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24 अक्तूबर, 2020|3:13|IST

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ताकि घर के पास मिले रोजगार

अंग्रेज भारत को वनों का महासागर कहते थे। इन पेड़-पौधों को ग्राम और आदिवासी समूहों ने पाला-पोसा था। दादाभाई नौरोजी के शब्दों में कहें, तो भारत के आर्थिक शोषण के लिए अंग्रेजों ने इन सामुदायिक संगठनों को खत्म कर दिया और वन्य-भूमि को राज्य की संपत्ति बताकर उन पर कब्जा जमा लिया। सिर्फ गोवा इससे बच सका। हालांकि, पुर्तगालियों ने भी ग्राम समूहों को खत्म करने का वहां प्रयास किया था, पर भू-राजस्व में खासा नुकसान होने पर उन्होंने यह कवायद रोक दी। इसीलिए वर्ष 1961 तक गोवा वनों का महासागर बना रहा। इसके कारण भी वहां पर्यटकों की खूब आवाजाही लगी रही। आज भी गांवकरी या ‘कम्यूनिदाडे’ संगठनों (जमीन पर पूरा मालिकाना हक रखने वाले संगठन) ने वहां साहसिक तरीके से प्राकृतिक विरासत को सहेजकर रखा है।
असल में, आजादी के बाद भी भारत का शासक वर्ग औपनिवेशिक मानसिकता में जकड़ा हुआ रहा। फिर भी, कई ऐसे जन-हितैषी कदम उठाए गए हैं, जो देश में लोकतंत्र के गहरे होते जाने का नतीजा हैं। जैसे, संविधान में 73वां और 74वां संशोधन किया गया, जिसके कारण 1992 में पंचायती राज की स्थापना हुई। साल 2005 में सूचना का अधिकार कानून बना। वर्ष 2006 में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम बना, जिसको वन अधिकार अधिनियम 2006 (एफआरए) के रूप में भी जाना जाता है। इन सभी ने जन-अधिकारों को बहाल करने में भरपूर मदद की है।
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में, जहां राज्य में सबसे ज्यादा 70 फीसदी जंगल हैं, मुख्य रूप से आदिवासियों ने ही पेड़ों को बचाकर रखा है। यह एक ऐसा जिला है, जहां वन अधिकार अधिनियम के सामुदायिक वन संसाधन (सीएफआर) अधिकार व अन्य प्रावधान ठीक से लागू किए गए हैं और गांवों को लाखों हेक्टेयर जमीनें दी गई हैं, ताकि वे बांस, बेंत, चारा, पत्तियां जैसे लघु वनोत्पादों का प्रबंधन कर सकें।
इस जिले की यह सूरत सक्षम आदिवासी नेतृत्व और कुशल व ईमानदार अधिकारियों की साझा मेहनत का नतीजा है। यहां के लोगों को सामुदायिक वन संसाधन अधिकार 2009 में दिए गए, जिसने कौशल विकास व समूह आधारित रोजगार का खासा निर्माण किया। इस कानून के लागू होने से पहले गढ़चिरौली की महिलाएं सरकार की निरर्थक कौशल विकास योजना का लाभ उठा चुकी थीं, जिसके तहत उन्हें एयर होस्टेस के लिए प्रशिक्षित किया गया था। लेकिन कोर्स पूरा करने के बावजूद कोई भी विमानन कंपनी इन महिलाओं को अपने यहां रोजगार देने को तैयार नहीं थी।
इसी तरह, पड़ोस के चंद्रपुर जिले के पचगांव में 1,000 हेक्टेयर जमीन पर सामुदायिक वन संसाधन अधिकार दिए गए। यहां की ग्राम सभा ने प्रत्येक परिवार को वन संसाधनों और अन्य नागरिक मसलों के प्रबंधन के लिए पांच-पांच नियम बनाने का कहा। इसके बाद दो दिनों की बैठक में उन नियमों पर चर्चा की गई और 115 नियम सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए। अब पूरा समुदाय इन 115 नियमों का पालन करता है। इनमें