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16 अक्तूबर, 2020|11:13|IST

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मातृ शक्ति की आर्थिक कमजोरी 

आज से नवरात्र प्रारंभ हो रहा है। नौ दिनों तक देवी के विभिन्न रूपों - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होगी। नौ देवियों के नामों के नौ अर्थ और इन नामों से जुड़ी देवियों के जीवन की कथाएं भी हैं। यदि हम देवियों का नौ रूप देखें और उनके अर्थों को समझें, तो ऐसा विदित होता है कि सभी रूपों में देवी सशक्त रही हैं। नारी के विषय में इस तरह का चिंतन, आदर्श और व्यवहार, किसी भी देश में किसी युग में नहीं रहा है। यह सत्य है, नारी के लिए भी उसकी आर्थिक शक्ति सर्वोपरि है। आर्थिक दृष्टि से सशक्त नारी अपने जीवन में अपने प्रकृति प्रदत्त और सामाजिक शिक्षा से प्राप्त सारे गुणों की अभिव्यक्ति और अभ्यास कर सकती है। हमारा इतिहास बताता है कि जो महिलाएं, जिस किसी क्षेत्र में प्रसिद्ध हुईं, उससे पहले वे आर्थिक रूप से सशक्त हुईं। 

ध्यान रहे, आज ‘अंतरराष्ट्रीय गरीबी निवारण दिवस’ भी है। नारी को देवी मानकर पूजने वाले समाज को भी सर्वप्रथम नारी की आर्थिक स्थिति पर विचार करना चाहिए। यह भी जान लेना चाहिए कि आज नारी शोषण की एक बड़ी वजह उनकी आर्थिक कमजोरी है। खूब मेहनत करने के बाद भी ज्यादातर महिलाएं अपनी मेहनत की मालिक नहीं हैं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं।
आज आर्थिक स्थिति पर विचार करने पर हम पाते हैं कि महिलाएं आर्थिक आधार पर बंटे तीन सामाजिक स्तरों को जीते हुए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के प्रयास करती रही हैं। समृद्धि के शिखर पर बैठे उच्च वर्ग में महिलाओं को अपने आर्थिक स्वावलंबन की चिंता नहीं करनी पड़ती। वे तो स्वयं न जाने कितनी जरूरतमंद महिलाओं को आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बनाती हैं और ऐसा हर सक्षम महिला को करना ही चाहिए। 

दूसरा है, मध्यम वर्ग। इस वर्ग में महिलाओं की संख्या अधिक है। स्वतंत्रता के बाद इस वर्ग में स्त्री शिक्षा का प्रसार हुआ है। शिक्षित होने के कारण अपनी योग्यता के आधार पर महिलाएं आज बडे़-छोटे कई क्षेत्रों में उच्च पदों पर भी आसीन दिखती हैं। शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, कला-संगीत, सीने जगत इत्यादि ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां महिलाओं के पांव धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं। वे अर्थार्जन भी करती हैं और घर-परिवार भी संभालती हैं। 

वर्ष 1981 में अखिल भारतीय महिला मोर्चा (भाजपा) की प्रधान होने के नाते मैंने सरकार के सामने दो मांगे रखी थीं। पहली, औरतों के लिए अधिक से अधिक आंशिक (पार्टटाइम) नौकरियों की व्यवस्था हो। दूसरी, काम घर लाने की सुविधा हो। उन दिनों भी पढ़ी-लिखी महिलाएं घर बैठती थीं, क्योंकि वे घर में बच्चों और बुजुर्गों को छोड़कर नौकरी को पूरा समय नहीं दे सकती थीं। पढ़-लिखकर सिर्फ घर के काम करने से उनके अंदर कुंठा पैदा होती रहती। उनसे पूछने पर कि ‘आप क्या करती हैं?’ थोड़ी झुंझलाहट से जवाब देती थीं, ‘कुछ नहीं।’ घर का सारा जंजाल भरा काम करने के बावजूद उनका वह जवाब एक अनकही पीड़ा में लिपटा रहता था। इसीलिए मैंने ये दोनों मांगें रखी थीं, ताकि महिलाएं अपने कार्य से आमदनी भी अर्जित कर सकें और घर का काम करके संतोष भी प्राप्त कर सकें।
तीसरा वर्ग आर्थिक दृष्टि से अति पिछड़ा कहा जा सकता है या प्रतिदिन कुआं खोदने और पानी पीने वाला समाज। इस समाज की महिलाएं शुरू से खेती, उद्योग-धंधों, छोटी-मोटी दुकान लगा और साफ-सफाई जैसे कार्य करके धन उपार्जन करती थीं, जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण ठीक तरह से हो।

