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6 अप्रैल, 2020|10:54|IST

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उभरते देशों में भारतीय विश्वविद्यालय

अगले कुछ माह में विश्वविद्यालयों की कई विश्वस्तरीय और राष्ट्रीय रैंकिंग की घोषणा होनी है। इसकी शुरुआत टाइम्स हायर एजुकेशन (टीएचई), लंदन ने वर्ष 2020 के लिए उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के सर्वश्रेष्ठ 100 विश्वविद्यालयों की अपनी सूची जारी करके कर दी है। इस विशिष्ट रैंकिंग में भारत के 11 विश्वविद्यालयों को शामिल किया गया है, जिनमें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु को 16वां स्थान मिला है।

हालांकि यह टाइम्स हायर एजुकेशन की मूल विश्वस्तरीय रैंकिंग नहीं है। टीएचई की मूल रैंकिंग 2004 में शुरू की गई थी। दुनिया भर के विद्यार्थी और शिक्षक जिन यूनिवर्सिटी रैंकिंग का उपयोग करते हैं, उनमें टाइम्स हायर एजुकेशन, एआरडब्ल्यूयू और क्यूएस सबसे ऊपर मानी जाती है। उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले विश्वविद्यालयों की रैंकिंग वर्ष 2014 में शुरू की गई थी। इसमें चीन, भारत, रूस, ब्राजील, ताईवान, तुर्की और दक्षिण अफ्रीका जैसे 47 देशों के विश्वविद्यालयों को शामिल किया जाता है। इन देशों को लंदन स्टॉक एक्सचेंज, यानी एलएसई की एफटीएसई की सूची के आधार पर चुना जाता है।

ताजा रैंकिंग में भारत के 55 विश्वविद्यालयों के नाम शामिल हैं। आईआईटी (खड़गपुर) और आईआईटी (मुंबई) को क्रमश: 32वीं और 34वीं रैंक मिली है। इन संस्थानों के अलावा कुछ और भारतीय संस्थान शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल हैं। इनमें आईआईटी (दिल्ली) 38वें स्थान पर, आईआईटी (रुड़की) 58वें स्थान पर और आईआईटी (इंदौर) 61वें स्थान पर आए हैं। दो अन्य भारतीय संस्थान, आईआईटी (मद्रास) और आईआईटी (रोपड़) संयुक्त रूप से 63वें स्थान पर हैं। इस तरह के कुल 11 भारतीय संस्थानों को शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल किया गया है। टाइम्स हायर एजुकेशन की 533 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में भारत के 56 विश्वविद्यालय शामिल हैं। हालांकि दबदबा चीन के विश्वविद्यालयों का ही है। टॉप 10 विश्वविद्यालयों में सात चीन के हैं। 

विश्वस्तरीय रैंकिंग में भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान भले ही अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हों, मगर उभरती  अर्थव्यवस्थाओं के विश्वविद्यालयों की वर्ष 2020 की सूची में चीन के बाद भारत की प्रमुखता को उत्साहवर्द्धक ही कहा जाएगा। टीएचई भी भारतीय विश्वविद्यालयों के अच्छे प्रदर्शन से उत्साहित दिखाई देती है। इसके सीईओ फिल बैटी का कहना है कि इस उत्साहजनक प्रदर्शन का कुछ श्रेय भारत सरकार द्वारा 2018 में घोषित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमीनेंस’ योजना को दिया जा सकता है। 

