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18 अक्तूबर, 2020|9:10|IST

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तरक्की की राह चलने का नुस्खा

थ्री इडियट्स  फिल्म का एक डायलॉग है, ‘दोस्त फेल हो जाए, तो दुख होता है, लेकिन दोस्त फस्र्ट आ जाए, तो और दुख होता है।’ इसी डायलॉग में दोस्त की जगह पड़ोसी आ जाए, तो? करेला और नीम चढ़ा। पड़ोसी की तरक्की तो अपने आप में ही तकलीफ का कारण हो जाती है और कहीं वह पड़ोसी ऐसा हो, जिसे आप अपने सामने गिनते तक नहीं थे, तब तो कहने ही क्या? 
कोई परिवार, कोई मोहल्ला नहीं, करीब-करीब पूरा देश इस वक्त ऐसी ही दुविधा में फंसा हुआ है। वजह है आईएमएफ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भविष्यवाणी कि इस साल बांग्लादेश जीडीपी के मोर्चे पर भारत को पीछे छोड़ सकता है। हालांकि देश के रूप में बांग्लादेश की जीडीपी भारत के  मुकाबले दसवें हिस्से के आसपास ही है। लेकिन उसकी जीडीपी बढ़ने की रफ्तार तेज है और इसी का असर है कि आबादी से जीडीपी को भाग देकर आईएमएफ का गणित एक ऐसा नंबर निकाल लाया है, जो सबकी धड़कनें बढ़ा रहा है। जहां भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1,877 डॉलर रहेगी, वहीं बांग्लादेश के लिए यह आंकड़ा 1,888 डॉलर होगा। हालांकि बात सिर्फ ग्यारह डॉलर की है, यानी हजार रुपये की भी नहीं, फिर भी सवाल उठाने वालों को मौका तो मिल गया।
विपक्षी नेताओं ने भी तुरंत तीर चला दिए और चुटकुले बनाने वाले सोशल मीडिया पर चुटकियां लेने लगे कि अब तो बांग्लादेश ही एनआरसी लागू करेगा। याद रखिए, पिछले साल ही बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने बयान दिया था कि अब तो कुछ भारतीय आर्थिक कारणों से बांग्लादेश में घुस रहे हैं। मतलब साफ था कि रोजगार की तलाश में भारत से लोग बांग्लादेश जा रहे हैं। जाहिर है, वह जीडीपी की बढ़ती रफ्तार का गुरूर था। वैसे 1990 के दशक की शुरुआत में भी तीन साल ऐसे रहे थे, जब बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से ऊपर रही थी। यह 1991 के आर्थिक सुधारों के तुरंत बाद का वक्त था। भारत ने रुपये का अवमूल्यन किया था और दुनिया के लिए अपने बाजार खोलने शुरू किए थे। इसलिए डॉलर में जीडीपी नीचे दिखती थी। इसका फायदा भी हुआ, उसके बाद वर्ष 2016 तक कुछ ऊंच-नीच के साथ भारत की जीडीपी बढ़ने की रफ्तार तेज ही रही। जहां तीन प्रतिशत ग्रोथ हुआ करती थी, वहां यह आंकड़ा आठ प्रतिशत के आसपास घूमने लगा। इस बीच कई बार सरकारों और आर्थिक जानकारों ने 10 प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य सामने रखने की हिम्मत भी दिखाई। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2025 तक देश के लिए पांच ट्रिलियन डॉलर यानी पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रख दिया। 
अब कोरोना संकट के बाद तो इस लक्ष्य पर बात करने का ज्यादा अर्थ नहीं है, पर समस्या यह है कि कोरोना से पहले ही हालात बिगड़ने लगे थे। साल 2016 से भारत की जीडीपी थमने-सी लगी थी, जबकि बांग्लादेश की रफ्तार बरकरार रही। खासकर रेडिमेड कपड़ों के कारोबार में उसने दुनिया में अपना सिक्का जमा लिया है। चीन के बाद वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है और इस वक्त चीन के खिलाफ माहौल का फायदा उठाना भी उसके लिए काफी आसान है। हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं कि बांग्लादेश भारत के लिए कोई आर्थिक चुनौती खड़ी कर रहा है। आइएमएफ को उम्मीद है कि एक साल में ही भारत फिर प्रति व्यक्ति जीडीपी में बांग्लादेश से आगे हो जाएगा। 
