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विकास की यह राह विषैली

प्रदूषण को लेकर अभी तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं। मगर इन सभी बहसों में जिस एक पहलू को नजरंदाज किया जा रहा है, वह है हमारा विकास मॉडल। प्रदूषण बढ़ाने में इसका बड़ा योगदान है। यह भौतिक विकास को मानव...

विकास की यह राह विषैली
Naman Dixitअरुण कुमार, अर्थशास्त्रीWed, 17 Nov 2021 11:20 PM

प्रदूषण को लेकर अभी तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं। मगर इन सभी बहसों में जिस एक पहलू को नजरंदाज किया जा रहा है, वह है हमारा विकास मॉडल। प्रदूषण बढ़ाने में इसका बड़ा योगदान है। यह भौतिक विकास को मानव विकास का पैमाना मानता है। करीब 150-200 साल पुराना यह मॉडल अधिक से अधिक उत्पादन पर जोर देता है, ताकि लोगों की आमदनी बढ़े और वे अपने लिए अधिकाधिक भौतिक सुविधाएं जुटा सकें। इसमें ‘मोर इज बेटर’ (जितना ज्यादा, उतना अच्छा) की अवधारणा नत्थी है। चूंकि अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के मुताबिक, हमारी समझदारी इसी में है कि हम खुद की बेहतरी करते रहें, इसलिए हम हमेशा अपनी सोचते हैं और अपने हितों की पूर्ति में ही रमे रहते हैं।

