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सरकार में बदलाव का विरल प्रयोग

आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Fri, 17 Sep 2021 11:56 PM
सरकार में बदलाव का विरल प्रयोग

भारतीय राजनीति में ऐसे मुख्यमंत्रियों की फेहरिस्त छोटी नहीं है, जिनको कार्यकाल के बीच में ही अपना पद छोड़ना पड़ा। मगर गुजरात में जिस तरह से पूरी सरकार का कायाकल्प किया गया है, वैसा उदाहरण विरल ही है। वहां भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में नई सरकार ने सत्ता तो संभाल ली है, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि जब आसन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा को किसी अन्य दल से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिलने जा रही है, तब विजय रूपाणी और उनकी पूरी कैबिनेट को सत्ता से बाहर करने का भला क्या मतलब है?

संभवत: इसके कई कारण हैं। सबसे पहला, इस तरह का बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली है। जब किसी राज्य का नेतृत्व उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा होता, तब बिना वक्त गंवाए वह उसे बेदखल करने से परहेज नहीं करते। वह राज्यों में ऐसा नेता चाहते हैं, जिस पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का पूरा एतबार हो। फिर, गुजरात तो उनका गृह राज्य है। यहां की परिस्थितियों को भला वह कैसे नजरअंदाज कर सकते थे। पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने कोशिश भी की कि एकाधिक विधायकों को बचा लिया जाए, जिसके कारण भूपेंद्र पटेल की ताजपोशी में एक दिन की देरी भी हुई, लेकिन वह सफल नहीं हो सकीं। खबर तो यह भी है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के ज्यादातर वर्तमान विधायकों के टिकट कटने वाले हैं। यह कयास तब लगाए जा रहे हैं, जब हर विधानसभा चुनाव में भाजपा 30-40 फीसदी विधायकों की फिर से चुनावी दावेदारी खारिज करती रही है।
दूसरी वजह, विजय रूपाणी (पूर्व मुख्यमंत्री) के खिलाफ बढ़ती नाराजगी हो सकती है। लोगों की उनसे मूलत: दो शिकायतें थीं। एक, वह कोरोना महामारी के दौरान राहत-कार्य का काम सफाई से नहीं कर सके। कोरोना-प्रबंधन में नाकामी के कारण राज्य सरकार की काफी किरकिरी भी हुई थी। और दूसरी, पटेल समुदाय का छीजता विश्वास। गुजरात का पाटीदार समाज भाजपा का कोर वोट बैंक माना जाता है। मगर यह वर्ग अब पार्टी से छिटकता जा रहा है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और अमित शाह के दिल्ली आने के बाद यहां एक बड़ा पाटीदार आंदोलन भी हुआ था, जिससे हार्दिक पटेल का उदय हुआ। नतीजतन, 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 100 सीटें भी नहीं पा सकी थी। अब भाजपा यह दिखाना चाहती है कि 2017 बीते दिनों की बात हो गई है और वह फिर से 120 सीटें जीतने का माद्दा रखती है। इसमें नए चेहरे उसकी मदद कर सकते हैं।
मोदी और शाह की जोड़ी बखूबी जान रही है कि राज्य सरकार को कोई खतरा नहीं है। फिर भी ये बदलाव किए गए, क्योंकि वे आगे की सोच रहे हैं। उनका यह प्रयोग यदि सफल रहा, तो कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी यही दांव खेला जा सकता है। हालांकि, मध्य प्रदेश में पिछले साल ऐसी कोशिश हुई भी थी, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया व कुछ अन्य विधायकों के कांग्रेस छोड़ने के बाद कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई और भाजपा वहां फिर से सत्तारूढ़ हो गई। मगर विकल्पहीनता की स्थिति में शिवराज सिंह चौहान को ही शपथ दिलाया गया। हालांकि, उनकी ‘जमीन’ काफी काट दी गई है। हां, उत्तर प्रदेश जरूर अपवाद है, जहां योगी आदित्यनाथ जैसी मजबूत शख्सियत सत्ता में बनी हुई है। उनके खिलाफ भी एकाधिक प्रयास हुए, लेकिन हिंदुत्व का बड़ा चेहरा होने और विश्व हिंदू परिषद व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक बड़े वर्ग की पसंद होने के कारण उनका बाल बांका नहीं हो सका। संभावना यही है कि अगला विधानसभा चुनाव भी उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, क्योंकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण यहां की चुनावी राजनीति की हकीकत है और किसी भी राज्य के चुनाव में योगी आदित्यनाथ को ‘स्टार प्रचारक’ बनाने की ढेरों गुजारिशें अब भी आती हैं। 
हालांकि, चेहरा बदलने की यह शैली नुकसानदेह भी है। अपने जमाने में इंदिरा गांधी भी ऐसे खूब किया करती थीं। अगर किसी राज्य का नेतृत्व ताकतवर होता दिखता, वह उसको झटके से बदल देती थीं। अंतत: यह परिपाटी कांग्रेस की कमजोरी साबित हुई और इसका असर हम आज भी देख रहे हैं। हकीकत यही है कि देश की इस ‘ग्रांड ओल्ड पार्टी’ के पास अब कोई मजबूत क्षत्रप नहीं है, और इसकी पूरी राजनीति बस नेहरू-गांधी परिवार के आसपास सिमट गई है। मोदी-शाह की जोड़ी इतिहास का यह अध्याय शायद ही भूलना चाहेगी। राज्यों में मजबूत नेतृत्व भाजपा की ताकत है। फिर चाहे वह मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान हों, राजस्थान में वसुंधरा राजे, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह, कर्नाटक में येदियुरप्पा, या फिर गुजरात में खुद नरेंद्र मोदी। 
बावजूद इसके भाजपा ने गुजरात में इसलिए पूरी सरकार बदलने का दांव खेला है, क्योंकि यह रणनीति हाल-फिलहाल में सफल साबित हुई है। उसके विपक्ष में यहां कोई मजबूत दल नहीं है। कांग्रेस को पाटीदार आंदोलन से फायदा मिला था, और वहां उसका नया नेतृत्व उभरने लगा था। अल्पेश ठाकोर और हार्दिक पटेल कांगे्रस की तरफ से चुनावी मैदान में उतरे, और सफल भी हुए। दलित चेहरा जिग्नेश मेवाणी ने भी परोक्ष रूप से कांग्रेस की मदद की। मगर अब अल्पेश भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं और हार्दिक भी कांग्रेस के ढर्रे से बहुत खुश नहीं हैं। रही बात जिग्नेश की, तो वह अपनी राजनीति में व्यस्त हैं। अहमद पटेल के निधन के बाद तो कांग्रेस की बची-खुची उम्मीदें भी दम तोड़ती नजर आ रही हैं। रही बात आम आदमी पार्टी की, तो स्थानीय निकाय चुनाव में उसने अपनी ठीक-ठाक ताकत दिखाई है। मगर यहां न तो उसका संगठन जमीन पकड़ सका है और न उसके पास कोई प्रभावी चेहरा है। यह पार्टी अगर मतदाताओं को प्रभावित करती है, तो मुख्यत: कांग्रेस के ही वोट काटेगी। जाहिर है, भाजपा के लिए भूपेंद्र सरकार फायदे का सौदा हो सकती है, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेतृत्व को न उभरने देने की रणनीति आने वाले दिनों में उस पर भारी भी पड़ सकती है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को किसी मुगालते से बचना चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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