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3 दिसंबर, 2020|9:47|IST

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पाक में पहली बार निशाने पर सेना

क्या इमरान खान की उल्टी गिनती शुरू हो गई है? जो विश्लेषक पाकिस्तानी समाज और राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, उनमें से कुछ कह सकते हैं कि अभी सटीक अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी, पर ज्यादातर इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में देंगे। घटनाएं उसी तरह घट रही हैं, जैसे साठ के दशक से अलग-अलग निर्वाचित सरकारों के अपदस्थ होने के पहले घटती रही हैं। जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ या बेनजीर भुट्टो की सरकारों को बर्खास्त करने के पहले विरोधी दलों के गठबंधन बने, लोग सड़कों पर निकले, सेना और न्यायपालिका ने सरकार को अपने हथकंडों से अपंग बनाया और फिर उसे बर्खास्त करा दिया गया। इस बार भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि पहले फौज के प्रोत्साहन से गठबंधन बनते थे और उसकी मर्जी से ही लोग सड़कों पर निकलते थे, मगर इस बार गठबंधन उसके बावजूद बना है। पिछले दिनों पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) के नाम से बना गठबंधन वैसे तो एक-दूसरे की मुखालिफ सियासी पार्टियों का जोड़ है, पर सेना के प्रति गुस्सा उन्हें एक किए हुए है।
लगभग दो साल पहले जिन परिस्थितियों में इमरान देश के प्रधानमंत्री बने, उसे समझने के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टो जरदारी द्वारा नेशनल असेंबली के पहले ही सत्र में इस्तेमाल किया जाने वाला एक जुमला काफी होगा। नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान को बधाई देते हुए बिलावल ने उन्हें ‘सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर’ कहा। यह जुमला इमरान के साथ ऐसा चिपका कि आज तक लोग यह मानने कोे तैयार नही हैं कि वह जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। जनता के बडे़ तबके की धारणा है कि उन्हें पाक सेना ने चुना है।
सरकार मुखालिफ पिछले गठबंधनों की ही तरह पीडीएम ने भी मुख्य कार्यक्रम जनता को सड़क पर उतारने का बनाया। चंद माह पहले पीडीएम के अध्यक्ष और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम(एफ) के नेता मौलाना फजलुर रहमान सरकार के खिलाफ देश भर में रैलियां निकाल चुके थे और किसी ईमानदार गठबंधन के अभाव में असफल हो चुके थे। इस बार भी उम्मीद यही थी कि ऊपर से एकता की बात करने वाली पार्टियां अंदरखाने फौज से दोस्ती के मौके तलाश रही होंगी। आखिर शरीफ और जरदारी परिवार के कई सदस्य जेल मे हैं और पाकिस्तानी समाज का यथार्थ समझने वाले जानते हैं कि फौज की हरी झंडी के बिना उनकी मुक्ति संभव नहीं है। पीडीएम की पहली रैली नवाज के गढ़ पंजाब के गुजरांवाला मे 16 अक्तूबर और दूसरी जरदारी के गढ़ कराची में 18 अक्तूबर को रखी गईं।
गुजरांवाला की रैली में लंदन से प्रसारित नवाज शरीफ के भाषण ने उस धारणा को ध्वस्त कर दिया, जिसके अनुसार कई चैनलों का मानना था कि फौज और आईएसआई ने नवाज के साथ सुलह की एक खिड़की खुली रख छोड़ी है। एक पाकिस्तानी चैनल के मुताबिक, सेना के प्रतिनिधि, लाहौर कैंटोनमेंट में स्थित एक मस्जिद के इमाम और नवाज के विश्वस्त पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी के बीच बातचीत काफी आगे तक बढ़ चुकी है और फौज ने इमरान खान को हटाने का मन बना लिया है। कुछ महीने