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7 अक्तूबर, 2020|12:00|IST

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अमन-चैन का जमीनी अर्थशास्त्र

शांति और समृद्धि का संबंध जगजाहिर है। इतिहास की किताबों में झांकें, तो जहां संघर्ष है, वहां अशांति भी है और गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बेहाली और बेरोजगारी भी। वहीं लूटमार है और मार-काट भी। अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, एशिया, अमेरिका या यूरोप जहां भी देखें, यही कहानी है। 
लेकिन किस्से-कहानियों से आगे बढ़कर दुनिया भर में शांति और समृद्धि का बही-खाता रखने वाली संस्था ‘ग्लोबल पीस इनीशिएटिव’ यानी जीपीआई तो बाकायदा गणित जोड़ती है। साल 2010 से इसने यह काम शुरू किया और 2016 की इसकी रिपोर्ट में बताया गया कि उस साल पूरी दुनिया में करीब 14 लाख, 30 हजार करोड़ डॉलर की रकम हिंसा और संघर्ष की भेंट चढ़ गई। यह उस वक्त की दुनिया की जीडीपी का 12.6 प्रतिशत हिस्सा था। आठ साल में एक बार पूरी दुनिया में अकाल पड़ जाए और कहीं कुछ भी पैदा न हो, यह इतना बड़ा नुकसान था। और यह कहानी सिर्फ एक साल की नहीं है। इसी संस्था जीपीआई की ताजा रिपोर्ट देखें। 2019 में अशांति और हिंसा की आहुति चढ़ने वाली रकम रही 14 लाख, 50 हजार करोड़ डॉलर, मतलब दुनिया की जीडीपी का 10.6 प्रतिशत। ध्यान रहे, लड़ाई-झगड़े की कीमत दुनिया के हर इंसान के खाते में चढ़ रही है, रकम है प्रति व्यक्ति 1,909 डॉलर यानी आज के भाव पर करीब 1.4 लाख रुपये। भारत में एक इंसान की औसत सालाना आमदनी है 1,35,050 रुपये। अब हिसाब जोड़ लीजिए, दुनिया संघर्ष में कितना बरबाद कर रही है। 
वैसे यह भी सही है कि हमारे देश में हर आदमी साल में 1.35 लाख रुपये नहीं कमा रहा है। देश की 20 से 30 फीसदी आबादी तो गरीबी रेखा के नीचे है ही। कोरोना के बाद यह खतरा लगातार बढ़ रहा है कि एक बड़ी आबादी, गरीबी रेखा के ऊपर नहीं रह पाएगी। औसत आमदनी का आंकड़ा इसीलिए महत्वपूर्ण होता है कि उससे पता चलता है कि इस समाज, देश में कितनी क्षमता है अपने सबसे गरीब, सबसे कमजोर लोगों तक मदद पहुंचाने की और उनको सहारा देकर गरीबी की खाई से ऊपर लाने की। 
यही पैमाना दुनिया पर भी लागू होता है। इसीलिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन बनाए गए, ताकि दुनिया के तमाम लोग कम से कम इतनी तरक्की तो कर सकें कि भविष्य की चिंता में हथियार उठाकर शिकार करने या लूटमार के लिए निकलने को मजबूर न होना पड़े। अशांति, हिंसा और हिंसक संघर्ष की खासियत है कि यह एक बार शुरू हुए, तो कब रुकेंगे, कोई नहीं जानता। राहत इंदौरी का मशहूर शेर इसकी सबसे अच्छी मिसाल है- लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में/ यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। 
शायर ने जो बात कही है, वह पूरी दुनिया पर लागू होती है। उदाहरण देख लीजिए। अफगानिस्तान एक अच्छा-भला संपन्न राष्ट्र था, लेकिन एक बार लड़ाई शुरू हुई, तो आज हाल यह है कि उस देश की जीडीपी का 51 प्रतिशत हिस्सा इसी में बरबाद हो रहा है। सीरिया में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत है। किसी संघर्ष से खर्च कितना बढ़ता है, यह देखना चाहिए। जो लोग बांग्लादेश के जन्म यानी 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौर के गवाह हैं, उन्हें याद होगा कि तब सरकार ने शरणार्थियों की मदद के लिए करीब-करीब हर चीज पर पांच पैसे का सरचार्ज लगाया था। यह चार्ज कभी खत्म नहीं हो पाया। 
