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30 मई, 2020|4:58|IST

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लॉकडाउन में फंसे हुए लोग

हरजिंदर वरिष्ठ पत्रकार

दहशत हालांकि बहुत बड़ी है, पर उम्मीदों ने साथ नहीं छोड़ा है। लगभग सभी यह मानते हैं कि अभी भले ही मुसीबत काफी बड़ी हो, लेकिन वैज्ञानिक जल्द ही कोविड-19 का इलाज भी खोज लेंगे और वैक्सीन भी। वैक्सीन बनाने की दिशा में तो खासी प्रगति हो भी गई है। लेकिन जब तक यह वैक्सीन आम लोगों को उपलब्ध नहीं हो जाती, हम नहीं जानते कि कोरोना वायरस अभी और कितना कहर ढाएगा। पिछली तकरीबन एक सदी में चिकित्सा विज्ञान ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वे उम्मीद तो बंधाती ही हैं कि यह दौर बहुत लंबा नहीं चलेगा। कम से कम वैसी स्थितियां तो नहीं ही आएंगी, जिसमें प्लेग और हैजे जैसी महामारियां हर कुछ साल के अंतराल पर लौट आती थीं। 
चिकित्सा विज्ञान की पिछली एक सदी की उपलब्धियां इस उम्मीद का सबसे बड़ा आधार हैं। इस दौरान ज्यादातर रोगों के इलाज खोजे जा चुके हैं। जहां रामबाण इलाज अभी थोड़ा दूर है, वहां भी मरीजों को तत्काल राहत देने और उनका जीवन-स्तर सुधारने की दिशा में खासी प्रगति हुई है। अब लगभग हर तरह के कैंसर का इलाज हो जाता है। दिल, लीवर और किडनी जैसे किसी भी महत्वपूर्ण अंग को पूरी तरह बदला जा सकता है। जीन थेरेपी की दिशा में भी वैज्ञानिकों ने खासा लंबा रास्ता तय कर लिया है, जो बहुत से लोगों को अनुवांशिक रोगों से मुक्ति दिला सकती है। चिकित्सा विज्ञान की इन उपलब्धियों ने अब तक दुनिया में लाखों लोगों की जिंदगी बचाई है, उनके दुखों को कम किया है और उन्हें लंबा जीवन दिया है। 
चिकित्सा विज्ञान की इनमें से बहुत सारी उपलब्धियां लोगों के इलाज का आश्वासन तो देती ही हैं, लेकिन अक्सर वे समाज को कई हिस्सों में बांट भी देती हैं। एक हिस्सा उन लोगों का है, जो जटिल रोगों और परेशानियों के मामले में अत्याधुनिक इलाज का खर्च वहन कर सकते हैं। उनकी आमदनी और जमापूंजी के लिए इलाज का खर्च कोई महत्व नहीं रखता। वे इसके लिए दुनिया के किसी कोने में जा सकते हैं, बाकी देश में तो फाइव स्टार सुविधाओं वाले अस्पताल मौजूद हैं ही। दूसरे वे लोग हैं, जिनके लिए या तो मेडिकल बीमा की सुविधा है या फिर मजबूरी आने पर वे जमीन-जायदाद बेचकर किसी तरह इलाज लायक धन जुटा ही लेते हैं। इसके बाद वह बड़ी आबादी है, जो किसी तरह जीने लायक सुविधाएं भले ही जुटा ले, लेकिन गंभीर रोगों के इलाज नहीं करा सकती। माना जाता है कि ऐसे लोगों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र, सरल भाषा में कहें, तो सरकारी अस्पताल हैं, जो ऐसी आबादी के लिए उसके गाढ़े समय में मदद का एक आश्वासन हो सकते हैं। लेकिन यही वह जगह है, जहां स्थितियां सबसे ज्यादा खराब हैं- एक अनार और लाखों या शायद करोड़ों बीमार। सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनें और बहुत जरूरी ऑपरेशन के लिए भी लंबी वेटिंग लिस्ट देश के तकरीबन हर हिस्से का सच है। और यह किसी से छिपा नहीं है कि इनमें से बहुत सारे लोग बिना पूरे इलाज के ही इस दुनिया को अलविदा कह देते हैं।
