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केरल से मिले कारगर सबक

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Rakesh
Mon, 16 Mar 2020 11:19 PM
केरल से मिले कारगर सबक

भारत में कोरोना वायरस का पहला मामला फरवरी के पहले सप्ताह में केरल में ही मिला था। कुछ ही दिनों में राज्य सरकार के चिकित्सा महकमे ने ऐसे कुछ अन्य मामलों की भी पुष्टि कर दी। राज्य ने फटाफट जांच केंद्र बनाए, 40,000 स्वास्थ्य अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और जमीनी कामगारों को संदिग्ध लोगों की जांच के लिए तैनात कर दिया। राज्य शुरू से ही रोगियों की निगरानी के मामले में अग्रणी नजर आने लगा। मरीजों को खोजने और उन्हें समझाने की उम्दा कोशिशों के साथ केरल सामने आया। यह बेवजह नहीं है कि स्वास्थ्य देखभाल के मामले में केरल को सबसे अच्छा राज्य माना जाता है। 

इस पर सोचिए। कुछ सप्ताह पहले केरल सरकार की कार्य-कुशलता से उदयपुर प्रशासन का पाला पड़ा था। केरल सरकार की ओर से फोन आया कि केरल के एक छात्र के साथ तीन लोगों ने यात्रा की है। केरल का छात्र चीन के वुहान से लौटा था और जांच में कोरोना पोजिटिव पाया गया था। फोन के बाद उदयपुर प्रशासन हरकत में आया और उसने एक चीनी पर्यटक सहित तीन लोगों को अपने शिकंजे में ले लिया। तीनों को उदयपुर के एक राजकीय अस्पताल में भर्ती करा दिया गया, लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। दो दिन बाद उदयपुर के अधिकारियों को केरल से फिर फोन आया, जिसमें पूछा गया कि अलग किए गए तीन मरीज अब कैसे हैं?

सच्चाई यह थी कि राजस्थान में जिला प्रशासन के अधिकारियों के आतंक के कारण चीनी पर्यटक सहित तीन में से दो निगरानी से गायब हो चुके थे। पुलिस एक बार फिर चक्कर में पड़ गई और जांच-खोज तेज हुई, तो पाया कि भागने वाले दो लोगों ने जयपुर की यात्रा की है। उन्हें कोरोना परीक्षण के लिए तत्काल जयपुर के अस्पताल में भेज दिया गया। जाहिर है, राजस्थान के अधिकारी एक तरह से ऊंघते धरे गए। उनके पास कोई सुराग नहीं था कि उनके मरीज उदयपुर के निगरानी केंद्र से गायब कैसे हो गए? खैर है कि इस मामले का सुखद अंत हुआ और सभी संदिग्धों को वायरस मुक्त घोषित कर दिया गया।

इसी तरह मध्य प्रदेश में दो मरीज बिना बताए निगरानी केंद्र से फरार हो गए। कर्नाटक के मामले में तो हद हो गई। एक कंपनी कर्मचारी यूरोप से हनीमून मनाकर बेंगलुरु लौटा। दूल्हा जांच के लिए अस्पताल पहुंचा, लेकिन दुल्हन अपने माता-पिता से मिलने आगरा रवाना हो गई। उसने एक उड़ान और एक ट्रेन यात्रा की थी। आगरा में महिला को घर से निकालने के लिए एक मजिस्ट्रेट को भेजना पड़ा और महिला को जांच के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। परिवार के सदस्य भी आइसोलेशन वार्ड में भेजे गए। प्रशासन को गुमराह करने के आरोप में महिला के पिता के खिलाफ मामला भी दर्ज किया गया। पिता ने दावा किया था कि महिला बेंगलुरु लौट गई है।