आज के समय में इन तीनों वर्गों में महिलाओं की स्थिति कमोबेश पूर्ववत ही है। मानना पड़ेगा, मध्यवर्ग और निम्न वर्ग की महिलाएं अपने काम और आमदनी से संतुष्ट नहीं हैं। आज तक समान काम के लिए समान वेतन के कानून का पालन नहीं हो पाया है। वे शरीर तोड़ काम करने के बावजूद उचित मूल्य (आमदनी) नहीं प्राप्त कर पाती हैं। आज की स्त्रियों के पास पारिवारिक, राजनीतिक और आर्थिक कानूनों का काफी ज्ञान है। ऐसे में, उचित अधिकार न मिलने पर वे दु:खी होती हैं। 

महिलाओं का आर्थिक विकास और स्वावलंबन केवल उनके हित में नहीं है, बल्कि यह उनके परिवारों में सुख-शांति लाने में कारगर होता है। उनकी मेहनत-कमाई को भी राष्ट्रीय आमदनी का भाग बनाकर, देश आर्थिक रूप से अपने स्वावलंबन की स्थिति की घोषणा कर सकता है। नीति आयोग के अनुसार, भारत की श्रम शक्ति में अभी महिलाओं का योगदान मात्र 27 प्रतिशत है, इसे विश्व के औसत 48 प्रतिशत पर लाना होगा। अगर ऐसा होता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था में और 700 अरब डॉलर जुड़ जाएंगे। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं का योगदान 20 प्रतिशत से भी कम है। मातृ शक्ति को सीधे अर्थव्यवस्था से जोड़े बिना भारत के विकास का सपना पूरा नहीं हो सकता।

प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता की बात जोरों से उठाई है। राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने में आधे की हिस्सेदार महिलाएं होंगी। महिलाओं को सुखी, परिवार को स्वस्थ और देश को विकसित बनाने के लिए हमें प्रयास करने पड़ेंगे। महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा संख्या में स्थाई रूप से काम और रोजगार शुरू करने के लिए धन मिलना चाहिए। पूरे देश में महिलाओं की क्षमता का मूल्यांकन होना चाहिए। पिछले तीन दशकों में बने लाखों स्वयंसेवी समूहों में महिलाओं की ही उपस्थिति ज्यादा दिखती है। इस क्षेत्र की ओर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। प्रधानमंत्री के अनुसार, कोरोना काल में भी लाखों स्वयंसेवी संगठन बने हैं। स्वयंसेवी समूह के कार्यों में लगी महिलाओं की आर्थिक आमदनी से उनमें आत्मविश्वास पैदा होते और उन्हें  प्रसन्न होते मैंने स्वयं देखा है। स्वयंसेवी समूह को पुन: एक बड़ा आंदोलन बनाया जा सकता है, जिससे देश की करोड़ों  महिलाएं आर्थिक दृष्टि से मजबूत बनेंगी और उनका व्यक्तित्व विकास होगा।

कोरोना के समय में महिलाओं-पुरुषों को रोजगार देने के लिए कई सारी कारगर योजनाओं की घोषणा हुई है। इन योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर पहुंचना चाहिए। योजनाओं के तहत महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण निश्चित रूप से देश को आगे ले जाएगा। महिलाएं जहां चाहें, उन्हें वहां छोटे या बड़े काम-धंधे से जोड़ना होगा। वर्क फ्रॉम होम से भी महिलाओं को लाभ हुआ है। नवरात्र का समय मातृ शक्ति को जगाने का समय है। महिलाओं को एकजुट होकर आगे आना होगा। तरीके बहुत हैं और मिलकर निकाले भी जा सकते हैं। सबसे जरूरी है कि हम यह समझें, महिलाओं का आर्थिक स्वावलंबन न्याय, सुख व संपन्नता का मार्ग है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 17 september 2020