अब इस किस्से का एक और पहलू है। भारत सरकार और तमाम आर्थिक जानकार एक साथ आंकड़े खंगालकर साबित करने में जुटे हैं कि दरअसल प्रति व्यक्ति जीडीपी में भी बांग्लादेश आगे नहीं निकला है, बल्कि वह आज भी काफी पीछे है। बस आईएमएफ सही पैमाने का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। आईएमएफ डॉलर के मौजूदा भाव से यह हिसाब जोड़ रहा है, जबकि उसे डॉलर के भाव को किसी एक तारीख पर स्थिर मानकर हिसाब लगाना चाहिए और परचेजिंग पावर पैरिटी भी देखनी चाहिए। यानी एक ही चीज या सेवा के लिए अलग-अलग जगह जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसके हिसाब से आकलन करना चाहिए। 
बहरहाल, जमीनी हकीकत यही है कि पिछले 10-15 वर्षों में बांग्लादेश ने तेजी से तरक्की की है और इससे वहां के लोगों की जिंदगी सुधर रही है। वहां के लोग अब औसतन भारत के मुकाबले ज्यादा समय तक जिंदा रहते हैं। वहां कम बच्चे अकाल मृत्यु के शिकार हो रहे हैं। वहां आबादी बढ़ने की रफ्तार में तेजी से गिरावट आई है। पढ़ना-लिखना सीख चुके लोगों की गिनती बढ़ी है। कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। यह हमारे लिए अच्छी बात है, अगर पड़ोस में खुशहाली होगी, तो अशांति की आशंका अपने आप कम होती जाएगी। अगर बांग्लादेश से रोजगार की तलाश में सीमा पार करके आने वाले अवैध प्रवासी हमारी बड़ी समस्या थे, तो वह समस्या क्या ऐसे में भी जारी रहेगी? इसके साथ ही एक नजर अन्य पड़ोसियों पर भी डाल लेनी चाहिए। पाकिस्तान को छोड़ भी दें, तो श्रीलंका और भूटान भी अपनी-अपनी तरक्की की इबारत चुपचाप लिख रहे हैं। श्रीलंका भी पर्यटन और टेक्सटाइल कारोबार में जगह बनाने में कामयाब हुआ है। 
ध्यान देने वाली बात है, दक्षिण एशिया नौजवान आबादी का क्षेत्र है। इस वक्त यह बात इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोरोना ने दुनिया के आर्थिक समीकरण उलट-पलट कर दिए हैं। फिर भी दुनिया के बाजार में अपनी जगह बना रहे उभरते हुए दक्षिण एशिया के देशों के लिए बड़ा मौका है। चीन के बाद सबसे ज्यादा मजबूती दक्षिण एशियाई देशों में ही दिखने वाली है। मुद्राकोष की रिपोर्ट बताती है कि अगले 30 साल में एशिया में सबसे ज्यादा नौजवान आबादी जहां होगी, वे देश हैं नेपाल, भूटान, भारत और बांग्लादेश, जबकि दक्षिण पूर्व एशिया यानी कोरिया, सिंगापुर, थाईलैंड, चीन, जापान, वियतनाम, मलयेशिया और इंडोनेशिया की आबादी में बुजुर्गों की गिनती काफी बढ़ रही होगी। साफ है, यहां भारत और उसके पड़ोसी समझदारी से काम लें, तो वे फायदे में रहेंगे। मुद्राकोष का कहना है कि अगर सामान्य गति से चले, तब भी महंगाई का आंकड़ा काटने के बाद भी करीब पांच प्रतिशत की रफ्तार से जीडीपी बढ़ेगी। सुधार तेज किए गए, तो यह साढ़े छह प्रतिशत की रफ्तार पकड़ सकती है, जिसका अर्थ यह भी होगा कि वर्ष 2040 तक भारत की प्रति व्यक्ति आमदनी अमेरिका के मुकाबले आधी तक हो सकती है।
तो नुस्खा सामने है। तय पूरे देश को करना है कि किस राह पर चलना है। इस रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट न सिर्फ पड़ोसी देशों के साथ, बल्कि देश के भीतर भी बढ़ता हुआ तनाव और मार-काट की इच्छा ही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 19 october 2020