जब कोरोना वायरस फैल रहा है, तब केरल भरपूर सावधानी, मेहनत, धैर्य, दृढ़ता और पेशेवर तरीके से निपट रहा है। केरल में कोरोना जांच का पहला चरण ही बहुत गहन है, शायद यही कारण है कि वह कई मामलों को जल्दी पहचानने में सक्षम रहा है। केरल सबके लिए सबक है, संदिग्ध मामलों को अलग करना, प्रभावित आबादी की जांच करना और प्रभावी ढंग से स्वैच्छिक सामाजिक अलगाव के तरीके आजमाने की सलाह देने में इस राज्य ने एक मिसाल पेश की है।

आपदा के केंद्र वुहान में कार्रवाई में देरी के चलते ही चीन महामारी की आग में घिरा और बाकी दुनिया को समय पर चेताने में भी नाकाम रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक चरण में प्राप्त सूचना का तत्काल प्रसार किसी भी वायरस को फैलने से रोकने में कारगर हो सकता है। खैर, बाद में चीन ने अधिनायकवादी सत्ता होने के कारण बहुत कठोर कदम उठाए, और अब उसे सफलता मिलती दिख रही है। 

दूसरी ओर, केरल न केवल निगरानी में खास प्रदर्शन कर रहा है, बल्कि उपचार या जांच के लिए अलग-थलग किए गए लोगों के साथ मानवीय तरीके से पेश आ रहा है। राज्य ने संदिग्ध मरीजों की इतनी अच्छी तरह से देखभाल की है कि उनमें से कुछ लोग स्वयं ही आइसोलेशन वार्ड में आ भर्ती हुए और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के ब्रांड अंबेसडर बन गए। केरल की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की भी सराहना हो रही है, जो खुद ही एक उपलब्धि हैं। उन्होंने 2017 और 2018 में निपाह वायरस के फैलने के समय भी स्थिति को बहुत कुशलता से संभाला था।

कोरोना की जांच व उपचार के लिए बनाए गए आइसोलेशन वार्ड का मतलब यह नहीं है कि रोगी को सबसे काट दिया जाता है। डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स और अन्य कर्मचारी लगातार उनके साथ बने रहते हैं। जिला चिकित्सा अधिकारी और यहां तक कि स्वास्थ्य मंत्री भी ऐसे रोगियों की खोज-खबर लेते रहते हैं। रोगियों को टेलीविजन देखने, समाचार पत्र-ब्लॉग पढ़ने, फोन पर बात करने और अपने निकट व प्रिय लोगों से बातचीत की अनुमति होती है। उन्हें अच्छा खाना दिया जाता है, लेकिन किसी और से मिलने नहीं दिया जाता। मरीज अपने घर से आए सुस्वाद भोजन का भी आनंद ले सकते हैं। चौबीसों घंटे उनके रक्तचाप और तापमान की जांच होती है। दवाएं दी जाती हैं। आइसोलेशन वार्ड में रह चुके एक भुक्तभोगी ब्लॉगर कहते हैं कि केरल का ‘मेडिकेयर’ विश्वस्तरीय है।

सिर्फ केरल सरकार नहीं, बल्कि राज्य के सामान्य नागरिक भी जिम्मेदारी भरा व्यवहार कर रहे हैं, ताकि यह वायरस और न फैले। एक मामला लिनो एबेल का है, कतर में फोटोग्राफी का काम करने वाले लिनो अपने पिता को देखने आए थे, पर उन्हें गले में खराश और बुखार की शिकायत हुई। वह जांच के लिए उसी अस्पताल में भर्ती कर लिए गए। उनके पिता नहीं बचे। पिता का शव अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था और पुत्र सिर्फ अपने वार्ड की खिड़की से खड़ा देख रहा था। मुख्यमंत्री ने भी लिनो की तारीफ की। लोगों को यह समझना चाहिए, कोरोना के मामले पहले केरल में संभवत: इसलिए सामने आए, ताकि बाकी देश को भी संभलने और इससे मिलकर लड़ने का मौका मिल जाए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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