फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियनराजभवन में विधेयकों का रुकना

राजभवन में विधेयकों का रुकना

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि से कडे़ सवाल पूछे हैं। राज्यपाल ने विधेयकों को मंजूरी देने में काफी देरी की थी और उसके बाद ही तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका...

राजभवन में विधेयकों का रुकना
Amitesh Pandeyएस. श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारMon, 20 Nov 2023 10:45 PM
ऐप पर पढ़ें

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि से कडे़ सवाल पूछे हैं। राज्यपाल ने विधेयकों को मंजूरी देने में काफी देरी की थी और उसके बाद ही तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी। इस याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने दोटूक पूछा है कि ये विधेयक 2020 से लंबित थे, तो राज्यपाल तीन साल से क्या कर रहे थे? ध्यान रहे, पंजाब और केरल सरकार ने भी इसी तरह की याचिका लगा रखी है। सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई से फिर यह बात उभकर सामने आई है कि ‘क्या कोई राज्यपाल किसी विधेयक को विधानसभा में वापस भेजे बिना उस पर मंजूरी रोक सकता है?’
सर्वोच्च न्यायालय की ताजा नाराजगी से पहले तमिलनाडु के राज्यपाल ने दस विधेयक सरकार को लौटा दिए थे, इस पर नाराज तमिलनाडु सरकार ने महज दो दिन बाद आनन-फानन में विधानसभा सत्र बुलाया और दस विधेयकों को पारित कर फिर से राज्यपाल के पास भेज दिया। अब गेंद फिर राज्यपाल के पाले में है और सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनकी आलोचना की है। 
शीर्ष अदालत इस सप्ताह राज्यपाल के खिलाफ तमिलनाडु की याचिका पर सुनवाई कर सकती है। वैसे, उसके अब तक के रुख से सामान्य तौर पर राज्यपालों और विशेष रूप से रवि को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि विभिन्न विधेयकों पर उनके रुख अस्थिर हैं। विपक्षी दलों की यह गंभीर शिकायत है कि अनेक राज्यों में राज्यपाल अति-उत्साह में संबंधित राज्य सरकारों को तनाव में रखने के लिए अपने कार्यालयों का दुरुपयोग कर रहे हैं, पर रणनीति स्पष्ट रूप से विफल हो रही है।
पश्चिम बंगाल, केरल, तेलंगाना और पंजाब के राज्यपालों का अतीत मेें अपनी-अपनी राज्य सरकारों के साथ मतभेद रहा है। वैसे तो सामान्य तौर पर हर दौर में ऐसे राज्यपाल रहे हैं, जो राज्य सरकारों के साथ टकराव के रास्ते पर चले हैं, पर अब हालात दिनोंदिन बदतर होते जा रहे हैं और आर एन रवि तो राज्य सरकार के साथ अपने व्यवहार में असाधारण रूप से प्रतिकूल दिख रहे हैं। 
पश्चिम बंगाल और केरल के मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यपालों के साथ अलग-अलग तरीके से व्यवहार किया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आक्रामक रुख अपनाती रही हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था कि राज्यपाल अब राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति नहीं रहेंगे। केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने भी राजनीतिक तौर पर राज्यपाल पर पलटवार किया था। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने घोषणा की थी कि उन्होंने एक मंत्री के खिलाफ अपनी सहमति वापस ले ली है, लेकिन राज्य सरकार ने जब उस मंत्री के पक्ष में डटे रहने का फैसला किया, तो राज्यपाल को पीछे हटना पड़ा। 
