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17 नवंबर, 2020|11:56|IST

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बहुत उम्मीद न पालें टीके से

दुनिया के कई हिस्सों में, खासकर यूरोप और अमेरिका में कोविड-19 के नए मामलों में फिर से तेजी देखी जा रही है, जिसके कारण वहां लॉकडाउन की भी वापसी हो गई है। नीति आयोग के डॉ वी के पॉल के मुताबिक, 90 फीसदी भारतीय अब भी कोरोना संक्रमण के प्रति अति-संवेदनशील हैं। यही वजह है कि वैक्सीन की खबरों को हम बहुत आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय से पहले अत्यधिक उम्मीद लगाने जैसा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, यानी डब्ल्यूएचओ की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं कि अगर ऐसा होता है (वैक्सीन बनता है), तो यह एक अप्रत्याशित वैज्ञानिक उपलब्धि होगी। डब्ल्यूएचओ के प्रमुख ने भी पिछले दिनों कहा है कि कोरोना से बचाव के लिए जो उपाय अमल में लाए जा रहे हैं, वैक्सीन उनका पूरक भर हो सकता है। कुछ विशेषज्ञों ने तो लंबे समय तक फ्लू के वैक्सीन के परीक्षण के बाद टीके की क्षमता में आने वाली कमी और साइड इफेक्ट की तरफ भी ध्यान खींचा है। लिहाजा सवाल यह है कि क्या टीकाकरण के बाद गंभीर मरीजों की तादाद और मौत कम हो जाएगी, या हमें निराशा हाथ लगेगी?
हालांकि, ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट बताती है कि भारत ने टीकाकरण के लिए सात अरब डॉलर खर्च करने की योजना बनाई है। कहीं हमारा देश उस अंतरराष्ट्रीय चालबाजी के जाल में तो नहीं फंस रहा, जिसमें ऐसा वैक्सीन हमारे हाथ लगे, जो न तो सुरक्षित हो और न ही प्रभावी? एम्स के निदेशक का आकलन है कि हमारी आबादी प्राकृतिक रूप से इस महामारी से प्रतिरक्षा हासिल कर सकती है। संभव है, वैक्सीन आने से पहले ऐसा हो जाए। जाहिर है, कोविड-19 से बचने के लिए किसी टीका के प्रभावी होने से पूर्व दुनिया को लंबा रास्ता तय करना है। वैक्सीन के प्रदर्शन और उसकी क्षमता का सही-सही आकलन होना अभी शेष है।
जिस ‘हर्ड इम्यूनिटी’ का जिक्र किया जाता है, वह दरअसल ऐसी स्थिति है, जिसमें कोई बीमार इंसान एक से भी कम लोग को संक्रमित करे, यानी तकनीकी भाषा में कहें, तो ‘आर वैल्यू’ घटकर एक से कम हो जाए। कोरोना को लेकर यह परिस्थिति तब बनेगी, जब 50 फीसदी आबादी इस वायरस से संक्रमित हो जाए। मगर इस रणनीति के अपने खतरे हैं और इससे रोगियों की संख्या व मृत्यु दर के बढ़ने का जोखिम है। इतना ही नहीं, इससे स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर भी अस्वीकार्य बोझ बढे़गा। फिर, यह कोई ऐसा संक्रमण नहीं है, जो हमें सिर्फ तात्कालिक नुकसान पहुंचाए। इस वायरस पर जीत पा चुके कुछ मरीज महीनों बाद लंग फाइब्रोसिस, मानसिक रोग, हृदय संबंधी बीमारी, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द जैसी कई अन्य बीमारियों के साथ अस्पताल लौटे हैं। ऐसे में, बेतकल्लुफ होकर हर्ड इम्यूनिटी का जोखिम शायद ही कोई उठाना चाहेगा। 
