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3 मार्च, 2021|12:59|IST

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गूगल की मनमानी पर लगाम 

गूगल का अहंकार स्तब्धकारी था और अब उसका समझौते के लिए तैयार होना एक बड़ी घटना है। जब ऑस्ट्रेलिया की मीडिया कंपनियों ने गूगल व अन्य बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों से कहा कि वह समाचार माध्यमों द्वारा तैयार किए जा रहे कंटेंट या सामग्री के लिए भुगतान करें, तब गूगल ने एक तरह से धमकी दे डाली। गूगल ने यह तक कह दिया कि वह ऑस्ट्रेलिया छोड़ जाएगा। ऑस्ट्रेलिया इस धमकी से कतई प्रभावित नहीं हुआ। उसने साफ इशारा कर दिया, गूगल को जाना हो, तो जाए, परवाह नहीं। ऑस्ट्रेलिया में सरकार और लोगों ने सर्च इंजन गूगल के विकल्प की खोज शुरू कर दी। लोगों ने तय कर लिया कि गूगल के बाद माइक्रोसॉफ्ट के सर्च इंजन ‘बिंज’ को अपना लिया जाएगा। अब दृढ़ता का परिचय देते हुए ऑस्ट्रेलिया एक नया कानून बनाने जा रहा है। करीब सप्ताह भर में ही लागू होने के लिए प्रस्तावित कानून यह सुनिश्चित करेगा कि फेसबुक और गूगल जैसी प्रौद्योगिकी दिग्गज कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर उपयोग की जाने वाली सामग्री के लिए समाचार संगठनों को भुगतान करेंगी।
वर्षों से गूगल और फेसबुक ने मीडिया संगठनों द्वारा एकत्रित-प्रस्तुत समाचारों से अरबों डॉलर कमाए हैं। इससे समाचार संगठनों या मीडिया संगठनों को नुकसान हुआ है। जो पाठक या उपभोक्ता पहले समाचार पत्र-पत्रिकाएं खरीदकर पढ़ते थे, वे अब इंटरनेट पर गूगल के जरिए समाचार पढ़ लेते हैं। अच्छे-अच्छे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की सामग्री भी गूगल पर मुफ्त में पढ़ने मिल जाती है। इससे गूगल, फेसबुक तो फायदे में हैं, लेकिन समाचार संगठनों या संस्थानों को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस वजह से मीडिया उद्योग अपनी कमाई में लगातार गिरावट से जूझ रहा है। बहरहाल, ऑस्ट्रेलिया की धमकी का असर यह हुआ है कि गूगल ने देश की तीन शीर्ष मीडिया कंपनियों को उनकी खबरों के लिए भुगतान करने का फैसला किया है। गूगल ने तीन साल के समझौते के तहत न्यूजकॉर्प (वॉल स्ट्रीट जर्नल के मालिक), नाइन एंटरटेनमेंट कंपनी (सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड के मालिक) और सेवन वेस्ट मीडिया (द संडे टाइम्स) को भुगतान का वादा कर लिया है। हालांकि, भुगतान के आकार का खुलासा अभी नहीं हुआ है, पर इस बदलाव का दुनिया भर के मीडिया क्षेत्र पर व्यापक सकारात्मक असर पड़ सकता है। गौर करने की बात है, गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियां स्वयं कोई कंटेंट या सामग्री नहीं तैयार करती हैं, लेकिन उपभोक्ता उनके प्लेटफॉर्म पर दूसरों द्वारा बनाई गई सामग्रियों का उपयोग कर सकते हैं। जब उपभोक्ता सूचना या समाचार के लिए इन साइटों पर जाते हैं, तो गूगल और फेसबुक अपने प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के जरिए खूब कमाई करती हैं। मीडिया कंपनियों में इस बात को लेकर जागरूकता बढ़ी है कि उनकी मेहनत का फायदा ये प्रौद्योगिकी कंपनियां मुफ्त ही ले रही हैं। आदर्श स्थिति यही है कि प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपना आर्थिक लाभ कंटेंट उत्पादकों के साथ साझा करना चाहिए। बीत गया वह जमाना, जब मीडिया संस्थानों को अपनी सामग्री को गूगल जैसे सर्च इंजन पर देखकर खुशी होती थी। अब मीडिया संस्थान अपने कंटेंट को लेकर बहुत सजग हैं और नहीं चाहते कि उनकी मेहनत या कंटेंट का लाभ कोई और उठाए। अब सर्च इंजन का कारोबार बहुत बढ़ गया है, इंटरनेट का उपयोग कई गुना बढ़ा है। यह बात भी छिपी नहीं है कि गूगल जैसी कंपनियां दूसरी कंपनियों की न केवल सामग्री प्रदर्शित कर रही हैं, बल्कि बेचकर पूरा लाभ भी उठा रही हैं। ऐसे में, ऑस्टे्रलिया में बन रहा कानून सही दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है।
