DA Image
26 मई, 2020|6:50|IST

अगली स्टोरी

हमेशा के लिए सुधारिए अस्पताल 

कोविड-19 के खिलाफ जंग में केंद्र और राज्य सरकारों ने लोगों की मेडिकल जरूरत पूरी करने के प्रति काफी तत्परता दिखाई है। विशेषकर कोरोना संक्रमित मरीजों की जांच और इलाज को लेकर हर घंटे चिकित्सकीय सुविधाओं और क्षमताओं को बेहतर बनाया जा रहा है। कोरोना वायरस की चपेट में आए रोगियों की जरूरतों को देखते हुए अधिक से अधिक वेंटिलेटर की व्यवस्था की जा रही है। कोरोना वायरस के खिलाफ युद्ध में सरकार ने जितनी संवेदनशीलता दिखाई है, उसकी तारीफ की जानी चाहिए, फिर चाहे वह लॉकडाउन की घोषणा हो या चिकित्सकीय सुविधाओं का विस्तार। मगर सवाल यह है कि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र के निर्माण की ओर क्या हमने पर्याप्त ध्यान दिया है?
संभव है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत कोरोना संकट से कहीं बेहतर तरीके से लड़ सकेगा, लेकिन उल्लेखनीय यह भी है कि ज्यादातर मुल्क हमारी तुलना में अपनी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य तंत्र की बेहतरी पर खर्च कर रहे हैं। चीन, जहां से कोरोना वायरस दुनिया के तमाम देशों में पहुंचा, अपनी जीडीपी का 2.9 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है, जबकि ब्राजील लगभग 4.4 फीसदी हिस्सा। अमेरिका में भले ही कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है, लेकिन वह अपनी जीडीपी का आठ फीसदी से अधिक हिस्सा लोगों की सेहत पर खर्च करता है। यहां तक कि ईरान भी लगभग 4.4 फीसदी हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे पर खर्च करता है। पड़ोसी देश पाकिस्तान से हम बेशक कई मामलों में बेहतर हैं, लेकिन जब बात स्वास्थ्य सेवा की आती है, तब हमारी हैसियत उससे बमुश्किल अच्छी है। वह अपनी जीडीपी का 0.9 हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जबकि हम महज 1.1 फीसदी हिस्सा। दुर्भाग्य से यह तस्वीर पिछले दो दशकों में शायद ही बदली है।
भारत में बीमार सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की मुश्किल सिर्फ कम सरकारी निवेश नहीं है, बल्कि समस्या यह भी है कि यहां पैसा सही जगह पर खर्च नहीं किया जाता। स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा मरीजों को इलाज की सुविधा मुहैया कराने पर खर्च होता है, जबकि रोग से बचाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं के हिस्से बहुत कम राशि आती है। मसलन, टीकाकरण की सुविधा बेहतर बनाना, बीमारी की जांच या इसी तरह की अन्य सेवाएं। दुखद यह भी है कि उपचार सेवाओं की बेहतरी पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करने के बावजूद इस मामले में संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आए हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि देश 410 जिलों के आईएएस अधिकारियों के बीच कोरोना संकट से निपटने की तैयारी को लेकर जब सर्वे किया जाता है, तो ज्यादातर आईएएस अधिकारी जिला अस्पतालों में बेड और एंबुलेस जैसी बुनियादी सेवाओं के न रहने की बात कहते हैं। देश में सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की सेहत इतनी खराब है कि ज्यादातर लोग इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर भरोसा करते हैं, जबकि वहां इलाज कराना खासा महंगा पड़ता है। निम्न और कमजोर आमदनी वाला वर्ग भी खर्च संभाल पाने की स्थिति में निजी अस्पतालों का रुख करना पसंद करता है।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग स्टडीज, यानी सीएसडीएस द्वारा 2017 में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि देश के लोगों का सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर भरोसा काफी कम है, जिसके कारण देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ अपेक्षाकृत कम भारतीय उठाना चाहते हैं। करीब 57 फीसदी लोगों ने पिछले एक साल में सरकारी अस्पताल में जाने की बात मानी, जबकि 41 फीसदी ने सरकारी अस्पताल न जाना स्वीकार किया। हालांकि इसमें एक अंतर भी है, जैसे बड़ी संख्या में गरीबों (58 फीसदी) ने माना कि वे सरकारी अस्पताल जाते हैं, क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है, जबकि उच्च और मध्यवर्ग के लोगों में से करीब 60 फीसदी ने अपनी मर्जी से सरकारी अस्पताल जाना पसंद किया। स्पष्ट है, उच्च और मध्य वर्ग अपनी मर्जी से इसलिए सरकारी अस्पताल जाते हैं, क्योंकि अपने संपर्क का फायदा उठाकर वे वहां बिना मुश्किल के इलाज करा लेने में सक्षम होते हैं, जबकि गरीबों के पास यह सुविधा नहीं होती। 
अध्ययन यह भी बताता है कि बड़ी संख्या में गरीब आबादी (62 फीसदी) सरकारी अस्पताल इसलिए जाती है, क्योंकि वहा इलाज सस्ता है, लगभग मुफ्त। ज्यादातर भारतीयों के सरकारी अस्पताल न जाने की मुख्यत: दो वजहें हैं- पहली, गुणवत्तापूर्ण इलाज का अभाव और दूसरी, बेड, दवाई जैसी अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की नाजुक हालत। तकरीबन 32 फीसदी भारतीयों ने माना कि सरकारी अस्पताल में इलाज करना आसान नहीं है, बल्कि यह काफी मुश्किल होता है, क्योंकि डॉक्टरों से मिलने से पहले रोगियों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।
स्पष्ट है, अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर हम अभी जितनी राशि खर्च कर रहे हैं, वह संतोषजनक नहीं है। कोरोना संकट से तो हम जल्द ही बाहर निकल आएंगे, लेकिन लंबे समय के लिए यह जरूरी है कि सरकार देश में कहीं अधिक स्थिर और बेहतर स्वास्थ्य तंत्र के निर्माण पर ध्यान दे। सीएसडीएस का अध्ययन बताता है कि 32 फीसदी भारतीय सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज के लिए अधिक पैसे चुकाने को तैयार हैं, लेकिन ज्यादातर लोग (62 फीसदी) स्वास्थ्य सेवा की बेहतरी के लिए सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। हालांकि यह भरोसा अभी टूटा नहीं है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कुछ सुधार हुए हैं। इस अध्ययन में शामिल 52 फीसदी भारतीयों ने इस बात की तस्दीक की कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं पहले के मुकाबले निश्चित रूप से बेहतर हुई हैं। मगर अब भी इसे लंबा रास्ता तय करना है। इस कोरोना संकट से हम यह सबक तो ले ही सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column 20 april 2020