बांस व अन्य लघु वनोत्पादों की कटाई, सामुदायिक वन संसाधन अधिकार क्षेत्र में नियमित गश्त और बांस को काटने व नीलाम करने की साझी जिम्मेदारी शामिल है। पहले यहां के ग्रामीण ठेकेदारों के लिए तेंदू के पत्ते तोड़ते थे और ठीक-ठाक कमा लेते थे। लेकिन इसके लिए उन्हें जंगल के कुछ हिस्सों में आग लगानी पड़ती थी, जिसे वे पसंद नहीं करते थे। अब तेंदू के पेड़ फलों से लदे रहते हैं। और इन फलों की मांग पत्तों से कहीं ज्यादा है। बहुत संभव है कि एक अंतराल के बाद पत्तियों की बजाय इसके फल की बिक्री ग्रामीणों के लिए आर्थिक रूप से कहीं अधिक फायदेमंद साबित हो। 
बेशक, ठेकेदार की तुलना में बांसों की कटाई में उन्हें तीन गुना अधिक खर्च करना पड़ता है, फिर भी 2015 में बांस की बिक्री से 35 लाख रुपये का शुद्ध लाभ उन्होंने कमाया। यहां सुव्यवस्थित जंगल व ग्राम विकास कार्यों में निवेश किया गया है, जो साल भर रोजगार मुहैया कराते हैं। सीएफआर अधिकारों से सशक्त होने से पहले कई ग्रामीण पलायन करके गुजरात में जिंदगी बसर करते थे, लेकिन अब कोई गांव छोड़कर नहीं जाता।
पचगांव की कहानी उन तमाम गांवों तक जरूर पहुंचनी चाहिए, जिनके पास सीएफआर अधिकार हैं। इस कोशिश के तहत महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग ने मेंढा-लेखा (2009 में सीएफआर अधिकार हासिल करने वाला पहला गांव) में पांच महीने का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रायोजित किया था। मैं भी इस कार्यक्रम का हिस्सा था, जिसमें 24 नौजवान और तीन महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया था। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने गांवों में समूहों का गठन किया। अब वे न सिर्फ लघु वनोत्पाद का प्रसंस्करण और मार्केटिंग कर रहे हैं, बल्कि अपना बैंक खाता पारदर्शी रखते हैं और ईमानदारी से टैक्स भी जमा कर रहे हैं।
कुदुंबश्री भी मजबूत सामुदायिक संगठन का एक अलग उदाहरण है। यह केरल में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों का एक नेटवर्क है। यह मुख्य रूप से खाद्य उत्पादन, प्रसंस्करण और रेस्तरां के काम में लगा हुआ है। केरल में कई खेत परती पड़े हैं, क्योंकि रसायनों की लागत और मजदूरी पर रोक के कारण वे मालिकों के लिए बहुत काम के नहीं रह गए हैं। कुदुंबश्री समूह ऐसी जमीनों को पट्टे पर लेता है और उनको उत्पादन के लायक बनाता है। वह ऐसा इसलिए कर पाता है, क्योंकि इसके सदस्यों के पास रोजगार का विकल्प नहीं है, इसलिए वे कम मजदूरी पर भी काम करने को राजी हो जाते हैं। वे खेती के लिए रसायनों का इस्तेमाल नहीं करते, जिससे लागत कम हो जाती है। इसमें कीटनाशकों का भी उपयोग नहीं किया जाता। नतीजतन, वे सफलतापूर्वक जैविक खेती करने में सफल हो रहे हैं।
साफ है, रोजगार-सृजन और कौशल विकास के लिए एक प्रभावी रास्ता यही है कि संगठन और संसाधन पर अधिकार द्वारा समुदायों को सशक्त बनाया जाए। भारत को इस वैकल्पिक आर्थिकी पर गंभीरता से गौर करना चाहिए, खासतौर से उन संकटों को दूर करने के लिए, जो हमने इस साल देखे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 18 september 2020