जब कोरोना वायरस ने देश में पहली दस्तक दी, तब ज्यादातर चिंताएं इसी तंत्र को लेकर थीं। ऐसी खबरों और विश्लेषणों का ढेर लग गया था, जिनमें बताया जा रहा था कि हमारे देश में प्रति हजार आबादी पर कितने डॉक्टर, कितनी नर्सें और सरकारी अस्पताल के कितने डॉक्टर हैं। इन सभी चिंताओं का आम स्वर यही था कि कोविड-19 जैसी महामारी अगर भारत में आती है, तो हमारा चिकित्सा तंत्र उसका मुकाबला करने में अक्षम साबित हो सकता है। इस बात को सरकार ने भी समझा और प्रधानमंत्री ने 21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इसके पीछे शायद सोच यह थी कि ऐसी नौबत ही न आने दी जाए। वैसे भी, अमेरिका और अपने स्वास्थ्य तंत्र पर गर्व करने वाले यूरोप के देशों का जो हाल हमने पिछले एक पखवाड़े में देखा है, उसके बाद संपूर्ण लॉकडाउन का फैसला ज्यादा बुद्धिमानी भरा लगता है। चीन ने जिस तरह से कोरोना वायरस के संक्रमण को नियंत्रित किया, उसका सबक भी यही था। 
लगातार पैर पसारती जा महामारी के बीच लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग रक्षात्मक चिकित्सा की तरह थे। रक्षात्मक चिकित्सा या प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट का किताबी ज्ञान यह कहता है कि यह सबसे आसान और कारगर तरीका है, जो किसी भी इलाज से कहीं ज्यादा सस्ता पड़ता है और कई बार तो इसकी लागत कुछ भी नहीं होती। बस इसके लिए दो चीजों की जरूरत होती है- लंबा धैर्य और थोड़ा सा अनुशासन। 
इस लिहाज से हम चाहें, तो लॉकडाउन को भी ऐसी चिकित्सा मान सकते हैं, जो भले अर्थव्यवस्था को बड़ा धक्का पहुंचा रही हो, लेकिन उसके लिए लोगों को अपनी जेब से कुछ नहीं खर्च करना पड़ेगा। लेकिन बात शायद इतनी सरल नहीं है। पिछले चंद दिनों के अनुभवों ने यही बताया है कि हमारे यहां एक बड़ा तबका ऐसा है, जो लॉकडाउन को भी वहन नहीं कर सकता। भले ही इस रक्षात्मक चिकित्सा में सबके साथ उसका भी भला हो, लेकिन यह चिकित्सा उसकी जेब पर तो भारी पड़ती ही है, साथ ही उसके जीने का आधार ही उससे दूर जाता दिखाई देता है।
जाहिर है, ऐसे में सरकारें ही उसकी सुध ले सकती थीं, जो कि बाद में उन्होंने ली भी। लेकिन उनकी यह पहल नौकरशाही के रास्ते जब तक जमीन पर पहुंची, देर हो चुकी थी। वैसे भी, दुनिया के किसी भी देश की नौकरशाही कोरोना वायरस की रफ्तार का मुकाबला कर ही कहां सकी? अपने देश में लॉकडाउन घोषित होने के बाद जहां देश के तमाम बड़े शहरों से लाखों लोग आश्रय और भोजन के लिए अपने-अपने गांव-घर की ओर निकले, तो बहुत सारे लोगों के लिए लॉकडाउन का अर्थ काम-धंधे का बंद होना, वर्क फ्रॉम होम, निठल्ले बैठकर रामायण-महाभारत वगैरह देखना या दिन भर बोर होना भी था।
कहते हैं कि बीमारियां किसी तरह का भेदभाव नहीं करतीं, लेकिन चिकित्सा की उपलब्धता तो करती ही है, भले ही वह लॉकडाउन जैसी रक्षात्मक चिकित्सा ही क्यों न हो। आप चाहें, तो इसका दोष अर्थव्यवस्था और नीतियों को भी दे सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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