इस कारण हर इंसान अधिक खपत करने की जुगत में रहता है, और खपत बढ़ने का अर्थ है प्रदूषण का अधिक बढ़ना। बाजार ने हमारी सोच इतनी कुंद कर दी है कि अगर हम खपत नहीं बढ़ाते, तो यह मान बैठते हैं कि अपनी तरक्की नहीं कर रहे हैं। यह सोच पहले विकसित राष्ट्रों तक सीमित थी, लेकिन बाद में तीसरी दुनिया (भारत भी इसमें शामिल है) के संपन्न तबकों की बनी, और अब यह रिसकर मध्यवर्ग तक पहुंच गई है। दिल्ली का सामाजिक-आर्थिक सर्वे बताता है कि यहां 90 प्रतिशत परिवारों का मासिक खर्च 10 हजार रुपये भी नहीं है। इतनी कम रकम में उनकी बुनियादी जरूरतें ही जैसे-तैसे पूरी हो पाती होंगी, इसलिए अपने देश में खपत मूलत: संपन्न तबका कर रहा है। दुनिया के स्तर पर यह वर्ग अमीर राष्ट्र का है। यह ‘रीसाइकिल’ में विश्वास नहीं करता। उसके लिए उत्पाद खराब होने का मतलब नए उत्पाद की खरीदारी है। इसीलिए कार्बन फुटप्रिंट में उसकी हिस्सेदारी अधिक है और गरीबों की बहुत कम। मुश्किल यह है कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी धनाढ्य वर्ग अपनी खपत कम करने को तैयार नहीं। यही वजह है कि हमारी आबोहवा अब जानलेवा हो चली है, नदियां अपनी निर्मलता छोड़ चुकी हैं और जमीन का दोहन बढ़ने लगा है। हम चाहें, तो इनमें सुधार ला सकते हैं। बेशक, वैश्विक तापमान बढ़ने का असर हम पर भी हो रहा है, लेकिन नदियों की साफ-सफाई या जमीन की हिफाजत हमारे अपने हाथ में है।
साफ है, विकसित राष्ट्रों की संस्कृति को अपनाने का दुष्परिणाम भारत जैसे देश भुगत रहे हैं। हम एक तरफ अपना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ाने के लिए ऐसी आर्थिक गतिविधियां करते हैं, जिनसे प्रदूषण बढ़ता है, और फिर उसको साफ करने की कथित कवायद करके जीडीपी बढ़ाते हैं और अपनी पीठ थपथपाते हैं। यानी, पहले बीमार करो और फिर इलाज में हुए खर्च को जीडीपी में जोड़कर अपनी तरक्की दिखाओ। इंडियन इकोनॉमी सिंस इंडिपेंडेंस नामक किताब में मैंने सवाल किया था कि अधिकाधिक डॉक्टर, नर्स या अस्पताल एक अच्छे समाज के सूचक हैं या बुरे समाज के? इनकी एक आदर्श संख्या तो समझी जा सकती है, लेकिन यदि गली-गली में अस्पताल खुलने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि बीमारियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी किताब में एक जगह मैंने 2002 में एम्स के डॉक्टरों द्वारा किए गए अध्ययन का जिक्र किया है। यह अध्ययन बताता है कि 1980 के दशक में बच्चों को अस्थमा की शिकायत नहीं होती थी, लेकिन 2002 में अस्थमा के कुल मरीजों में बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 15 फीसदी थी।
यह सब कुछ बाजारीकरण की देन है। ‘मोर इज बेटर’ की अवधारणा दरअसल हमारे जीवन में रच-बस गई है। बाजारीकरण के साथ ही यह भी जुड़ा है कि स्वच्छ तकनीक विकसित देशों में रहेगी और खराब (यानी बीमार करने वाली) तकनीक विकासशील देशों में। ऐसा क्यों? इसका खुलासा विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री रहे लॉरेंस हेनरी समर्स ने 2002 में किया था। उन्होंने एक परचा लिखा था, जो लीक हो गया। उन्होंने लिखा था, यह बाजार तय कर रहा है कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में लोग मरें, क्योंकि अमीर राष्ट्र के बाशिंदे बाजार में सक्षम होते हैं। उनकी प्रति व्यक्ति आय अधिक है और वे तुलनात्मक रूप से लंबा जीवन जीते हैं। उनकी सोच की पुष्टि इससे भी होती है कि कभी दिल्ली की यमुना की तरह गंदी रहने वाली टेम्स नदी इसलिए साफ हो पाई, क्योंकि वहां स्वच्छ तकनीक का इस्तेमाल होने लगा। मगर विकासशील देशों में ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पास इतनी उन्नत तकनीक नहीं है। संसाधनों की सीमा है।
साफ है, जब तक हम बाजार को तवज्जो देंगे, प्रदूषण का समाधान नहीं निकाल पाएंगे। कार्बन उत्सर्जन को कम करने की बातें सभी कह रहे हैं, मगर यह इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि हमने इसको कम करने का गलत रास्ता चुना है। मसलन, वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने पर तमाम देश सहमत दिख रहे हैं, मगर क्या किसी ने यह सोचा कि जब हम 2 डिग्री सेल्सियस तक भी नहीं पहुंचे हैं और ‘अनियंत्रित मौसम की चरम अवस्था’ को भुगतने को अभिशप्त हैं, तब जब उस मानक तक पहुंचेंगे, तब क्या होगा? इसीलिए अच्छा होगा कि अभी जितना वैश्विक तापमान है, लक्ष्य उससे कम रखा जाए।
आखिर इसका समाधान क्या हो? यहां महात्मा गांधी को हमें याद करना चाहिए। गांधीजी अहिंसा की बात करते थे। इसमें सिर्फ दूसरे इंसान के साथ नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ भी हिंसा (दोहन, खनन आदि) न करने की गुजारिश शामिल थी। इसीलिए, वह कहा करते थे कि प्रकृति सबकी जरूरत तो पूरी कर सकती है, लेकिन लालच को पूरा नहीं कर सकती। दुर्भाग्य से, हम इसी लालच की गिरफ्त में हैं। लोगों को जागरूक करके ही प्रदूषण को थामा जा सकता है। गांधीजी के मुताबिक, हमें साधारण जीवनशैली अपनानी होगी। अपनी जरूरतें सीमित करनी होंगी। खपत कम करनी होगी। स्वहित की जगह परहित को तवज्जो देनी होगी। और, समाज का हरसंभव ख्याल रखना होगा। यदि हम ऐसा कर सकें, तभी बात बनेगी। अन्यथा, बाजार का यह मॉडल सब कुछ तहस-नहस कर देगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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