पहले कैदी नवाज को इलाज के नाम पर लंदन जाने की इजाजत इसी सुलह वार्ता का नतीजा बताया जा रहा था। मगर 16 अक्तूूबर को अपने भाषण में सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा और आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज के नाम लेकर नवाज शरीफ ने जिस तरह ललकारते हुए कहा कि उनकी लड़ाई इमरान खान से नहीं, बल्कि उन्हें सेलेक्ट करने वालों से है, उससे कुछ देर के लिए मंच पर सन्नाटा छा गया। अब तक कहा जाता रहा कि इमरान खान सेलेक्टेड प्राइम मिनिस्टर हैं, किंतु सेलेक्टर का नाम लेने का हौसला नवाज शरीफ ने भी पहली बार दिखाया। जनता की नब्ज पहचानने वाले राजनेता की तरह नवाज ने लोगों से पूछा कि उनकी सरकार को किसने हटाया और सेलेक्टेड पीएम को किसने चुना, तो भीड़ की तरफ से पहले कुछ सहमी आवाज में उत्तर आया- फौज; और जब उन्होंने ललकारते हुए सवाल दागने शुरू किए, तो श्रोताओं ने भी जोश में हाथ उठा-उठाकर जनरल साहेबान के नाम लेने शुरू कर दिए।
गुजरांवाला रैली की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि 18 अक्तूबर को कराची की रैली का दिन आ गया। सिंध में पंजाब से उलट पीडीएम के एक घटक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का शासन है और अंदरूनी सिंध में उसका असर जबर्दस्त है, इसलिए उम्मीद के मुताबिक भीड़ भी खूब आई और उसमें जोश भी खूब दिखा, पर मजेदार बात यह थी कि इस बार जलसा लूटा मरियम नवाज ने। कुछ अज्ञात कारणों से लंदन में बैठे नवाज शरीफ का भाषण प्रसारित नहीं हो सका, पर मरियम ने गुजरांवाला की लाइन को आगे बढ़ाते हुए फौज पर हमला बोला। फर्क सिर्फ इतना था कि उन्होंने दोनों जनरलों के नाम नहीं लिए। इसकी जरूरत भी नहीं रह गई थी। सेलेक्टर कहने से ही जनता मतलब समझ जाती है। मरियम ने चालाकी से कोर कमांडरों को सेना के अधीनस्थ अफसरों से अलग कर यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी लड़ाई सेना से नहीं, बल्कि उनके पिता को हटाने का फैसला करने वालों से है। सभी जानते हैं, पाकिस्तान में बडे़ नीतिगत फैसले मंत्रिमंडल नहीं, कोर कमांडरों की समिति करती है। 
मरियम से भी ज्यादा बेबाकी दिखाई मौलाना फजलुर रहमान ने। उनका अब तक का सियासी सफर खुफिया एजेंसियों की छत्रछाया में तय हुआ । मगर उन्होंने भी फौज पर हमला करने में गुरेज नहीं किया। उनके भाषण का यह अंश मीडिया में सर्वाधिक उद्धृत हो रहा है कि अगर फौज नहीं चाहती कि चौराहों पर उसका नाम उछले, तो उसे राजनीति में भाग लेने से बचना चाहिए।
इन दोनों रैलियों में जो कुछ हुआ, वह पाकिस्तान के इतिहास में अभूतपूर्व था। कुछ वर्ष पहले जब एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन ने सेना के खिलाफ बोलने की जुर्रत की थी, तब सेना ने उनके साथ क्या सुलूक किया था, किसी से छिपा नहीं है। फिर नवाज शरीफ जैसे मंजे हुए राजनीतिज्ञ ने कैसे ऐसा दुस्साहस किया? कयास लगाए जा रहे हैं। एक चैनल इसके पीछे चीन का इशारा देख रहा है, जो सीपीसी की धीमी प्रगति से असंतुष्ट है, तो दूसरे हल्के जनता में इमरान के खिलाफ बढ़ते असंतोष को वजह मान रहे हैं। कुछ भी हो, निर्णायक लड़ाई शुरू हो गई है। सेना ने गुजरांवाला के दूसरे दिन मरियम के पति कैप्टन सफदर को गिरफ्तार करा दिया, पर क्या पीडीएम के दूसरे नेताओं के खिलाफ भी दमनात्मक कार्रवाई हो सकेगी? शायद नहीं, क्योंकि तब आशंका है कि ‘गो इमरान गो’ नारा ‘गो बाजवा गो’ में बदल सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 20 october 2020