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने शुरू में राज्यपाल के साथ अधिक सावधानी से व्यवहार करने की कोशिश की थी। उन्होंने शालीनता बनाए रखी और राज्यपाल के खिलाफ किसी भी तल्ख टिप्पणी से परहेज किया, पर धीरे-धीरे स्थितियां बदल गईं। राज्यपाल अपनी टीका-टिप्पणियों के साथ आगे बढ़ते चले गए। विधानसभा में भी उन्होंने राज्य सरकार की ओर से बोलने के बजाय अपनी ओर से कई बातें कहीं, जिसे सरकार ने विधानसभा की कार्यवाही से हटवा दिया। हालात ऐसे बिगड़े कि राज्य भाजपा के प्रमुख के अन्नामलाई भी नाराज हो गए। उन्होंने भी खुले तौर पर अपनी हताशा व्यक्त करते हुए कहा कि ‘एक राज्यपाल को राजनीतिक बातें नहीं बोलनी चाहिए, इससे गलत मिसाल कायम होगी।’ हालांकि, यहां भी पक्ष-विपक्ष में गुट बन गए। तेलंगाना के गवर्नर तमिलिसाई सुंदरराजन ने अंतत: आर एन रवि का बचाव किया। सुंदरराजन तमिलनाडु में सक्रिय राजनीति में लौटने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपालों द्वारा राजनीति पर बात करने में कुछ भी गलत नहीं है। 
इतना ही नहीं, अनेक मुद्दों पर तमिलनाडु के राज्यपाल के रुख ने भाजपा से अब अलग हो चुकी साझेदार अन्नाद्रमुक को भी परेशान किया है। वैसे तो राज्यपाल की कार्रवाइयों का उद्देश्य स्टालिन सरकार को बचाव की मुद्र्रा में लाना था, पर इससे अन्नाद्रमुक को मदद नहीं मिली। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ द्रमुक को अन्नाद्रमुक पर हमला करने के लिए राज्यपाल एक सुविधाजनक हथियार लगे। द्रमुक ने अन्नाद्रमुक को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज्य विधानसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जब 10 विधेयकों को पुनर्विचार के लिए रखा गया, तब बहिष्कार करने से अन्नाद्रमुक बेनकाब हो गई है। अब अन्नाद्रमुक इस सफाई में लगी है कि उसने भाजपा का समर्थन नहीं किया है। वास्तव में, मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस तथ्य को भुनाने की हर मुमकिन कोशिश की है कि राज्यपाल उनके शासन के विरोधी हैं। एक बिंदु पर रवि का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध तक किया कि राज्यपाल को 2024 के संसदीय चुनावों तक पद पर बने रहने दिया जाए, क्योंकि द्रविड़वाद के खिलाफ उनके बयान वास्तव में द्रमुक के चुनाव अभियान को और अधिक बल दे रहे हैं।
जब विधेयक पेश किए गए, तब राज्यपाल के सामने चार विकल्प थे। एक, वह उन्हें मंजूरी दे सकते थे। दो, वह इसे राष्ट्रपति के पास भेज सकते थे। तीन, वह इसे विधानसभा को लौटा सकते थे और चौथा, अपनी मंजूरी रोक सकते थे। वैसे, मंजूरी रोकना राज्यपाल के सांविधानिक कर्तव्यों के अंतर्गत नहीं आता है और विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे राज्यपाल के खिलाफ कानूनी विकल्प खुल जाएगा। 
पंजाब के मामले में भी अदालत को राज्यपाल को चेतावनी देनी पड़ी कि वह आग से खेल रहे हैं। अदालत ने राज्यपाल को यह भी याद दिलाई कि वह निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं। राज्यपाल से यही उम्मीद की जाती है कि वह कैबिनेट की सहायता और सलाह से ही काम करेंगे। ताजा आलोचना एक संकेत है कि राज्यपाल का कार्यालय, जो केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने और वर्षों से संविधान की रक्षा करने के लिए स्थापित किया गया है, वायसराय की तरह व्यवहार करने लगा है।
दिलचस्प है कि राज्यपाल की भूमिका छठी कक्षा के नागरिक शास्त्र पाठ्यक्रम में ही परिभाषित की गई है, पर अनेक विद्वान राज्यपाल भी इस भूमिका का पालन करने में नाकाम रहते हैं। राज्यपाल किसी पार्टी के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगते हैं। आगे भी हालात बदलने की उम्मीद नहीं है, लेकिन एक आशा है कि सर्वोच्च न्यायालय के ठोस व जरूरी निर्देश से फैसला लेने के उनके तरीके पर लाभकारी प्रभाव पड़ेगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)