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20 फरवरी, 2021|3:00|IST

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बिगड़े बोल की जड़ें कहां हैं

यह हताशा की भाषा का दौर है। हमारा सामना ऐसी-ऐसी बयानबाजी से होने लगा है, जिसकी कल्पना भी नहीं थी। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का बयान हो या फिर महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष की चेतावनी। हमारे नेता ऐसे-ऐसे बयान देने लगे हैं, जिनकी विदेश में भी आधिकारिक निंदा हो रही है। महाराष्ट्र से जो बिगडे़ बोल आए हैं, उसमें एक पार्टी की हताशा साफ-साफ दिख रही है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर चूंकि अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार का ट्वीट नहीं आया, इसलिए उनकी फिल्मों की शूटिंग व प्रदर्शन रोकने की धमकी दे दी गई। क्या आज की राजनीति को फिल्मी सितारों के कंधों की इतनी जरूरत है और जो कंधे नहीं देगा, वह निशाना बनेगा? आज राजनीति, समाज में या सोशल मीडिया पर जिस तरह की भाषा-बोली का प्रयोग हो रहा है, उससे बहुत चिंता होने लगी है। व्यक्ति कभी सत्ता या शक्ति के अहंकार में मर्यादाएं भूल जाता है और कभी विफलता से उपजी हताशा में। पहले समाज में आम प्रतिक्रिया भी बहुत सोच-समझकर होती थी। अखबारों में संपादक के नाम पत्र में गिनी-चुनी प्रतिक्रियाएं संपादित होकर छपती थीं। अब सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में क्रांति ही कर दी है। अब न जगह सीमित है, न शुद्धता-साफगोई जरूरी है। विषय ज्ञान के बिना भी टिप्पणी संभव है। नए किस्म की आजादी के साथ जो मंच बने हैं, उनका खूब दुरुपयोग भी हो रहा है। ऐसे दुरुपयोग से जो समाज बन रहा है, उसमें राजनेताओं के बिगड़े बोल रुलाने लगे हैं। किसको, कब, कहां और क्या बोलना है, इसका ध्यान हमारे कितने नेताओं को है? हालांकि, नेताओं के बोल या आचरण में अचानक बदलाव नहीं हुआ है। पिछले दशकों में इसके लिए धीरे-धीरे माहौल बना है। पहले बिगड़े बोल को नजरंदाज कर दिया जाता था, पार्टी या समाज के स्तर पर ही धिक्कारा जाता था, लेकिन अब वह काम बंद होता जा रहा है।
ऐसा क्यों हो रहा है, इसके बहुत सारे कारण हैं। बड़ा कारण यह है कि देश की राजनीति बदल गई है। आजादी के बाद से इस देश में काफी समय तक कांग्रेस सत्ता में रही, उसके प्रति लगाव स्वाभाविक था। देश में सत्ता परिवर्तन भी हुआ, लेकिन सत्ता से बाहर होने वाली पार्टियों के लिए भी जगह होती थी। भरोसा रहता था, आज बाहर हुए हैं, तो कल लौटेंगे।  1977 में इंदिरा गांधी गईं, तो 1980 में लौट आईं। इस सदी में भी कांग्रेस सत्ता में लौटी और भाजपा की भी 2014 में सत्ता में वापसी हुई। हमारा देश एक संयुक्त परिवार जैसा था, जहां मुखिया बदल जाते थे। नेताओं में खुद को एडजस्ट या समायोजित करने की प्रवृत्ति थी। सत्ता में परिवर्तन होता था, लेकिन राजनीतिक संस्कृति में नहीं। इधर के वर्षों में सत्ता जाने के बाद कुंठा ने जन्म लेना शुरू कर दिया है। भविष्य न दिखाई पड़े या अंधकार में दिखाई पड़े, तो बहुत समझदार या पढे़-लिखे व्यक्ति का भी आहत होना स्वाभाविक है। कवि मुक्तिबोध के शब्दों में कहें, तो आहत का भी एक अभिमान होता है, वह कटे नरमुंड की तरह होता है, जो रक्त की आखिरी बूंद तक नाचता रहता है। भारतीय राजनीति में अगर जनसंघ को छोड़ दें, तो बाकी सारी पार्टियां या तो कांग्रेस से निकली हैं या कांग्रेस