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19 नवंबर, 2020|11:24|IST

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सृष्टि के प्रथम फल सूर्य को अर्पित 

छठ कोई संस्थागत धार्मिक पर्व या त्योहार नहीं, बल्कि एक व्रत है। यह आदिम मनुष्य की एक उपासना पद्धति है। मेरी दादी भी यह व्रत करती थीं। बचपन में गया के सूर्य कुंड में मैंने उन्हें छठ व्रत करते देखा है। उन दिनों जांते में खुद अपने हाथों से बड़ी साफ-सफाई और पवित्रता से गेहूं पीसकर घी में दानेदार ठेकुआ बनाया जाता था, वैसा स्वादिष्ट ठेकुआ फिर कभी नहीं बनता था। नए चावल और गन्ने के रस से खीर बनती थी। जब पटना आए, तो मां पटना के गंगा घाट पर छठ व्रत करती थीं। आज भी शाम और सुबह इस व्रत को देखने गंगा के घाट पर जाता हूं। पटना यूं तो उतना साफ शहर नहीं है, लेकिन छठ व्रत के दौरान तीन-चार दिनों तक यह बहुत साफ-सुथरा और स्वच्छ हो जाता है।
छठ के संदर्भ में मुझे इतिहासकार डी डी कौशांबी का एक कथन बार-बार याद आता है कि भारत में प्राचीन परंपराएं आज भी सुरक्षित हैं। सिलौट, लोढ़ा, जांता आदि आदिम उपकरणों का इस्तेमाल आज भी ग्रामीण भारत की रसोई में किया जाता है। छठ व्रत के दौरान आज भी इन आदिम उपकरणों का इस्तेमाल होता है। इसी तरह, इस व्रत में कंद-मूल, सुथनी, शकरकंद, पानी फल, सिंघाड़ा, घाघरा नींबू, नारियल, चावल, केला और अन्य देसज फल-फूल सूर्य को इस भाव से अर्पित किया जाता है कि जो कंद-मूल, फल-फूल अन्न आदि इस पृथ्वी को आपने दिया, वह सब हम आपको अर्पित करते हैं। इस व्रत का एक महत्व यह भी है कि इसमें ऐसे-ऐसे देसज कृषि उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है, जो अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं। 
सूर्य पृथ्वी पर सृष्टि के अस्तित्व और विकास का स्रोत है। सूर्य पृथ्वी पर फल-फूल रहे समस्त जीवन का स्रोत है। सारी ऊर्जा का स्रोत है। आदिम मनुष्य जब पृथ्वी पर प्रकट हुआ, तो उसका सारा जीवन सूर्य से जुड़ा हुआ था। वह दिन भर कंद-मूल इकट्ठा करता, शिकार करता और शाम को सूर्यास्त के बाद गुफा में छिप जाता था, क्योंकि वह अंधेरे से डरता था। हम आज भी अंधेरे से डरते हैं। कल्पना कीजिए, कल की सुबह यदि सूर्य का उदय न हो, तो कैसी स्थिति होगी। शायद इसीलिए आदिम काल से मनुष्य में सूर्य के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव रहा है। 
हिंदू कहें या सनातन धर्म को मानने वाले लोग आदिम काल से ही किसी मनुष्य की पूजा नहीं करते हैं। प्राचीन यूनानियों की तरह वे समस्त सृष्टि की पूजा करते रहे हैं। यहां तक कि सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, जल, पेड़, अग्नि, वायु जैसे जीवनदायी प्राकृतिक उपादानों के प्रति उनमें श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का भाव था। ऋग्वेद  के सूक्तों में भी सूर्य पूजन, उषा पूजन, अग्नि पूजन और प्रकृति पूजन का उल्लेख है। लेकिन ऋग्वेद  से भी पहले, बल्कि सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य में सूर्य के प्रति कृतज्ञता का भाव रहा होगा। छठ व्रत में अघ्र्य दान इसी कृतज्ञता अर्पण का एक आध्यात्मिक तरीका है।
