीर दिखे। बाइडन ने कहा कि बिना एक हुए अमेरिका में शांति नहीं आ सकती। नए राष्ट्रपति ने मूलत: अपने नागरिकों को ही संबोधित किया। उन्होंने अमेरिका में पसर रही नाउम्मीदी पर चिंता जताई। बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट, नस्लवादी असमानता जैसी तमाम समस्याओं को अपने लिए चुनौती माना। अर्थव्यवस्था पर बढ़ते भार और जलवायु परिवर्तन से पैदा होती मुश्किलों का भी उन्होंने जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के 200 साल के इतिहास में इस तरह एक साथ इतने संकट नहीं आए थे। इनको ठीक करना है, और यह तभी हो सकता है, जब पूरा अमेरिका एक हो जाए। 
बाइडन ने यूरोप और ट्रांस अटलांटिक का भले ही नाम नहीं लिया, लेकिन इशारों-इशारों में अपनी विदेश नीति जरूर स्पष्ट कर दी। उनकी बातों का यदि मजमून देखें, तो आने वाले दिनों में अमेरिका विश्व के साथ अपने रिश्ते नए सिरे से शुरू करेगा। इतना ही नहीं, सहयोगी अथवा मित्र राष्ट्रों के साथ बिगड़ते संबंधों को भी दुरुस्त किया जाएगा। पहले ही दिन बाइडन ने जलवायु परिवर्तन समझौते पर वापस लौटकर, विश्व स्वास्थ्य संगठन से हटने के फैसले को रोककर, सीमा पर दीवार बनाने के फैसले को पलटकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। डोनाल्ड ट्रंप जब ह्वाइट हाउस में दाखिल हुए थे, तब उन्होंने ‘अमेरिका फस्र्ट’ का नारा दिया था, लेकिन जो बाइडन ‘अमेरिका टुगेदर’ की वकालत कर रहे हैं। देखा जाए, तो आज के अमेरिका को इसकी सर्वाधिक जरूरत है। वहां जिस तरह से नस्लीय विभाजन बढ़ गया है, उसको देखते हुए अमेरिकियों में एका की सर्वाधिक जरूरत है। अमेरिका की घरेलू खुफिया और सुरक्षा सेवा एजेंसी ‘फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ की रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका में जाति, नस्ल, वंश, धर्म, लिंग आदि के प्रति पूर्वाग्रह से प्रेरित अपराधों में खासा वृद्धि हुई है। साल 2019 में इस तरह के 7,314 अपराध हुए थे, जबकि 2018 में 7,120 अपराध। ये दशक भर पहले यानी 2008 में दर्ज 7,783 मामलों के बाद सबसे ज्यादा ‘हेट क्राइम’ वाले साल हैं।
इसके अलावा भी दोनों राष्ट्रपतियों के भाषण में कई अंतर थे। मसलन, 1,433 शब्दों के अपने भाषण में ट्रंप ने जहां अधिकतर समय उन लोगों की आलोचना की, जो उन्हें पसंद नहीं करते थे, तो बाइडन पूरे अमेरिकियों को संबोधित करते दिखे और सभी से अधिकतम एकता बनाए रखने का आग्रह किया। ट्रंप ने ‘स्ट्रॉन्ग अमेरिका’ (मजबूत अमेरिका), ‘प्राउड अगेन’ (फिर से गौरव अर्जित करना), ‘सेफ अगेन’ (फिर से सुरक्षित होना), ‘ग्रेट अगेन’ (फिर से महान बनना), ‘अमेरिका फस्र्ट’ (सबसे पहले अमेरिका) जैसे नारे दिए थे, तो वहीं जो बाइडन ‘अमेरिका टुगेदर’ (एक अमेरिका), ‘हील अमेरिका’ (अमेरिका के जख्मों पर मरहम लगाना) जैसे शब्दों पर जोर देते नजर आए। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति ऐसी आग नहीं बननी चाहिए, जो अपने मार्ग में आने वाले हर चीज को जला दे। राजनीतिक असहमति किसी भी तरह से युद्ध की वजह नहीं बननी चाहिए। अपनी इन पंक्तियों के जरिए वह अमेरिकियों को आदर्श लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित कराते दिखे।
बहरहाल, भारत के लिए अच्छी बात यह है कि 20 भारतवंशियों को नए अमेरिकी प्रशासन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। इनमें से कई ह्वाइट हाउस का हिस्सा होंगे, जो अमेरिकी सरकार का प्रमुख स्तंभ माना जाता है। भारतवंशियों का यह सम्मान संकेत देता है कि अमेरिका की शासन-व्यवस्था में भारतीयों का महत्व समझा जाने लगा है, जबकि कुल अमेरिकी आबादी में भारतीय मूल के लोगों की संख्या बमुश्किल एक फीसदी है। भारतीय मूल की कमला हैरिस को उप-राष्ट्रपति तो बनाया ही गया है, नीरा टंडन को ह्वाइट हाउस में प्रबंधन और बजट कार्यालय का निदेशक नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, विवेक मूर्ति को अमेरिकी सर्जन जनरल, वनिता गुप्ता को असोशिएट अटॉर्नी जनरल, उजरा जेया को विदेश मंत्रालय में नागरिक सुरक्षा, लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सचिव बनाया गया है। बाकी तमाम भारतवंशियों को भी अहम ओहदे मिले हैं।
हालांकि, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि ये सभी भारत के हित में ही काम करेंगे। इनमें से अनेक के पूर्वज जब अमेरिका में बसने गए थे, तब से अब तक दो-तीन पीढ़ियां गुजर चुकी हैं। इसीलिए ये सभी बुनियादी तौर पर अमेरिकी हैं और अमेरिकी हितों का ही पोषण करेंगे। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कमला हैरिस ने भी अपने चुनाव अभियान में भारतीय मां की तुलना में जमैका मूल के अश्वेत पिता का ज्यादा जिक्र किया था। वह अपनी अश्वेत पहचान को दक्षिण एशियाई पहचान से ज्यादा तवज्जो देती हैं। यही कारण है कि हमें अपने मुद्दों को लेकर खास रणनीति बनानी होगी। भारत के विदेश मंत्रालय और कूटनीतिज्ञों को पूरी बाइडन टीम से सरोकार रखना होगा। बाइडन प्रशासन में ऐसे भी कई लोग हैं, जो कथित मानवाधिकार हनन और कश्मीर मसले पर भारत की निंदा कर चुके हैं। फिर भी, बाइडन सरकार से काफी उम्मीदें हैं। एक बड़ा मसला आप्रवसान का भी है, जिससे जुड़े दो आदेश पारित करके नए राष्ट्रपति ने अपने पहले दिन की शुरुआत की है। अब नजर ट्रंप की एच-1 बी वीजा पॉलिसी पर है, जिसे खुद बाइडन भेदभावपूर्ण बता चुके हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 22 january 2021