DA Image
16 नवंबर, 2020|10:57|IST

अगली स्टोरी

सभ्य समाज के लिए जरूरी सोपान

अंग्रेजी की एक कहावत के अनुसार, पुलिस किसी आवश्यक बुराई की तरह है। वे भी, जो हमेशा पुलिस के विरोध में खड़े दिखते हैं, किसी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं कर पाते, जिसमें पुलिस सड़कों से पूरी तरह से अनुपस्थित हो जाए और सारी नागरिक गतिविधियां बिना उसके हस्तक्षेप के चलती रहें। दरअसल, राज्य की अवधारणा में ही पुलिस, अदालतें और जेल जैसी संस्थाएं निहित हैं। इन सबका विकास सभ्यता के विभिन्न सोपानों से जुड़ा है। सभ्य होने के क्रम में नागरिक क्रमश: कानूनों का स्वयं पालन करना बढ़ाते जाते हैं और उनकी जिंदगी में पुलिस का हस्तक्षेप घटता जाता है। स्कैंडिनेवियन देश इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अब भी ऐसे मुकाम पर हैं, जहां सड़क पर बाएं चलने या सार्वजनिक जगहों पर न थूकने जैसे कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए भी पुलिस की जरूरत पड़ती है।
इस दीपावली पर जब जोर-शोर से अदालती फैसलों ने पटाखों पर नियंत्रण की बात की और सरकारों ने भी उन पर रोक लगाने की घोषणा कर दी, जनता ने इन सबका मखौल उड़ाते हुए रात भर पटाखे छुड़ाए। यह सभ्यता की निचली सीढ़ी है, जिस पर खड़े व्यक्ति के लिए पर्यावरण, अपना स्वास्थ्य या दूसरों की सुविधा/असुविधा का कोई अर्थ नहीं है; अर्थ है, तो सिर्फ अपने मनोरंजन का। ऐसे में, कोई आश्चर्य नहीं कि पटाखे बनाने, बेचने या छुटाने को रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस की है। मैंने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लोगों में पटाखे फोड़ने के लिए एक खास तरह का हिंस्र उत्साह देखा।
अक्सर दो तरह के विमर्श चलते रहते हैं। एक, जो पटाखे पर लगे प्रतिबंधों को लागू न कर पाने पर पुलिस को अक्षम और गैर-पेशेवर मानता है, और दूसरे की राय में पुलिस संख्या बल और संसाधनों के चलते अपने समय की चुनौतियों का सामना नहीं कर पा रही है। इनके बीच इस सच्चाई पर हमारा ध्यान नहीं जा पा रहा है कि किसी समाज की आंतरिक संरचना ही उसे एक निश्चित अर्थ में कानून-कायदों का पालन करने वाला बनाती है। पुलिस का डंडा या सख्त कानून उसे स्वैच्छिक सभ्य नहीं बनाते। अंदर से इच्छाशक्ति न हो, तो इस दिवाली जैसी स्थिति होती है। सारे कानून-कायदों, अदालती या सरकारी आदेशों और पुलिस की कवायद के बावजूद पटाखे छूटते रहे। वैसे भी, भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में है, जहां शायद सबसे अधिक कानून होंगे, लेकिन हम कितना कानून-पालन करने वाले समाज हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
यह स्थिति उन अंतर्विरोधों की उपज है, जो एक लोकतांत्रिक राष्ट्र राज्य बनने की प्रक्रिया में हमारे यहां अक्सर दिखते रहते हैं। एक तरफ दो सौ वर्षों की आधुनिक शिक्षा है, जिसने मनुष्य की समानता का पाठ हमें सिखाया है और दूसरी तरफ वर्ण-व्यवस्था की जकड़न, जो अपने बीच के आधे से अधिक मनुष्यों को पशु से भी बदतर स्थिति में रखने में विश्वास करती है। वर्ण-व्यवस्था ने हमारी भाषाओं के क्रिया पद भी त्रिस्तरीय बनाए हैं। हम सामने वाले की जातिगत या आर्थिक हैसियत देखकर उसे बैठ, बैठो या बैठिए कहते हैं। 