अब गूगल ने समाचार सामग्री का भुगतान करने लिए एक अरब डॉलर का कोष बना लिया है, जो उसके बड़े लाभ की एक झलक दिखाता है। यह कंपनी ब्रिटेन और अर्जेंटीना जैसे देशों के कुछ मीडिया हाउस के साथ भी चुनिंदा सौदों को अंतिम रूप देने में लगी है। गूगल का कहना है, उसने दुनिया भर में 500 से अधिक प्रकाशनों के साथ समझौते किए हैं। हालांकि, यह पर्याप्त नहीं है। गूगल को यह चुनने और निर्णय लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि वह किसे भुगतान करे और किसे नहीं। उसे अपने प्लेटफॉर्म पर उपभोग की गई या देखी गई किसी भी खबर या सामग्री के लिए कंटेंट निर्माता को भुगतान करना चाहिए। दुनिया भर में हर देश को ऑस्ट्रेलिया की तरह ही कानून बनाने चाहिए, ताकि वास्तविक कंटेंट निर्माता को उसकी मेहनत का फल मिल सके। बिना कानून बनाए बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों को लाभ साझा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ध्यान रहे, ऑस्ट्रेलिया में गूगल सौदे के लिए भले सहमत हो गया हो, लेकिन फेसबुक ने अभी तक ऐसा नहीं किया है। फेसबुक किसी तरह के भुगतान के लिए तैयार नहीं है। गुरुवार से ऑस्ट्रेलिया में उसने न किसी को समाचार पोस्ट करने दे रहा है और न किसी समाचार संस्थान के न्यूज पेज को दिखा रहा है। यूरोपीय संघ भी इन प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपना व्यवहार सुधारने के लिए मजबूर करने में लगा है। यहां तक कि अमेरिका में राष्ट्रपति बाइडन की नई सरकार भी भीमकाय प्रौद्योगिकी कंपनियों के एकाधिकार को तोड़ना चाहती है। अपने एकाधिकार को मजबूत करने में लगी ये कंपनियां न केवल मीडिया क्षेत्र के विकास में बाधा बन रही हैं, बल्कि नई प्रौद्योगिकी कंपनियों को भी आगे बढ़ने से हर संभव तरीके से रोक रही हैं। 
भारत में भी मीडिया उद्योग को उसका हक मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए इसी तरह के प्रयास शुरू करने की जरूरत है। दिग्गज प्रौद्योगिकी कंपनियां भारतीय मीडिया कंपनियों को भुगतान से बचने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगी। ऐसा भी हो सकता है कि वे कुछ ही मीडिया हाउस को भुगतान के लिए तैयार हों। भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक समान कानून बने और सभी पर लागू हो। फेसबुक और गूगल के लिए चीन का बाजार बंद है। इसलिए भारत इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ा व सबसे तेजी से बढ़ने वाला खुला बाजार भी है। इन कंपनियों का भारत में फलने-फूलने के लिए स्वागत है, लेकिन मीडिया उद्योग की कीमत पर उन्हें बढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। भारत में कई भाषाओं में सामग्री का निर्माण होता है। यहां शब्द, स्वर, चित्र और चलचित्र के स्तर पर सामग्री की अथाह विविधता है, यहां एक-एक कंटेंट निर्माता को उसका वाजिब हक मिलना चाहिए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 19 february 2021