से प्रभावित रही हैं। उनका चरित्र कमोबेश कांग्रेस जैसा ही रहा है। जनसंघ को खुले रूप से हिन्दुत्व की परवाह रही है, जबकि बाकी पार्टियों की राजनीति 25 प्रतिशत आबादी पर केंद्रित रही है। इसका असर यह हुआ कि 75 प्रतिशत लोग उपेक्षित महसूस करने लगे। धीरे-धीरे 25 प्रतिशत आबादी का भी मोहभंग हुआ। गरीब-शोषित लोग भी कांग्रेस से अलग हुए। बाद में क्षेत्रीय पार्टियों से भी उनका मोहभंग हुआ और वे भी समझ गए कि क्षेत्रीय पार्टियों के जरिए केंद्र में अधिकार नहीं मांगा जा सकता। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शाह बानो मामले के बाद जब मंदिर का ताला खुला, तभी विश्व हिंदू परिषद को बल मिला। सांप्रदायिक धु्रवीकरण तेज हुआ। 1992 में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग कांग्रेस से बहुत हद तक अलग हो गया। इससे भी क्षेत्रीय दलों को बल मिला। अगर गौर करें, तो भारत में 1952 से ही उदार समाजवाद और गरीबों के नाम पर राजनीति होती रही थी। नारे दिए जाते थे, लेकिन उनका क्रियान्वयन बाकी था।
पहली बार ऐसा हुआ कि एक दक्षिणपंथी पार्टी, जिसमें समाजवाद नारे के रूप में भी नहीं था, उसने चुपचाप कांग्रेस, वाम और समाजवादियों के नारे को अपना लिया। सारी पार्टियां गरीबों के उत्थान के लिए नक्शा बनाती थीं, लेकिन उस पर अमल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू हुआ। आर्किटेक्ट दूसरी पार्टियां हैं और बिल्डर नरेंद्र मोदी। मिसाल के लिए, इंदिरा गांधी ने गरीबों को लाभ देने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, लेकिन बडे़ पैमाने पर खाते अब जाकर खुले। देश का आम गरीब रसोई गैस लाने और घर में शौचालय बनाने के बारे में सोच भी नहीं पाता था। इसीलिए जमीनी बदलाव हुआ, वर्ष 2019 के चुनाव में अनुमानों से परे भाजपा फिर सत्ता में आ गई। लेकिन आज सत्ता में बैठे नेताओं को अहंकार से बचना चाहिए, वहीं विपक्ष को भी हताशा से निकलने के प्रयास करने चाहिए। यह हताशा ही है कि किसी की मौत के नारे भी लगे हैं। विरोध अपनी जगह है, लेकिन ऐसी दुर्भावना का प्रदर्शन शर्मनाक है। इस देश में क्या लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर की भी जांच की जाएगी? दक्षिणपंथी छुटभैयों को तो फिल्मों का विरोध करते हमने कई बार देखा है, पर एक जिम्मेदार पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष फिल्मी सितारों का समर्थन पाने के लिए उन्हें धमकाए, तो चिंता बढ़ती है।
कवि रघुवीर सहाय की पंक्ति है, ‘व्यवस्था की बुराइयों से समझौता किए बिना आप सत्ता की कुरसी पर नहीं बैठ सकते।’ लेकिन सवाल यह है कि अगर सत्ता और विपक्ष में बैठे दिग्गजों में  कमी दिखेगी, तो क्या होगा? राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए कि उनमें अच्छाइयां अपवाद हैं या बुराइयां। एक समय जनसंघ का नारा था, हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, घर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी। अगर आप इस राह चलते हैं, तो कमियां भी माफ हो जाती हैं। फिल्मकार बी आर इशारा ने कहा था, ‘देखिए रामचरितमानस  से ज्यादा कोई ग्रंथ पढ़ा नहीं गया, लेकिन यह ग्रंथ एक राम नहीं पैदा कर सका।’ यहां मानस को पढ़ने का फायदा यही है कि आप जो हैं, उससे थोड़े बेहतर हो जाएं। यह कोशिश हर पार्टी को अपने अच्छे नारों के अनुरूप करनी ही चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 20 february 2021