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20 नवंबर, 2020|11:46|IST

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यह सजा भी जालसाजी का हिस्सा

प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-उद-दावा प्रमुख और साल 2008 के मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद को आतंकी फंडिंग से जुडे़ दो मामलों में 10 साल की सजा सुनाई गई है। कहा जा रहा है कि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) व अमेरिका के संयुक्त दबाव का यह नतीजा है। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि हाफिज सईद के बहाने पाकिस्तान विश्व में अपनी छवि चमकाने की कोशिश कर रहा है। मगर क्या यह पूरी सच्चाई है? क्या वाकई पाकिस्तान की रीति-नीति इस कदर बदल गई है कि वह अपनी संतति पर चोट करने को तैयार है?
मुझे तो ऐसा नहीं लगता। पाकिस्तान निगाहें कहीं और रखता है, और निशाना कहीं और साधता है। 1947 से वह इसी रास्ते पर चल रहा है। वह कुछ जुमले उछाल देता है, और पूरी दुनिया उसके शब्दजाल में फंस जाती है। तमाम कूटनीतिज्ञ इसी सोच में डूबते-उतराते रहते हैं कि उसका इशारा किस तरफ था या उसका मतलब क्या था, और इस चक्कर में वे मुख्य मुद्दे से भटक जाते हैं। इससे दुनिया को झांसा देने का पाकिस्तान का मकसद पूरा हो जाता है। हाफिज सईद की सजा भी उसकी इसी जालसाजी का हिस्सा है। इसमें यह तो दावा किया जा रहा है कि इस आतंकी सरगना को कैद के साथ आर्थिक जुर्माना सुनाया गया है और उसकी संपत्ति भी जब्त की जाएगी, मगर इस बात का खुलासा नहीं हुआ है कि यह सजा किन मामलों में हुई है और उसकी कितनी संपत्ति कुर्क की जाएगी? बीते फरवरी महीने में भी तो उसे ऐसे ही मामलों में 11 साल की सजा मिली थी। 
ज्यादा दूर नहीं, पिछले चार-पांच वर्षों से ही यदि पाकिस्तान के हालात पर गौर करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हाफिज सईद को पाकिस्तानी ‘डीप स्टेट’ (जम्हूरी हुकूमत पर पकड़ रखने वाला फौजी व खुफिया अधिकारियों का गुट) चुका हुआ मानने लगा था। अपने ऊपर मंडराते खतरे को भांपकर फौज को खुश करने के लिए ही उसने तत्कालीन वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ की आलोचना शुरू कर दी थी। हमें तभी समझ लेना चाहिए था कि उसकी उपयोगिता अब खत्म हो गई है। मगर न हम तब असलियत समझ सके, और न आज सच्चाई समझना चाहते हैं। इसीलिए हाफिज सईद की सजा पाकिस्तानी न्यायपालिका की जीत कतई नहीं है।
दिक्कत यह है कि पाकिस्तान बार-बार चक्रव्यूह बनाता है और हम उसमें फंसकर मुख्य मसले से भटक जाते हैं। अभी भी हमारे लिए बड़ी समस्या जमात-उद-दावा नहीं, वहां की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) होनी चाहिए। हाफिज सईद तो सिर्फ एक मोहरा है, जो अपने भाषणों से नौजवानों को भारत के खिलाफ भड़काता है और दहशतगर्दी फैलाने के लिए उन्हें यहां भेज देता है। उसकी असली डोर तो आईएसआई के हाथों में है, जिसका तत्कालीन प्रमुख अहमद शुजा पाशा रावलपिंडी में बैठकर नवंबर, 2008 के मुंबई हमले को अमलीजामा पहना रहा था। जब उसे सजा मिलेगी, तभी असली इंसाफ हो सकेगा। लिहाजा, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, जमात-उद-दावा जैसे संगठनों को घेरने के बजाय हमें इनको गढ़ने वाली आईएसआई पर हमलावर होना चाहिए। उसको बेनकाब करने की रणनीति हमें ज्यादा फायदा पहुंचाएगी।
अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार इसे लेकर अब थोड़ी-बहुत संजीदा दिख रही है। मुझे याद है कि लाल किले के प्राचीर से हमारे एक प्रधानमंत्री ने कभी कहा था कि दहशतगर्दी में पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान शामिल नहीं है, बल्कि वहां के ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’ (हुकूमत से अलग काम करने वाले मजहबी, गैर-सियासी गुट आदि) की ये करतूतें हैं। मगर आज हम बखूबी समझते हैं कि वहां के ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’ आखिरकार किससे नियंत्रित होते हैं, और किनके कहने पर वे दुनिया भर में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। उनको बेपरदा करने का काम हमारी सेना और खुफिया व सुरक्षा एजेंसियां कर सकती हैं। हमें उनका सहयोग करना चाहिए। 
इसमें सोशल मीडिया भी हमारे काम आ सकता है। हम इसके माध्यम से पाकिस्तानी अवाम को जागरूक भी बना सकते हैं। जैसे, बीते कुछ महीनों में खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत में एक नारा खूब गूंज रहा है- यह जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है। इसका मतलब है कि वहां के लोग अब यह समझने लगे हैं कि आतंकवादी नीतियों को पालने-पोसने का नुकसान खुद उनके मुल्क को भी हो रहा है। वहां के लोगों की इस सोच को हम और व्यापक बना सकते हैं। उन्हें यह एहसास करा सकते हैं कि उन्हें तमाम वैश्विक प्रतिबंधों के कारण जो माली नुकसान हुआ है, उसकी मुख्य वजह उनके नीति-नियंताओं द्वारा दहशतगर्दी को पनाह देना है। संचार के हरसंभव साधनों से वहां के लोगों को हमें इस सच का बराबर एहसास कराते रहना चाहिए। यह करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोई बाहरी ताकत पाकिस्तान में मौजूद आतंक की जड़ों को नहीं उखाड़ सकती। जब तक वहां के लोग खुद आगे नहीं आएंगे, पाकिस्तानी ‘डीप-स्टेट’ अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा।
यह सुखद है कि पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियां अब एकजुट होकर फौज के खिलाफ मुखर हो रही हैं। अगर उनका आंदोलन वाकई गति पकड़ता है, तो उसका अवाम पर व्यापक असर होगा। यह न सिर्फ पाकिस्तान की जम्हूरियत के लिए, बल्कि भारत और तमाम अमन-पसंद मुल्कों के लिए राहत की बात होगी। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कभी कहा था कि दुनिया में घटने वाली आतंकी घटनाओं में से 70 फीसदी के तार पाकिस्तान से ही जुड़ते हैं। यह बात आज भी उतनी ही सच है। इसका एहसास पाकिस्तानियों को कराया जाना चाहिए। अगर हम पाकिस्तानी अवाम में इसे लेकर शर्म और फिक्र पैदा कर सके, तो यकीनन आतंकवाद पर हम एक कड़ी चोट करेंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 21 november 2020