सूर्य की पूजा और उपासना दुनिया की अनेक प्राचीन संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न रूपों में रही है। प्राचीन चीनी संस्कृति में भी सूर्य पूजा की परंपरा रही है। भारत में सूर्य पूजा की परंपरा आदिम काल  से चली आ रही है, लेकिन यहां सूर्य मंदिर बहुत कम हैं। कोणार्क और देश में कुछ गिने-चुने सूर्य मंदिर हैं। इतिहासकारों का मानना है कि शक सूर्यवंशी थे और सूर्य को देवता मानकर उनकी पूजा करते थे। उनके आगमन के बाद भारत में सूर्य पूजन की परंपरा ज्यादा विकसित हुई। मगध क्षेत्र के लोगों पर सूर्य पूजन की आदिम परंपरा का ज्यादा प्रभाव दिखाई देता है। इसीलिए बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह व्रत ज्यादा लोकप्रिय है।   
सूर्य पितृ शक्ति का प्रतीक है। बाद में इसमें मातृ शक्ति का जुड़ाव होता है। छठी मैया का प्रसंग इससे जुड़ा 
हुआ है। कई कथाएं हैं। कार्तिकेय शिव के पुत्र हैं। इनका जन्म किसी स्त्री से नहीं हुआ। जन्म के बाद इनके पालन-पोषण के लिए छह कृतिकाओं को नियुक्त किया गया। ये सभी अप्सराएं थीं। इन्हीं छह कृतिकाओं ने अपना पुत्र मानकर कार्तिकेय को दुग्धपान कराया, जिन्हें छठी मैया कहा जाता है। 
छठ व्रत की एक खासियत यह भी है कि इसमें किसी संस्थागत देवता की पूजा या आराधना नहीं होती और न ही इसमें किसी मंदिर, पंडित या पुजारी की कोई भूमिका होती है। आदिम उपासना पद्धति के अनुसार, इस व्रत के व्रती तीन दिनों तक अन्न और जल का त्याग कर अपने शरीर को कष्ट देते हैं। स्त्री और पुरुष, दोनों यह व्रत करते हैं। चारपाई छोड़कर जमीन पर सोते हैं। वाल्मीकि रामायण में सीता ने राम से कहा था, न सुखात लभते  अर्थात सुख-सुविधाओं से जीवन जीकर आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। कलाकार साधना करता है, तपस्या करता है, तब कहीं जाकर उसकी रचना आकार लेती है। 
लेकिन इस व्रत से जुड़ी सादगी, सरलता, समर्पण और कृतज्ञता के भाव का आज धीरे-धीरे लोप हो रहा है। बांस से निर्मित सूप, डाले, मौनी की जगह कुछ धनवान लोग सोने, चांदी, पीतल आदि महंगे धातुओं के सूप से अर्घ्यदान करने लगे हैं। छठ व्रत में इस तरह की आर्थिक विषमता का दिखाई देना चिंताजनक है। अमीरी के दिखावे की यह प्रवृत्ति इस व्रत के परंपरागत आदिम स्वरूप के विरुद्ध है। यह दरअसल पूंजीवाद का दुष्प्रभाव है। पूंजीवाद में कुछ भी पवित्र नहीं रह जाता है। अब तो वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता अर्पण के व्रत को भी उत्सव और समारोह में बदलने लगा है। 
आज आधुनिक काल में भी पृथ्वी और सूर्य के संबंध व इसके तापमान में घटत-बढ़त को लेकर वैज्ञानिक चिंतित रहते हैं। सूर्य हमेशा से खगोल वैज्ञानिकों ही नहीं, बल्कि कवि-कलाकारों के लिए भी एक रहस्य का विषय रहा है। जैसा कि आइंस्टीन ने कहा है कि रहस्य ही सौंदर्य है। उगते और डूबते हुए सूर्य की पूरी छटा काफी काव्यात्मक लगती है। इसी काव्यात्मकता को आधार बनाकर कवियों ने सूर्योदय और सूर्यास्त पर कविताएं लिखी हैं। छठ व्रत पर मेरी भी एक कविता है एक रात घाट पर। उसकी कुछ पंक्तियां हैं-   
कितना अच्छा है रात-भर जगकर
सूर्य को उगते हुए देखना
देखना अंधकार की खुलती गिरह।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 20 november 2020