भारतीय उच्च शिक्षा को विश्वस्तर पर चिंताजनक स्थिति से उबारने के कई प्रयास पिछले वर्षों में किए गए हैं। इनमें एक प्रमुख प्रयास था मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा 2016 में शुरू की गई एनआईआरएफ रैंकिंग, जो विश्वस्तरीय तो नहीं है, किंतु इसे शुरू करने का प्रमुख मकसद भारतीय विश्वविद्यालयों को कुंभकर्णी निद्रा से जगाकर उन्हें रैंकिंग संस्कृति और विश्वस्तरीय स्पद्र्धा के लिए तैयार करना था। कई शिक्षाविद रैंकिंग की अंधी दौड़ से खुश नहीं होते। वे पूछते हैं कि भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए रैंकिंग में भाग लेना क्यों जरूरी हैै? गहराई से देखें, तो मालूम पड़ेगा कि वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रहे विद्यार्थियों के आव्रजन का निर्णायक घटक मुख्यतया रैंकिंग ही है। पिछले 30 वर्षों में दुनिया ज्ञान पर आधारित अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ी है। अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय आय का एक बड़ा हिस्सा विदेशी विद्यार्थियों की फीस और उनके रहने-सहने के खर्चों से आता हैै। रैंकिंग की लोकप्रियता का दूसरा प्रमुख कारण है दुनिया भर से अत्यधिक प्रबुद्ध, रचनात्मक और शोध प्रतिभाओं को अपने-अपने देश में आकर्षित किया जाना। कहते हैं कि 21वीं सदी में पूंजी और श्रम के लिए विश्व युद्ध नहीं होंगे, किंतु मानवीय प्रतिभा के लिए सभी देश मारामारी करेंगे। 

भारत की उच्च शिक्षा में हर स्तर पर एक सवाल बार-बार उठता है कि विश्वस्तरीय रैंकिंग में आखिर हमारे विश्वविद्यालय क्यों पिछड़ जाते हैं? आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों को वित्तीय संसाधनों की कोई कमी नहीं रहती, किंतु वे भी इन रैंकिंग में अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाते? विश्वविद्यालयों की रैंकिंग शिक्षण, अनुसंधान, उद्योगों से होेने वाली आय और अंतरराष्ट्रीयकरण के प्रमुख आधारों पर की जाती है। टाइम्स रैंकिंग में 30 प्रतिशत जोर शिक्षण की गुणवत्ता पर, 60 प्रतिशत जोर अनुसंधान और साइटेशन पर, उद्योगों से आय पर 2़ 5 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीयकरण पर 7़ 5 प्रतिशत जोर दिया जाता है। साल 2020 की विश्वस्तरीय टाइम्स रैंकिंग का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि भारत के उच्च शिक्षा संस्थान पढ़ाई-लिखाई और उद्योगों से जुड़ाव के मामले में तो अच्छा प्रदर्शन करते हैं, किंतु अनुसंधान के क्षेत्र में मात खा जाते हैं। एक ओर भारतीय प्रोफेसरों में शोधपत्र प्रकाशित करने की उद्यमिता और उत्साह कम है, तो दूसरी ओर उनके शोधपत्रों का साइटेशन इंपैक्ट भी अपेक्षाकृत कम पाया जाता है।

अगर हम इस बारे में शिक्षकों की राय जानने की कोशिश करें, तो अनेक शिकायतें सुनने की मिलेंगी। जैसे, विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं व पुस्तकालयों में शोध संसाधनों की कमी होना, शिक्षण और प्रशासनिक कायार्ें का बोझ ज्यादा होना, कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में पिछले कई दशकों से शोध कार्यों की हो रही उपेक्षा आदि। उच्च शिक्षा में शोध और अनुसंधान को बढ़ावा देने में अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालयों द्वारा  खुलेपन और वैचारिक अभिव्यक्ति की छूट देना एक प्रमुख प्रेरक तत्व रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते हुए दबाव और राजनीतिकरण ने शोध और अनुसंधान के माहौल पर विपरीत असर डाला है।

विश्वस्तरीय रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों की दुर्दशा पर दुखी और निराश होने से काम नहीं चलेगा। अगर हमें भारत को उच्च शिक्षा का आकर्षण केंद्र बनाकर लाखों विदेशी विद्यार्थियों को भारत में पढ़ने के लिए आकर्षित करना है, तो केंद्र व राज्य सरकारों को मिल-जुलकर उच्च शिक्षा को ज्यादा प्राथमिकता देनी होगी। उच्च शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय आय का एक से 1.5 प्रतिशत खर्च करने से काम नहीं चलेगा। इसे अगले तीन वषार्ें के भीतर 2.5 प्रतिशत करना होगा। अभी हाल में कस्तूरीरंगन कमेटी ने नई शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसौदे में शोध और अनुसंधान पर 20,000 करोड़ रुपये के वार्षिक खर्च का जो प्रस्ताव रखा है, वह स्वागत के योग्य है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्पद्र्धा को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 21st February 2020