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5 मार्च, 2021|1:11|IST

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डाटा महाठगिनी हम जानी

Herjinder

वाट्सएप, फेसबुक, यू-ट्यूब, जी-मेल वगैरह हमें मुफ्त में मिलते हैं और प्ले स्टोर या एप स्टोर के जरिए हमारे मोबाइल फोन में आ विराजते हैं। हमारे यहां दान की बछिया के दांत न गिनने की परंपरा है, इसलिए इनकी खामियों या हमारे जीवन पर इनके अन्यथा असर को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। अगर ये सब आपको मुफ्त नहीं मिलते तो? तब आपको उसकी पूरी कीमत चुकानी पड़ती। यानी इनोवेशन, डेवलपमेंट और लगातार अपग्रेड की लागत, दुनिया के सबसे महंगे प्रबंधकों और कर्मचारियों की तनख्वाहें, आलीशान दफ्तरों और परिसरों के रखरखाव पर होने वाले खर्च, कंपनी के हरदम चलते रहने वाले सर्वरों पर व्यय होने वाली रकम, इसके अलावा अलाने-फलाने मदों में लगे ढेर सारे पैसे भी तब हमसे वसूले जाते। हमारी सरकारें भी इन पर जीएसटी वगैरह लगातीं। तब हो सकता है कि हमारे सारे एप की कुलजमा कीमत हमारे मोबाइल फोन से भी ज्यादा हो जाती। 
जाहिर है, हम आज सुबह-शाम जिन एप का इस्तेमाल करते हैं, उनमें से बहुत सारे एप तब हमारे मोबाइल में नहीं होते। काफी सारे लोग या तो इतना खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं होते, या उन्हें यह पैसे की बर्बादी लगता। किसी भी स्थिति में वे एप की कीमत को उससे मिलने वाली सुविधाओं से तौलते तो जरूर ही। मोबाइल सॉफ्टवेयर कंपनियां ये सब जानती हैं, इसलिए उन्होंने इसका दूसरा तरीका अपनाया है- तुम हमें अपनी जानकारियां दो, हम तुम्हें मुफ्त एप और उसकी सेवाएं देंगे। संचार की इस नई दुनिया का सारा अर्थशास्त्र हमारी इन जानकारियों, यानी डाटा के कारोबार पर टिका है, जैसे अखबार और टेलीविजन जैसे परंपरागत मीडिया का व्यवसाय विज्ञापनों पर। हम इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं और बीच-बीच में ऋतु परिवर्तन की तरह निजता जैसे नैतिक मुद्दे भी उठते रहते हैं। नए साल की इन सर्दियों में वाट्सएप की निजता नीति में बदलाव हमारे 4-जी विमर्श को नई गरमी दे गया। वाट्सएप ने अगले महीने के दूसरे सप्ताह से लागू होने वाली जो नई निजता नीति की घोषणा की थी, उसमें आपकी बहुत सारी जानकारियां अपनी पैरेंट कंपनी फेसबुक के हवाले करने की बात थी। हालांकि, इसमें भी कुछ नया नहीं था। साल 2014 में जब फेसबुक ने वाट्सएप को खरीदा था, तब उसने यह कहा था कि दोनों कंपनियां डाटा शेयर नहीं करेंगी। लेकिन दो साल बाद ही यह वचन तोड़ दिया गया और पिछले चार साल से यह सब आराम से चल रहा है। इसमें नई चीज यह है कि अब इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है। अभी तक वाट्सएप आपसे बहुत सी जानकारियां नहीं लेता था, अब वह भी आपसे ले लेना चाहता है। बहुत से लोगों की चिंता इसलिए भी है कि वाट्सएप के जरिए बहुत से लोग पेमेंट भी करने लगे हैं। इसके अलावा, ऐसी व्यवस्था भी की जा रही है कि लोग वाट्सएप के जरिए खरीदारी भी कर सकें। लोगों को डर है कि अब उनके सारे लेन-देन और खरीद-फरोख्त की जानकारियां भी वाट्सएप से होती हुई फेसबुक के हवाले हो जाएंगी। यह पहली बार होगा, ऐसा भी नहीं है। गूगल पहले से यह कर रहा है, लेकिन उसकी बात हम बाद में करेंगे, फिलहाल एक और एप की बात। अमेजन के एप से आप ऑनलाइन खरीदारी भी कर सकते हैं, भुगतान भी कर सकते हैं और वह इस पर भी नजर रखता है कि आप इस समय हैं कहां? यानी वाट्सएप जो नया कर रहा है, वह तो पहले से ही हो रहा है।
फिर ऐसी कोई जानकारी नहीं है, जो गूगल आपसे इस या उस तरीके से न लेता हो। उसे पता होता है कि आप इस समय कहां हैं? उसे मालूम होता है कि आप कब कहां गए थे? उसे पता होता है कि आपने किन बिलों का भुगतान कर दिया, किनका अभी बाकी है और किस बैंक की किस्त इस बार आप नहीं चुका पाए? वह जानता है कि किसने आपको मेल भेजा, आपने किसको जवाब दिया और किसको नहीं? कई बार वह यह भी बता देता है कि आपको जवाब क्या देना है? आपकी ही नहीं, आपके पूरे परिवार की जन्मतिथि भी उसे पता है, उनके फोन नंबर और बैंक अकाउंट नंबर भी। आपके मर्ज और डॉक्टर की जानकारी भी उससे नहीं छिपी है। लोगों की जानकारियों के बदले उन्हें सेवा देने के कारोबार की बड़े पैमाने पर शुरुआत गूगल ने ही की थी और वही इस बाजार का अगुवा भी है। साल 2019 में उसने 161 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया था, जबकि फेसबुक का मुनाफा इसके आधे से भी कम, यानी 71 अरब डॉलर के करीब था। फेसबुक भी अब गूगल के रास्ते पर चलकर अपना मुनाफा बढ़ाना चाहता है, और इसके लिए आपसे वही सब जानकारियां मांग रहा है, जो आप खुशी-खुशी गूगल को देते रहे हैं। लेकिन ऐसा क्या हो गया कि गूगल का गुड़ खाने वाले अचानक ही फेसबुक और वाट्सएप के गुलगुलों से परहेज करने लग गए? इसका जवाब फेसबुक कंपनी के चरित्र में है। फेसबुक एक ऐसी कंपनी है, जो अक्सर गलत कारणों से खबरों में रहती है। चाहे डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव से जुडे़ विवाद हों या भारत में उसकी प्रतिनिधि आंखी दास से जुड़े विवाद। हर बार फेसबुक एक ऐसी कंपनी के रूप में सामने आती है, जिसे प्रबंधन की भाषा में ‘बैडली मैनेज्ड’ कंपनी कहा जाता है। निजता नीति के ताजा विवाद में भी यही दिखाई देता है। यह नीति तकरीबन सभी कंपनियां समय-समय पर बदलती रही हैं, लेकिन वाट्सएप ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसमें एक तरह की धमकी निहित थी- आप सहमत नहीं हैं, तो आपका अकाउंट बंद!  धमकी ने संदेह भी पैदा किए और उपयोगकर्ताओं को सिग्नल व टेलीग्राम जैसे प्रतिद्वंद्वियों की ओर धकेल दिया, यानी शब्दों ने खता की, साख ने सजा पाई। फिलहाल इसे टाल दिया गया है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 18 january 2021