DA Image
2 मार्च, 2021|1:47|IST

अगली स्टोरी

पुराने समीकरण में नया गठजोड़

S Sriniwasan

तमिलनाडु की राजनीति में ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी योजना भविष्य के लिए टाल दी है। काफी ऊहापोह के बाद अब वह फिर से सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के नेतृत्व को स्वीकारती हुई दिख रही है और मिलकर ही आगामी राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ेगी। इस समय भाजपा की सोच यही लग रही है कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के तमाम सहयोगी दलों को साथ लाकर अन्नाद्रमुक के हाथों को मजबूत करना चाहती है, ताकि सभी मिलकर द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन को हरा सकें। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में जयललिता के नेतृत्व के बावजूद अन्नाद्रमुक गठबंधन अपने प्रतिद्वंद्वी द्रमुक गठजोड़ से बमुश्किल एक फीसदी वोट अधिक पा सका था। इसलिए कोई भी आंतरिक कलह और वोट प्रतिशत में गिरावट गठबंधन को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा राज्य में अपना शासन चाहती है, ताकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सके। इसके अलावा, अन्नाद्रमुक की हमराह बनकर यदि इसने कुछ विधानसभा सीटें जीत लीं, तो बिहार मॉडल की तरह यहां भी वह मंत्रिमंडल साझा कर सकती है। यह रणनीति मुख्यमंत्री ई पलानीसामी के भी अनुकूल है, जो तमाम उठापटक के बावजूद पिछले चार वर्षों से अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक को एक रखने में सफल रहे हैं। राज्य में भाजपा बेशक कमजोर है और वह अन्नाद्रमुक की ताकत में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं कर सकेगी, पर करीबी मुकाबले में हरेक वोट ही कीमती होता है। भाजपा को गठबंधन से बाहर रखना समझदारी भरा कदम नहीं होगा, क्योंकि केंद्र में वह सत्ता में है, जिसका नुकसान मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी को हो सकता है। मुख्यमंत्री पलानीसामी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सकते हैं। संभावना है कि दोनों नेता गठबंधन पर अंतिम मुहर लगा सकते हैं। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी अन्नाद्रमुक के साथ पीएमके (डॉ रामदास), डीएमडीके (विजयकांत), टीएमसी (दिवंगत कांग्रेसी जी के मूपनार) जैसे एनडीए के अन्य घटक दलों के साथ भी गठबंधन पर चर्चा कर सकते हैं। हालांकि, पलानीसामी प्रधानमंत्री को चेन्नई के मरीना तट पर बने जे जयललिता मेमोरियल के उद्घाटन के लिए आमंत्रित करने आ रहे हैं, पर इस मौके का उपयोग सूबे की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा के लिए किया जा सकता है। 
भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति राज्य की राजनीति में अपनी जमीन मजबूत करने की है, ताकि अगले दशक में वह अपने पांव पर खड़ी हो सके। पिछले चार वर्षों से भाजपा राज्य में अपना आधार मजबूत करने के लिए प्रयास करती रही है, क्योंकि जब राज्य में एम करुणानिधि और जे जयललिता जैसे शक्तिशाली क्षत्रप थे, तब उसके लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जयललिता के भले ही अच्छे रिश्ते रहे, लेकिन उन्होंने 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया था। उनके निधन के बाद हतोत्साहित अन्नाद्रमुक ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठजोड़ किया। मगर इस गठबंधन को द्रमुक नेतृत्व वाले गठबंधन से करारी शिकस्त मिली और सिर्फ एक सीट उसके खाते में आ सकी। हालांकि, विधानसभा के उप-चुनावों में 11 सीटें जीतकर सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक राज्य में अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही, जबकि 13 सीटें जीतने के बाद भी द्रमुक उसकी कुरसी छीन नहीं पाई। 2019 के आम चुनाव के बाद से ही भाजपा और संघ परिवार तमिलनाडु में भगवा लहर के उभार के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए कई योजनाएं बनाई गईं, जिनमें से एक धार्मिक आयोजनों के दौरान अपने काडर को संगठित करना भी था। इन प्रयासों का मकसद राज्य में हिंदू वोट को एक करना था। हालांकि, ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य कई उच्च जाति के हिंदू भाजपा की तरफ झुकाव रखते थे, लेकिन पार्टी को उन्हें भुनाने का मौका नहीं मिल सका। ऐसा इसलिए, क्योंकि तमिलनाडु अत्यधिक धार्मिक राज्य तो है, लेकिन धर्म और चुनावी राजनीति का घालमेल तमिल लोग नहीं करते। भाजपा इसका तोड़ नहीं निकाल सकी है। भाजपा के पास राज्य में करिश्माई नेतृत्व का अभाव है, लेकिन जो थोड़ी-बहुत उम्मीद थी, वह भी सुपर स्टार रजनीकांत के एलान के बाद जमींदोज हो गई। पार्टी को भरोसा था कि रजनीकांत या तो भाजपा में शामिल हो जाएंगे या ऐसी पार्टी बनाएंगे, जो भाजपा के साथ होगी। आपस में मिलकर चुनावी बाजी मारने के सपने भी वह देख रही थी। पर स्वास्थ्य कारणों से राजनीति से दूर रहने की रजनीकांत की घोषणा ने यह योजना विफल कर दी। नतीजतन, द्रविड़ राजनीति के इतर सरकार देने का वादा करने वाली भाजपा गठबंधन का राग अलापने लगी। इस बाबत पहला संकेत तब मिला, जब राज्य में पार्टी के पर्यवेक्षक सी टी रवि ने पलानीसामी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में कुबूल कर लिया। यह उन स्वरों को शांत करने जैसा था, जिसमें पार्टी के कुछ स्थानीय पदाधिकारी पलानीसामी को अन्नाद्रमुक का मुख्यमंत्री चेहरा बता रहे थे, एनडीए का नहीं। उनका कहना था कि एनडीए के नेता का चयन चुनाव के बाद किया जाएगा। इस तरह के बयानों से पलानीसामी खेमा काफी खफा था। मुख्यमंत्री, जो उप-मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम द्वारा पैदा की गई राजनीतिक चुनौती से पार पाने में सफल रहे हैं, एन शशिकला की वापसी को लेकर भी खासे चिंतित हैं। शशिकला इस महीने के अंत में बेंगलुरु जेल से रिहा हो सकती हैं, जहां आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में वह सजा काट रही हैं। जाहिर है, भाजपा-अन्नाद्रमुक गठजोड़ होने के बाद चुनावी जंग द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच ही होगी। हालांकि, शुरुआत में द्रमुक को बढ़त मिलती दिखी थी, लेकिन पलानीसामी के जबर्दस्त प्रदर्शन से उसकी चमक फीकी पड़ने लगी है। कोविड संकट का बेहतर प्रबंधन करके भी मुख्यमंत्री लोगों का दिल जीतते हुए दिख रहे हैं, और नीट मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने वाले सरकारी स्कूलों के बच्चों को कॉलेजों में दाखिल में 7.5 फीसदी आरक्षण देने, एक बड़ी आबादी को 2,500 रुपये पोंगल उपहार देने जैसे लोक-लुभावन कदम भी उन्हें लोकप्रिय बना रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column 19 january 2021