शरणार्थी समस्या आज भी जारी है। दुनिया में करीब 2.60 करोड़ शरणार्थियों में से करीब 85 प्रतिशत का भार विकासशील देश ही उठाते हैं। अशांत क्षेत्रों की कीमत शांत क्षेत्रों को भी चुकानी पड़ती है। पिछले कुछ वर्षों से अफगानिस्तान की आग फैल रही है, पाकिस्तान का बड़ा हिस्सा उसकी चपेट में है और कश्मीर पर लगातार खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। भारत और चीन दुनिया के उन तीन देशों में शामिल हैं, जो अपनी जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा फौज और हथियारों पर खर्च कर रहे हैं। पाकिस्तान भी खास पीछे नहीं है, वह इस सूची के शीर्ष दस देशों में शामिल है। साफ है, इन देशों में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजों पर खर्च के लिए जरूरी पैसा कम क्यों पड़ता है? यह सोचना जरूरी है, खासकर इसलिए भी कि हमारी सरकार की कुल देनदारी बढ़कर 101 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी है। यह हाल सिर्फ भारत का नहीं है, दुनिया की ज्यादातर सरकारें परेशानी में हैं। 
अब दुनिया भर में आवाज उठ रही है, खासकर कोरोना संकट के बाद कि सरकारें फौज, हथियारों पर खर्च घटाएं और वहां लगाएं, जहां से वे कोरोना जैसे खतरों का मुकाबला करना आसान बना सकें। लेकिन हम कैसे तय करेंगे कि किस पर खर्च घटाया जा सकता है? यही सवाल दुनिया भर की सरकारों और नीति-निर्धारकों के सामने रखा जा रहा है। एक तरफ तो उनके सामने यह समस्या है कि कोरोना जैसी बीमारी से निपटने के लिए जो खर्च होगा, इसकी वजह से जो आर्थिक नुकसान होगा और कमाई जितनी कम हो चुकी होगी, उसके बाद फौज पर खर्च करने के लिए उनके पास कितनी रकम बचेगी? और दूसरा बड़ा सवाल यह कि जिस लड़ाई की तैयारी में वे दसियों साल से खर्च कर रहे थे, जिस खतरे से मुकाबले के लिए देश की दौलत का सबसे बड़ा हिस्सा हथियारों और फौजों पर फूंक रहे थे, उससे कहीं बड़ा खतरा अब सबके सिर पर है। 
परमाणु हथियारों के खिलाफ संघर्षरत ‘इंटरनेशनल कैंपेन टु अबॉलिश न्यूक्लियर वेपन्स’ जैसे अनेक संगठनों ने अपील की है कि सरकारें फौज पर होने वाले खर्च की समीक्षा करें। खासकर यह देखते हुए कि अब नए खतरे खड़े हो रहे हैं, जो हथियारों से नहीं टाले जा सकते। महामारियां पहले लगभग 30 साल के बाद एक बार लौटा करती थीं, अब पिछले दस साल में दो विश्वव्यापी महामारियां आ चुकी हैं। कोरोना ने सेहत के खतरे का भयावह स्वरूप दुनिया को दिखा दिया है। काश! संघर्ष की बजाय सेहत-व्यवस्था सुधारने पर पर्याप्त खर्च किया गया होता, तो आज हम ज्यादा आश्वस्त व सुरक्षित होते। 
अब यह बात सरकारों और समाज, दोनों को समझनी है कि नई दुनिया में नए अंदाज में रहना पड़ेगा और यहां हथियारों के मुकाबले शांति ही ज्यादा कारगर साबित होगी। इसका फायदा कितना होगा, यह हिसाब तो बाद में ही लगेगा, लेकिन इस राह पर न चलने का नुकसान कितना हो सकता है, यह सामने साफ दिख चुका है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 21 september 2020