सड़क पर पैदल चलने वाले को मिलने वाली जगह भी सभ्यता का मापने का पैमाना हो सकता है। अपनी पहली विलायत यात्रा का सबसे विलक्षण अनुभव मेरे लिए सड़क पर चलने वाले के लिए चालकों द्वारा अपने वाहन रोक देना देखना था। यह सिखाने के लिए दूर-दूर तक कहीं पुलिस नहीं दिखती थी, लोग आंतरिक अनुशासन से यह कर रहे थे। मेरे जैसे भारतवासी के लिए, जिसके अनुभव संसार में पैदल चलने वाला सड़क के उपभोग का सबसे आखिरी अधिकारी होता है, यह एक अकल्पनीय स्थिति थी। सभ्य होने का एक पैमाना यह भी है कि कोई समाज अपने बीच के कमजोरों के लिए कितना स्थान छोड़ता है। उसमें रहने वाले बच्चे, स्त्रियां, दिव्यांग या आर्थिक रूप से पिछड़ गए समूह शक्तिशाली लोगों के बरअक्स कहां खड़े होते हैं। मैंने पैदल चलने वालों का जो जिक्र किया है, वह एक ऐसे ही असुरक्षित समुदाय का उदाहरण है। भारत में यह अनायास नहीं है कि सड़कों पर ट्रक, कार और दूसरे वाहनों की आतंककारी उपस्थिति के बाद ही पैदल के लिए जगह बचती है। वर्ण-व्यवस्था से काफी हद तक अब भी संचालित सत्ता-संरचना की यह सहज स्वाभाविक परिणति है और इसे पुलिस की उपस्थिति बढ़ाकर ही नहीं बदला जा सकता।
ऐसा नहीं है कि समाज को कानून का सम्मान कराने वाला बनाने के लिए पुलिस की कोई भूमिका नहीं होती। पर यह भूमिका एक सभ्य पुलिस ही निभा सकती है और सभ्य पुलिस का निर्माण एक सभ्य समाज करता है। यदि एक समाज के तौर पर हम पुलिस द्वारा अपराधियों को ‘एनकाउंटर’ में मार गिराने पर प्रसन्न होते हैं, तो फिर हमें स्वीकार करना होगा कि अभी हम सभ्यता के सोपान पर बहुत निचले पायदान पर खड़े हैं, हम एक सभ्य पुलिस नहीं निर्मित कर सकते। सब कुछ एक-दूसरे में गुथा हुआ है। अपराध और दंड के मसले भी मनुष्यता के विकास से जुड़े हैं। इस विकास से ही संभव हुआ कि कुछ शताब्दियों पूर्व तक यौनिकता से जुड़े बहुत से अपराध, जिनके लिए मृत्यु दंड एक सामान्य सजा होती थी, अब सहज स्वाभाविक मानवीय व्यवहार में गिने जाते हैं। जमीन में गाड़कर पत्थरों से मार-मारकर जान लेना या सिर काट देना एक मध्ययुगीन बर्बरता मानी जाती है। दुनिया के बहुत से मुल्कों में फांसी खत्म कर दी गई है और यदि हम तुलना करें, तो पाएंगे कि इनमें मनुष्य विकास के सूचकांक उन देशों से कहीं बेहतर हैं, जिनमें अब भी फांसी बतौर सजा दी जाती है।
देश की राजधानी और उसके आसपास जिस तरह पटाखों पर लगे नियंत्रण की छीछालेदर हुई, उस पर चर्चा मुख्य रूप से पुलिस की अक्षमता पर केंद्रित है। उन कारणों की शिनाख्त करने की कोशिश नहीं की जा रही है, जिनके चलते एक आम नागरिक को पर्यावरण या उसके अपने स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी सचेत करने के लिए पुलिस की जरूरत पड़ती है। पुलिस बलों में वृद्धि या उनके संसाधन बढ़ाने से पटाखों पर रोक नहीं लगेगी। खुद को जगद्गुरु कहने भर से काम नहीं चलेगा। जरूरी है कि हम वे सारे मूल्यगत परिवर्तन करें, जो हमें सभ्य समाज बनने के लिए जरूरी सोपान पर ऊपर चढ़ा सके। पर क्या इसके लिए हम तैयार हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column 17 november 2020