अपने प्रतिरक्षा तंत्र को कुदरती तौर पर मजबूत बनाने का एक विकल्प हमारे सामने है। शरीर पर वायरस के हमला करते ही जो अग्रिम रक्षा-पंक्ति सक्रिय हो जाती है, उसे ‘इनेट इम्यूनिटी’ कहते हैं, और यह कई बीमारियों को मजबूती से नियंत्रित करने में सक्षम होती है। रक्षा की दूसरी पंक्ति को सक्रिय होने में, जो ‘बी’ और ‘टी’ कोशिकाओं से बनी होती है, करीब सात दिनों का समय लग सकता है। ये कोशिकाएं न सिर्फ यह पहचानती हैं कि हम वायरस से संक्रमित हो गए हैं, बल्कि किस वायरस का हम पर हमला हुआ है, उसका भी सही पता-ठिकाना बता देती हैं। वायरस का पता लगते ही उसके हजारों नकल तैयार होते हैं। ये एंटीबॉडी और बी कोशिका (मेमोरी-टाइप) वायरस के निष्क्रिय हो जाने के बाद भी शरीर में बनी रहती हैं और भविष्य में जरूरत पड़ने पर तेजी से प्रतिक्रिया कर सकती हैं। 
संक्रमण के कुछ महीनों बाद बेशक एंटीबॉडी कम होने लगे, लेकिन बी कोशिका हमेशा तैयार रहती है। कुछ अध्ययनों में कोरोना से ठीक होने वाले चंद मरीजों में एंटीबॉडी की कमी देखी गई है। मगर इम्यूनोलॉजिस्ट बताते हैं कि टी-कोशिका स्वतंत्र रूप से एंटीबॉडी बना सकती है। इससे हमें कुछ उम्मीद मिलती है, क्योंकि टी कोशिका वायरस के खिलाफ तेज प्रतिक्रिया करती है और संक्रमित कोशिकाओं को खत्म करती है। इतना ही नहीं, यह अपने पीछे मेमोरी-टाइप कोशिकाएं भी तैयार करती हैं। चूंकि हममें से कुछ लोगों के शरीर में पहले से ही सामान्य सर्दी वाले पूर्व के कोरोना-संक्रमण की टी-कोशिका मौजूद है, इसलिए कोविड-19 का उन्हें हल्का संक्रमण हुआ।
पिछला अनुभव यह भी कहता है कि किसी टीके को विकसित होने में कई साल लगते हैं। बड़ी और विविध आबादी की वजह से इसकी क्षमता बेअसर भी हो जाती है। चेचक जैसी बीमारियों में तो यह आजीवन कारगर होता है, लेकिन कुछ अन्य बीमारियों में टीका मनमाफिक काम नहीं करता। एचआईवी का ही उदाहरण लें, जिसका पता 1980 के दशक में लगा था, लेकिन 40 वर्षों के बाद भी इसका टीका हम नहीं बना सके हैं। फिर, फ्लू के तमाम वायरस म्यूटेट होते रहते हैं, यानी अपना चरित्र बदलते रहते हैं। यही वजह है कि हर साल हमें इसके नए टीके की जरूरत पड़ती है।
वैक्सीन शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को तेज करके अपना काम करता है, लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि कोविड-19 की एंटीबॉडी कितने दिनों तक काम करती है। कोरोना मरीजों के दोबारा संक्रमित होने की खबरें भी आई हैं, जो इस उम्मीद को ध्वस्त करती हैं कि वैक्सीन लगने के बाद शरीर में लंबे समय तक प्रतिरक्षा तैयार हो जाएगी। फिर, टीका की सुरक्षा का भी मसला बड़ा है। जॉनसन ऐंड जॉनसन ने तीसरे चरण का परीक्षण इसलिए रोक दिया, क्योंकि एक प्रतिभागी में ‘अस्पष्ट बीमारी’ पाई गई। एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित वैक्सीन के क्लीनिकिल परीक्षण में भी एक स्वयंसेवक की मौत हो गई। रूस और चीन द्वारा तैयार हो रहे टीके से भी दुष्प्रभाव की खबरें हैं। लिहाजा, भारत सरकार का यह दावा यदि सच साबित हो जाता है कि फरवरी, 2021 तक महामारी पर काबू पा लिया जाएगा (वैक्सीन आने से पहले), तो हमें भला टीके की क्या जरूरत होगी?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 18 november 2020