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5 अप्रैल, 2020|6:05|IST

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कुछ सवाल जो बने रहेंगे

रंजना कुमारी निदेशक, सेंटर फॉर सोशल रिसर्च

सात वर्षों के लंबे इंतजार के बाद शुक्रवार की सुबह निर्भया को आखिरकार न्याय मिल गया। अब उनकी आत्मा राहत महसूस कर रही होगी। यह निर्भया के माता-पिता के संघर्ष का सुखद अंत है। उस जघन्य अपराध के दोषियों की फांसी से उन लोगों की नाराजगी शांत हुई होगी, जो 2012 की बर्बर घटना से उद्वेलित थे। इससे सभ्य समाज की न्याय-व्यवस्था को लेकर पनप रहे असंतोष का भी अंत हुआ होगा। यह फांसी उन लोगों के लिए एक सबक है, जो इस तरह की दरिंदगी की मानसिकता रखते हैं। उन्हें एहसास हुआ होगा कि इस अपराध की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ सकती है। बहरहाल, यह वक्त कई सवालों के जवाब तलाशने का भी है। आखिर समाज में इस तरह की घटनाएं बढ़ क्यों रही हैं? वह भी तब, जब हम विकासशील से विकसित देश बनने की ओर बढ़ चले हैं। क्या बतौर जिम्मेदार नागरिक हम ऐसे अपराधों को रोकने में सक्षम हैं? बहस का एक सिरा यह भी होना चाहिए कि महज सख्त सजा से क्या इस अपराध को रोका जा सकता है?

यह तय है कि आज भी अपने समाज में महिलाओं की अस्मिता के प्रति संजीदगी नहीं दिखती। खासतौर से सार्वजनिक स्थानों पर उनके खिलाफ होने वाली हिंसा इसकी तस्दीक करती है। बलात्कार जैसी घटनाओं के बढ़ने की एक वजह यह भी है कि विकृत मानसिकता के लोग औरतों की आजादी व उनके आत्मविश्वास को बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे किसी भी कीमत पर उनके मन में भय पैदा करना चाहते हैं। उनकी नजरों में महिलाएं महज उपभोग की वस्तु होती हैं। ऐसे लोगों के मन में सिर्फ कठोर सजा से खौफ पैदा नहीं हो सकता। 

इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि सख्त कानून की हमें जरूरत नहीं है। हमें असल में, समाजोन्मुखी होकर सोचना होगा। आज ऐसे सामाजिक माहौल बनाने की जरूरत है कि इस तरह की दरिंदगी न हो। और यह तभी संभव है, जब महिलाओं को हकीकत में बराबरी का दर्जा दिया जाएगा। उन्हें समान अवसर देने के प्रति समाज को सजगता दिखानी होगी। यह पहल परिवार से शुरू हो सकती है। आज तमाम दावों के बावजूद घरों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा जारी है। इसे तत्काल बंद करने की आवश्यकता है। यह मां-बाप या घर के बड़े-बुजुर्गों की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे परिवार के बेटे-बेटियों को समान अवसर दें- फिर चाहे यह अवसर शिक्षा के मामले में हो, संपत्ति के मामले में या फिर किसी अन्य मामले में। तमाम तरह के अधिकार लड़कियों को मिलने ही चाहिए। परिवार से शुरू होने वाले इस प्रयास को स्कूल और समाज के अन्य कोनों तक पहुंचाना होगा।

कुछ कदम नीति-नियंताओं के स्तर पर भी उठाने की दरकार है। देश में कई ऐसे कानून हैं, जो महिलाओं के साथ भेद करते हैं, लेकिन धर्म या मजहब के नाम पर वे बदस्तूर कायम हैं। इन सभी कानूनों को खत्म करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोकतांत्रिक कानून की पहुंच देश के हर नागरिक तक हो। निर्भया के दोषियों को तो फांसी दे दी गई, लेकिन बलात्कार और दरिंदगी के जितने मामले अदालत में लंबित हैं, उन पर तत्काल सुनवाई क्या नहीं होनी चाहिए? अपने यहां ऐसे मामलों की संख्या लगभग एक लाख 17 हजार है।

देखा जाए, तो न्याय की वास्तविक जीत तभी होगी, जब इन घटनाओं से गुजरने वाली पीड़िता और उनके परिवार को अदालत के माध्यम से ज्यादा प्रताड़ित न होना पड़े। निर्भया मामले का सुखद पक्ष यह था कि न्याय की मांग करते हुए बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए थे। फिर भी इसे अंजाम तक पहुंचने में सात साल से ज्यादा का वक्त लग गया। ऐसे में, यौन हिंसा की शिकार उन गरीब बच्चियों या वंचित तबके की लड़कियों को आखिर कब तक न्याय मिल सकेगा, जिनका मामला आज भी अदालतों में लंबित है? क्या यह बहस का विषय नहीं है कि उन्हें अब तक इंसाफ क्यों नहीं मिला?

एक अन्य बहस सजा के स्वरूप पर भी होनी चाहिए। अपने यहां बलात्कार के मामले में अपराध साबित होने पर अधिकतम उम्र कैद की सजा दी जा सकती थी। निर्भया मामले के बाद कानूनी प्रावधानों को सख्त बनाते हुए नाबालिग से बलात्कार के मामले में फांसी की सजा तय की गई। लेकिन लोकतांत्रिक राज्य का एक संकट यह भी है कि वह अपने नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा करे या फिर उसका हनन? राजनीतिक तौर पर सख्त सजा के रूप में फांसी को जरूर स्वीकार किया गया है, मगर यह बहस महत्वपूर्ण है कि फांसी की सजा समाधान है या नहीं, क्योंकि तमाम प्रगतिशील देश अब जीवन लेने के अधिकार को न्यायोचित नहीं मानते?

कनाडा में विवाह के बाद पति द्वारा पत्नी से की जाने वाली जबर्दस्ती को भी बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है, और अगर पत्नी ने शिकायत की, तो पति को कानूनन सजा हो सकती है। सवाल यह है कि क्या अपने देश में महिलाओं के अस्तित्व को इस हद तक सम्मान दिया जा सकता है? और बलात्कार की अधिकतम सजा यदि फांसी तय की जाती है, तो क्या यह संभव है कि अदालतों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा से संबंधित 1.17 लाख लंबित मामलों में सुनाई जाने वाली अधिकतम सजा का पालन होगा, क्योंकि सिर्फ दो प्रतिशत को सजा सुनाने का अर्थ है, दो हजार से अधिक अपराधियों की फांसी, और अपने यहां सूली की तख्ती तक अपराधियों को पहुंचाने में लगने वाला वक्त जगजाहिर हो गया है। जाहिर है, बलात्कारियों के लिए अधिकतम सजा फांसी हो या जीवन भर की कैद या फिर उनके सुधार का अन्य रास्ता निकाला जाए- निर्भया के दोषियों की फांसी इस पर भी पुरजोर बहस की मांग कर रही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 21st March 2020